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10.24.2007
 
दुनिया की कल्पना
विपिन पंवार ’निशान’

मन को न जाने क्या सूझी
एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर बैठा
आशिकों के लिए
चाँद को धरती पर उतार बैठा
जूठे इन्सानों को
सच्चाई की राह दिखा बैठा
कलयुग को सतयुग बना बैठा
अत्याचार को इस धरा से मिटा बैठा
पापियों को पुण्य की राह दिखा बैठा
रावण राज को रामराज बना बैठा
भूखों को दो वक्त की रोटी दिला बैठा
गरीबों को अमीर बना बैठा
प्यास से तड़पते इन्सानों के लिए
पानी की नदियाँ बहा बैठा
इन्सान की क्रूरता से डरे
प्राणियों को निडर बना बैठा
मन को न जाने क्या सूझी
एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर बैठा


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