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03.13.2009
 
अधूरी कहानी
वीरेन्द्र जैन

 आपबीती

मैं वीरेन्द्र जैन सम्प्रति राज्य स्तरीय अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हूँ, पंजाब नैशनल बैंक में २९ साल तक सेवा करने के बाद अधिकारी के पद से स्वैच्छिक सेवा निवृत्त हूँ। राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों व हिन्दी की समस्त शिखर की पत्रिकाओं में गत ३५ सालों से निरंतर लेखन कर रहा हूँ। मेरे लगभग १२०० लेख, रिपोर्टें व साहित्यिक रचनाएँ तथा चार पुस्तकें प्रकाशित हैं। मैं जनवादी लेखक संघ भोपाल का अध्यक्ष रहा हूँ तथा अनेक स्वयंसेवी संगठनों में सहयोग करता हूँ, विचारपरक सेमिनारों आदि में भाग लेता हूँ। मुझे देश के पढ़ने लिखने वाले लोगों के बीच में पहचाना जाता है। निम्नांकित घटनाक्रम आपकी जानकारी में इसलिए ला रहा हूँ कि जब मेरे जैसे व्यक्ति के परिवार के साथ पुलिस नौकरशाही और वोटों की राजनीति इस तरह का व्यवहार कर सकती है तो बीस रुपये रोज़ की आमदनी वाले बेहद आम आदमी के साथ उनका रवैया क्या होगा।

 

घटनाक्रम

मैं भोपाल में रहता हूँ तथा मेरा पुत्र डॉ. नीरज जैन दतिया में रहता है जो दतिया के एक शासकीय विद्यालय में संविदा शिक्षक है। शनिवार ४ अक्टूबर ५.४५ साँय उसका फोन आता है कि एक जनशिक्षक उपेन्द्र शुक्ला द्वारा जनसंकुल केन्द्र जो होलीपुरा दतिया में स्थित है, पर उसके साथ मारपीट की गयी और कमरे में बन्द कर दिया गया। उसने कलैक्टर दतिया को शिकायत की तो कलैक्टर ने बिना कोई बात सुने पुलिस रिपोर्ट लिखाने को कहा। पुलिस थाने में थानेदार उपस्थित नहीं थे व ड्यूटी पर उपस्थित हैडकानिस्टिबिल ने आवेदन लेकर रख लिया और कहा कि थानेदार श्री महेन्द्र शर्मा के आने के बाद ही रिपोर्ट लिखी जा सकेगी। थानेदार पीताम्बरापीठ पर गये हैं जहाँ नवरात्र के अवसर पर मेले की भीड़ के लिए नियंत्रण कक्ष बनाया गया है।

थानेदार अपना मोबाइल बन्द किये हुये हैं। बार-बार लगाने पर भी वे फोन नहीं उठाते उनके मोबाइल पर हनुमान चालीसा की धुन लगी हुयी है जो पूरी बजने के बाद मोबाइल बन्द हो जाता है।

पुलिस अधीक्षक के निवास पर फोन किया जाता है पर वे भी फील्ड पर गये बताये जाते हैं। उनका मोबाइल भी बन्द है।

भोपाल में पदस्थ अपने एक आइएएस मित्र से सहयोग की अपील की जाती है तो वे पूछते हें कि आरोपी भाजपा या संघ से जुड़ा तो नहीं है, अनुमान से उसके न होने की बात कहने पर वे कलैक्टर दतिया से बात करते हैं और कलैक्टर उन्हें रिपोर्ट लिख जाने के बाद सोमवार को आरोपी को सस्पेंड करने का आश्वासन देते हैं।

रिपोर्ट लिखाने के लिए दतिया के स्थानीय एक पूर्व भाजपा विधायक शम्भू तिवारी से सहयोग माँगा जाता है जो लोकदल काँग्रेस भाजपा समाजवादी पार्टी में रह चुकने के बाद फिर से भाजपा में लौट चुके हैं तो वे फोन पर इस समय क्षेत्र से बाहर होने की बात कहते हैं व बाद में बात करने का आश्वासन देते हैं।

यह चुनाव का समय है पड़ोस के विधानसभा क्षेत्र के परिसीमन में आरक्षित हो जाने के कारण वहाँ के विधायक एवं नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री नरोत्तम मिश्रा अब दतिया से टिकिट लेने की तैयारी कर चुके हैं। पूर्व विधायक शम्भू तिवारी को वे ही वापिस भाजपा में लेकर आये हैं जो पिछले कुछ दिनों घटित कुछ दुर्घटनाओं के बाद आत्म केन्द्रित हो गये थे। लोगों का कहना है कि चुनाव लड़ने के शौकीन तिवारीजी के संभावित नुकसान से बचाने के लिए ही नरोत्तम मिश्रा ने उन्हें साध रखा है। नरोत्तम मिश्रा क्षेत्र में सरकारी और स्वअर्जित अटूट धन व्यय कर रहे हैं। संबंधित थानेदार उनका लाया हुआ बताया जाता है जिसे आदेश है कि चुनाव तक बिना उनसे पूछे किसी की रिपोर्ट नहीं लिखी जाये ताकि प्रत्येक फरियादी उनके या उनके किसी प्रतिनिधि के पास पहुँच बनाये।

स्थानीय नगरपालिका को मिश्राजी ने विभिन्न मदों में इस वर्ष इतनी राशि उपलब्ध करा दी है जो अब तक के नगर पालिका के साठ साल में उपलब्ध करायी गयी कुल राशि से भी अधिक है। इसके प्रभाव से नगरपालिका अध्यक्ष सलीम कुरैशी को भाजपा में सम्मिलित कर लिया गया है। उनको फोन करने पर भी वे रिपोर्ट दर्ज कराने में असमर्थ रहते हैं।

एक स्थानीय अखबार के सम्पादक से बात कहने पर वे भी कहते हैं कि थानेदार कोई रिपोर्ट तब तक नहीं लिखता जब तक कि नरोत्तम मिश्रा न कह दें विशेष रूप से अगर रिपोर्ट किसी ब्राह्मण के खिलाफ लिखायी गयी हो। वे इन दिनों अधिकतर समय दतिया में ही रहते हैं। उन्होंने दतिया में एक मकान भी खरीद लिया है। थानेदार सामन्यतयः मद्यपान का शौकीन है और जुआ खिलाने के लिए बदनाम लोगों के साथ देखा जाता है। वह आम तौर पर अपनी सीट पर उपलब्ध नहीं रहता और कुछ चुंनिंदा लोगों के मोबाइल ही सुनता है।

पुलिस अधीक्षक को बार-बार फोन करने पर वे एक बार मोबाइल उठाते हैं और स्थिति बताने पर कहते हैं कि रिपोर्ट लिखी जायेगी क्यों नहीं लिखी जायेगी, और इतना कह कर मोबाइल बन्द कर देते हैं बाद में मोबाइल बन्द मिलता है।

एक और पत्रकार मित्र बताते हैं कि एसपी सीधे सरल और अपने पद के लिए अक्षम समझे जाने वाले लोगों में माने जाते हैं। इसी प्रतिभाकी दम पर उन्हें नमूने के रूप में बिठा दिया गया है। सारा काम थानेदार सम्हालता है जिसका एकमात्र लक्ष्य इस समय मंत्री महोदय की इच्छा के अनुरूप कानून व्यवस्था लागू करना है।

दिनांक ५ अक्टूबर २००८ को प्रातः फिर से प्रयास किये जाते हैं। वह बयान लेने के लिए गवाह को बुलवाता है। बाद में कहता है कि रिपोर्ट से पहले जाँच होगी आपने कट्टा अड़ा कर जान से मारने की बात लिखी है अब पहले कट्टा बरामद करना पड़ेगा। थानेदार उसके बाद फिर थाने में नहीं मिलता।

अपने एक मार्क्सवादी मित्र को ग्वालियर फोन करने पर वे कहते हैं कि आवेदन को फैक्स कर दीजिए मैं सोमवार को डीआईजी या आईजी से मिलकर बात करूँगा।

एक और राजनीतिक दल समानता पार्टी के पदाधिकारी भी थाने में फोन करके देखते हैं तो उन्हें भी उत्तर मिलता है कि थानेदार हैं नहीं और जो कुछ भी हो सकता है वह वे ही करेंगे। वे कहाँ पर हैं यह पता नहीं है। रिपोर्ट नहीं लिखी जाती।

मेरे द्वारा पुलिस हैडक्वार्टर को ई-मेल से शिकायत भेजी जाती है कि २४ घन्टे बाद भी रिपोर्ट नहीं लिखी गयी है, पर उस पर संभवतः कोई कार्यवाही नहीं हो पाती।

६ अक्टूबर २००८ कलैक्टर को एक कमिश्नर पद वाले मित्र फोन पर बात करके कहते हैं कि उक्त विषय में न्यायपूर्ण कार्यवाही अपेक्षित है तो वे उन्हें आश्वस्त करते हैं कि जिला शिक्षा अधिकारी से रिपोर्ट लेकर वे आरोपी को शाम तक सस्पेंड कर देंगे।

डॉ. नीरज को थाने में बयान के नाम पर बुलाया जाता है और किसी के द्वारा बताया जाता है कि पिछली तारीख में आरोपी से भी एक आवेदन ले लिया गया है ताकि मामले को समझौते के स्तर पर लाया जा सके। वह यह भी संकेत देता है कि मंत्री महोदय की ओर से आरोपी के पक्ष में सिफारिश आयी है।

शाम को पूर्व विधायक शम्भू तिवारी का फोन आता है कि उनके पास आकर बात कर लें। जब नीरज उनके पास जाते हैं तो वे कहते हैं कि तुम घर के लड़के हो बोलो कैसे निबटवा दें। उसके यह कहने पर कि उसके साथ ही ज्यादती हुई है और आरोपी स्वभावतयः उद्दण्ड है उसके द्वारा आये दिन मार पीट की घटनाएँ होती रहती हैं मैं शांतिप्रिय हूँ और वह व्यक्ति लोगों से गलत काम करा के पैसे वसूलना चाहता है। उसका साइड बिजनिस लोगों को पैसा उधार देना है। उसे दण्डित होना चाहिये। अंततः जिला शिक्षा अधिकारी के यहाँ जाकर यह फार्मूला निकाला जाता है कि या तो उक्त जनशिक्षण केन्द्र से डॉ.नीरज का स्थानान्तरण कर दिया जाये या उक्त जन शिक्षक का क्षेत्र बदल दिया जाये। संभवतयः कलैक्टर के द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी से कहा गया है कि इस दिशा में तुरंत समझौता कराके रफा-दफा करो। वे उक्त प्रस्ताव मान कर तुरंत आदेश जारी कर देना चाहते हैं किंतु उनके स्टाफ द्वारा बताया जाता है कि स्थानान्तरण के लिए वे अधिकृत नहीं हैं। यह केन्द्रीय सरकार का मामला है। वे उस पर अमल नहीं कर पाते।

शाम को मेरे पास कमिश्नर का फोन आता है कि कलैक्टर आपके लड़के को बुला रहे हैं पर वह मिलने क्यों नहीं जाता।

मैं जब उससे फोन पर पूछता हूँ तो वह कहता है कि मेरे पास तो कोई सूचना नहीं आयी पर मैं अभी चला जाता हूँ। कलैक्टर बंगले पर बाहर कार्यालय में लंबे इंतजार के बाद कलैक्टर केवल फोन पर बात करते हैं और उससे कहते हैं कि तुमने अभी तक रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं करायी। जब वह बताता है कि तीन दिन के प्रयास के बाद भी थानेदार ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की तो वे फोन रख देते हैं। वह जिला शिक्षा अधिकारी के पास आता है तो उनका कहना था कि कलैक्टर का कहना है कि ये मास्टर आपस में लड़ते हैं व एक भोपाल से फोन करवा रहा है और एक मंत्री के यहाँ से फोन करा रहा है अगर समझौता नहीं होता तो कल दोनों को ही सस्पेंड कर दो।

७ अक्टूबर २००८ को पुलिस आरोपी से लिखवायी गयी रिपोर्ट की जाँच के लिए जन शिक्षण केन्द्र जाती है, पर झूठी रिपोर्ट तो उसने ही मंत्री के क्षेत्र से दबाव आने पर लिखवायी है, सच जानकर भी वह किंकर्तव्यविमूढ़ता में कोई निर्णय नहीं ले पाती। रिपोर्ट आज भी नहीं लिखी गयी।

मैं सोचता हूँ कि जब वोटों की खातिर मंत्री यह नहीं देख रहा है कि सत्य क्या है व पुलिस और प्रशासन मनमानी पर उतारू है तो मैं नीरज को नौकरी छोड़ देने की सलाह देता हूँ और कहता हूँ कि तुम अपने कैरियर में प्रथम श्रेणी के छात्र रहे हो, पीएचडी हो, स्लैट क्लीयर किया हुआ है, अपने छात्र जीवन मैं वादविवाद प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते रहे हो, व मंच संचालन के काम में कुशल हो और फिर भी चार हजार रूपये प्रतिमाह की नौकरी के लिए इस तरह का अपमान सहने के लिए क्यों विवश हो! नौकरी छोड़ दो। पर वह तैयार नहीं होता।

मित्रों का कहना है कि जब प्रदेश की पुलिस सरेआम सव्वरवाल के हत्यारों को बचाती है, इंदौर में अल्पसंख्यकों को सरेआम मार देती है और कुछ भी नहीं हो पाता तो यह प्रकरण तो उसकी तुलना में कुछ भी नहीं है। सब कुछ सह जाओ या बहुत ज्यादा शिकायत हो तो किसी प्राइवेट गुन्डे को किराये पर लेकर गुस्से को शांत कर लो। भले ही तुम प्रैस से जुड़े हो पर उससे भी कोई ज्यादा उम्मीद मत रखो। कोई छाप भी देगा तो क्या हो जायेगा! अखबार में छपने से भी कहीं हालात बदलते हैं!

एक अन्य भावी विधायक प्रत्याशी का फोन आता है और वे टी आई के स्थानान्तरण के लिए आन्दोलन की भूमिका बनाने को कहते हैं। पर मैं एक पक्ष में होकर बाकी सब के विपक्ष में हो जाने की आंशंका से ग्रस्त हूँ।

आज ८ अक्टूबर २००८ तक प्रकरण में कुछ होने की सूचना नहीं है। लगता है कि इस व्यवस्था में अपने को सम्मानित समझना कितना बड़ा भ्रम है, कोई भी कभी भी आपके सम्मान की बखिया उधेड़ कर आपको भ्रष्टतम निम्नकोटि के नेताओं की शरण में जाने को विवश कर सकता है। नहीं जाने पर क्या आप चैन से बैठ नहीं सकते। पूरे परिवार की मानसिक शांति भंग हो गयी है व व्यवस्था के प्रति गहरी अनास्था पैदा हो रही है।

मन बहलाने को वरिष्ठ कवि माणिक वर्मा के यहाँ जाता हूँ वे कई दिनों से बुला रहे थे बहुत रोकते हुये भी सारी कहानी बयाँ हो ही जाती है। वे दुखी हैं और कहते हैं कि नक्सलवादी ऐसे ही पैदा होते हैं। जो लोग आतंकवाद से दुखी हैं उन्हें ये सारी कहानी सुनना और इस पर सोचना चाहिये।

एक मित्र अकील बेग बहुत दुखी और उत्तेजित हैं उन्होंने नरोत्तम मिश्रा की कोई सिफारिश तलाशी थी जिसने अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली है। मैंने पराजय मान ली है। जब न्याय और कानून की लड़ाई न होकर ताकत और पैसे की ही लड़ाई है तो उसमें अपनी कमजोरी स्वीकार कर लेने में क्या बुराई है! कंधमाल में तो कितने बेगुनाह मारे जा रहे हैं, उससे पहले गुजरात में कितने मार दिये गये, वह फिल्मी गीत याद आ रहा है- दुनिया में कितना गम है, अपना गम कितना कम है- अकील को भी यही समझाता हूँ।

आज ९ अक्टूबर है बारह बजने जा रहे हैं अभी तक कहीं से किसी का कोई फोन नहीं आया है। सब चुपचाप हो गये हैं, चतुर लोग मेरी भूल और कमजोरियां निकाल कर अपनी असमर्थता और निरीहता को ढक रहे होंगे। दुख में मुस्कराने का सुख महसूस कर रहा हूँ। ठीक है कहानी पूरी नहीं हुयी पर भेज रहा हूँ , सभी कहानियाँ कहाँ पूरी होती हैं!

१० अक्टूबर कोई प्रगति नहीं

११अक्टूबर सकिंड सेटरडे की छुट्ठी है

१२ अक्टूबर संडे है

१३ अक्टूबर कोई उम्मीद नहीं। अखबार में खबर है कि इंदौर में मंत्री को वादा यादा दिलाने के लिए उनकी ही पार्टी के कुछ लोग प्रदर्शन करना चाह रहे थे तो मंत्री के गुन्डों ने उनकी सरे आम पिटायी लगायी व पुलिस ने उन्हीं के खिलाफ केस दर्ज कर दिया।

आज मन भारी है सोचा कि मित्रों को बाँट कर मन हल्का कर लिया जाये। सो आप तक पहुँचा रहा हूँ। आप की सीमा से भी अपरिचित नहीं हूँ पर भी फिर...............................!!


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