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| 03.22.2008 |
| बजा दे काश! ये किस्मत हमारी वीरेन्द्र जैन |
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बजा दे काश! ये किस्मत हमारी
हमारे फोन पर घन्टी तुम्हारी तुम्हारा स्वर बने कानों का व्यंजन उठे हर शब्द से खुश्बू खुमारी हमेशा आशिकों की साँस फूली मुहब्बत की बहुत ऊँची अटारी उतारेंगे भला क्या आारती वो जिन्होंने आपकी इज्जत उतारी मदारी ने निकाले साँप हरदम बजट सी खोलता जब भी पिटारी दिवानी सीख ले कच्चा चबाना इधर ईंधन बहुत मँहगा हुआ री |
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