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| 10.20.2007 |
| प्रेम क्षणिक है विनीता अग्रवाल |
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झूल रही इक डाली पर, एक अभिलाषा की मन में, देख फूल का चाकचक्य, दबा हुआ मुठ्ठी में फूल, कुचल दिया पैरों के नीचे, |
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