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10.20.2007
 
प्रेम क्षणिक है
विनीता अग्रवाल

झूल रही इक डाली पर,
सुन्दर फूल हुआ पल्लवित,
लटक शाख पर काँटों की,
कोमल हृदय उसका हुआ द्रवित।

एक अभिलाषा की मन में,
गुँथ जाऊँ किसी वेणी में,
या स्पर्शित होऊँ नारी तन से,
प्रेम कामना में व्याकुल,
वह हर क्षण जीता था आतुर।

देख फूल का चाकचक्य,
एक षोडषी हुई विकल,
तोड़ फूल को डाली से,
किया प्रेम का अर्थ सफल।

दबा हुआ मुठ्ठी में फूल,
हर्षित हुआ -
प्रेम अमर है,
इतराया औ’ भ्रमित हुआ,
कोमल अंगुली से सहलाकर,
सूँघ फूल को जी भर कर,
षोडषी ने...

कुचल दिया पैरों के नीचे,
फूल को नव पाठ पढ़ाकर-
’प्रेम क्षणिक है, क्षणभँगुर है’।


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