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10.24.2007
 
बचपन
विपिन पंवार ’निशान’

कितना सुन्दर, कितना प्यारा
कितना निश्चल, कितना निर्मल
होता है बचपन।
न कोई लालच, न कोई चिन्ता
उठकर गिरना, गिरकर उठना
उमंगों से भरा होता है बचपन।
कितना सुन्दर, कितना प्यारा
कितना निश्छल, कितना निर्मल
होता है बचपन।
दुनियादारी से दूर
नई-नई आशाओं से भरपूर
माँ के आँचल की छाँव में
रहता है बचपन।
कितना सुन्दर, कितना प्यारा
कितना निश्चल, कितना निर्मल
होता है बचपन।


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