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10.20.2007
 
नागफनी
विनीता अग्रवाल

 

सिद्धेश्वरी आज पहली बार क्रोध से काँप उठी थी। भला उसे क्या मालूम क्रोध की अभिव्यक्ति कैसी होती है। वह तो भावना शून्य हो, भोर से लेकर साँझ तक बस एक ही लय में घर के सारे कार्य निबटाती जाती है। कोई कुछ भी कहता सुनता रहे वह उसकी परवाह नहीं करती। आज सवेरे सवेरे ही मुहल्ले की कुछ संभ्रान्त स्त्रियाँ उसे कपड़े धोता देख, फिस फिस कर हँस दी थीं "माता जी को तो बुढ़ापे में भी चैन नहीं... लगता है अन्तिम साँस तक वृन्दा के पेटीकोट ही धोती रहेंगी...।" निहायत ही घटिया बात कह गईं थीं वे। इस कटाक्ष को वह बिल्कुल सहन नहीं कर पाई। शायद उस के साथ सठियापन उस पर भी हावी हो गया था। वर्ना उसने आज तक किस की बात का बुरा माना है? जिस के जो जी में आया, जब आया मुँह पर ही कह गया और वह एक फीकी मुस्कराहट चेहरे पर लपेटे खुद को ज़िन्दगी के किसी अन्धेरे कोने में सिमटाती रह गई थी। साबुन से भरे कपड़ों को धो कर पछाड़ने के बजाय, उन्हें गुसलखाने में ही पटक, पलँग पर पसर गई थी वह। अब नहीं करेगी किसी की गुलामी, इस काली भैंस की तो बिल्कुल भी नहीं...। अन्तर्मन से निकले शब्द थे, चौंक पड़ी भला ऐसा सम्भव हो सकेगा? अभी वृन्दा दनदनाती हुई आएगी और कहेगी कि तौलिया नहीं मिल रहा, ढूँढ कर दीजिये - तो ऐसे ही मुँह फुलाए पड़ी रहेगी? नाली में झाड़ू अब नहीं देगी...कपड़ों पर इस्त्री भी नहीं  करेगी.....कपड़े धोने का कार्य उसका नहीं, गजाधर से शिकायत कर देगी वह...। बेटा कुछ भी कहता हो लाख बुरा हो, कमा कर चार पैसे हाथ पर धरता तो है... आज से सिर्फ़ विश्राम करने का कार्य वह करेगी। ऐसा न हो सका तो टाँगे तोड़ देगी वृन्दा की....। उसके आँखें व ओंठ पीड़ा से फड़फड़ा उठे थे।

आज से 25 वर्ष पूर्व, दुर्गा जी के यहाँ जब पुत्र पैदा हुआ था तब घर की समस्त स्त्रियों ने मिलकर मँगल गान गाया था। किन्तु सारी मँगल कामनाएँ व्यर्थ साबित हुईं थीं, जब डॉक्टरों ने कहा था कि सिर में ज़हरावाद हुआ है, बालक ठीक हो गया, तो भी बल बुद्धि का विकास न हो सकेगा। पिता सिर पटक कर रोते रह गए थे और माँ सिद्धेश्वरी कलेजे को थाम खाट से लग गई थी। निकम्मे सम्बन्धी मुँह छिप कर पहले ही खिसक गए थे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बालक का नाम गजाधर रखा गया, जिससे बल बुद्धि प्रभावित हो सके। नाम का प्रभाव था या ईश्वर की शुभ दृष्टि, बालक काल का ग्रास तो न बना किन्तु जैसा डॉक्टरों को भय था, वैसा ही हुआ। उम्र मालती की बेल की तरह बढ़ती थी पर बुद्धि वहीं ठस की ठस। माँ जुट कर सेवा करती, रात में मलाई मिश्री घोटती, सवेरे दूध में बादाम केसर औटाती, कितने ही अघोरी बाबाओं के यहाँ से जुटाए गए राख और फूलों को खाने में मिला कर देती, किन्तु बुद्धि विवेक तो जैसे उसको कभी छू कर ही नहीं गये थे। हाँ देह ज़रूर उभर कर पत्थर की तरह निकल आई थी। पास पड़ोस की स्त्रियाँ पाँच वर्ष के बालक को घुटनों पर लुढ़कता देखतीं तो अफ़सोस ज़ाहिर करने लगतीं, "बड़ा दु:खिया है बेचारा, माँ दिन रात खटती मरती है, पर इस अभागे की बुद्धि सूखे ठूँठ सी रखी है, बढ़ती ही नहीं....।" उनके बच्चे आँखें मटका कर जब छोटी सी उम्र में ही अंग्रेज़ी कविताओं का पाठ करते तब वह गें गें कर लद फद्‍ इधर उधर गिरता पड़ता और सब की सब मस्तक पर आड़ी तिरछी रेखाएँ खींच, खिन्न खिन्न कर हँस पड़तीं। तीक्ष्ण बाणों से बिंधी, विवश माता घर के किसी कोने में मुँह ढाँप कर पड़ जाती। दोनों की फिक्र करने वाला कोई भी न था। निराश पिता, कुन्द पुत्र और उसकी जननी से विमुख हो कर ऋषीकेश के स्वर्ग आश्रम में जो गया तो वहीं का होकर रह गया। रोने के लिये छूट गए थे लाचार माँ और उसका मूढ़ पुत्र। दो वर्षों बाद काले अक्षरों में संदेश या था, "दरिद्र विधवा से विवाह कर अब सुख से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ, दु:खी प्राणियों की सेवा हेतु जीवन को अर्पण कर दिया है। व्यर्थ चिन्ता की आवश्यकता नहीं। ईश्वर से प्रार्थना है सब सुखी रहें। इति।" सुखी अगर कोई हुआ था तो वह थी छोटे भाई की धनी और निकम्मी स्त्री। मौका पाते ही फैल जाती, "अपने मिट्टी के लौंदे को पिंजरे में बन्द कर क्यों नहीं रखतीं, जो मिलता है निगल जाता है। आज अमावट चर गया, कल तिल के लड्डू साफ़ करने में जुटा था,..... एक इंसान को मिल कितने लोग नोचेंगे भला... इस असुर का पेट भरते भरते हम तो मर मिटेंगे ...। उस कर्कशा के चाबुक सिद्धेश्वरी के आत्म सम्मान की धज्जियाँ उड़ा देते थे पर वह बेचारी किस अधिकार से लड़ती...। रोते रोते जब आँखें फूल कर भारी हो जातीं तब वह गजाधर को सामने बिठा कर छड़ी से अपनी हथेलियाँ लाल कर लेती। थोड़ा बहुत धन हथेलियों पर रख देने से वृन्दा शान्त हो जाएगी ऐसा विचार कर वह हफ्‍़ते की पैठ में हाथ के बनाए आचार और पापड़ बेच आई थी, किन्तु तब भी उस कलहकारिणी ने भीषण कोहराम मचाया था। गली में खड़ी हो रात भर चिल्लाती रही थी कि घर की बदनामी के बदले वह नदी में कूद कर प्राण दे देगी या रस्सी को फन्दे पर झूल जाएगी और अगली सुबह वास्तव में वह घी और शहद का विष गटक गई थी। पर विष का असर उस छलनामयी पर हुआ ही कहाँ था? चार घण्टों के भीतर ही वह सिंहनी के समान चटपट उठकर बैठ गई थी।

     सिद्धेश्वरी ने स्थिति से समझौता कर लिया था, सड़क पर निकलती तो सैंकड़ों आँखें उस पर जम जातीं जैसे नोच खाने का उपक्रम कर रही हों। अत: परित्यक्ता का जीवन जीने को विवश वह उम्र में छोटी वृन्दा के पैरों पर गिर पड़ी थी। दुष्ट कलहनी,  जेठानी की लानतें मलानतें करती, छक कर पका पकाया भोजन उड़ाती, दोपहर में ताश की बाजी  पीटती , या फिर दिन दहाड़े खाट पर पड़ कर सोई रहती। गजाधर भी समय के साथ साथ बढ़ता हुआ माँ का आँचल छोड़ चुका था। स्वभाव से बेहद शर्मीला और सँकोची। हर जगह उसकी ठस बुद्धि का रोना और चाची सबके सामने रोती रहती थी। "सब्जी लेने जाता है तो लुट पिट कर आता है, पाव भर का दाम कहो तो किलो जोड़ने में पसीने आते हैं....मैंने इसको कैसे खूटियों से टाँग और बेंते सटका कर गणित विद्या सिखाई है, पर रहा न यह उजबक...। थोड़ा सा झूठ घोल कर वाहवही लूटने में उसकी जीभ तनिक भी नहीं फिसलती थी। अधबूढ़ी तो वह हो ही रही थी, पति की अकाल मृत्यु से भी जब देह बेदम सी हो गयी और उस पर सर्दियों में जब कमर व घुटनों की हड्डियाँ खट खटा कर बज उठने लगीं तब उसने सिद्धेश्वरी से कहा, "मेरी कोई सन्तान न सही...पर तुम अपने बुढ़ापे की चिन्ता करो...गजाधर का विवाह हुआ तो गृहस्थी का बोझ पड़ते ही सारा बुद्धूपना स्वयं ही हवा हो जाएगा....और तुम्हारी भी बर्तन झाड़ू के खटराँग से सदा के लिए मुक्ति...।" बात सिद्धेश्वरी की समझ में  कुछ कुछ आयी थी, किन्तु समस्या थी कि निखट्टू पुत्र को लड़की देगा कौन... अन्दर की बात लीपा पोती कर दब जाती है पर द्रव्य का हिसाब तो सभी लेते हैं...लड़के की फटी जेब देख कर सभी बिदकेंगे...।

पर चतुर चालाक वृन्दा ने जुगत लगा कर लड़की ढूँढी, वह भी ऐसी जिसे देखते ही सिद्धेश्वरी की आँखें चौड़ा कर फैल गईं थीं। कामिनी का रूप ऐसा जो कल्पना से कोसों दूर ....सफेद उज्जवल मुख पर माणिक से चमकते नेत्र मनोग्राही, कि मनुष्य संसार त्याग दे.....उसकी देह से छुटती सुवास ने सिद्धेश्वरी को जड़ कर दिया था। अन्धा जैसे आँखों की रोशनी पा कर नाच उठता है उसी प्रकार सिद्धेश्वरी भी कितने समय के बाद हँसी थी, खिलखिलाई थी। कलकत्ता सरकारी दफ्‍तर में लिपिक थी और पिता साधारण सी कपड़ों की दुकान में एक मामूली नौकर। घर में दरिद्रता देखी तो मन मलिन हुआ। पर यहाँ भी तो मिट्टी का ठीकरा ही रखा था। कैसे सब कुछ उसकी आँखों के सामने चित्रपट पर उभरती तस्वीरों के समान गुज़रता चला गया था? घर में  कनकलता कब आई और कब सबके रोम रोम में समा गई किसे मालूम हो सका था? वृन्दा की पीठ खुजाने से लेकर सूई सहेजने तक का काम वह फ़ुर्ती से कर लेती थी।

 बेटा भी स्त्री की चाकचक्य में बँध कर आँखों से लोप हुआ तो सिद्धेश्वरी ने मन को समझा लिया था। फिक्र थी कि बेकार बैठे मनुष्य के मुँह में स्त्री कब तक अन्न डालेगी? किसी प्रकार से वह कोई युक्ति खोजके गजाधर को भी काम पर लगए ऐसा सिद्धेश्वरी ने कनकलता को इशारा कर दिया था। जवाब में कनकलता अपनी सुगढ़ बाहों  में उसे लपेट कर फुसफुसा गई थी, "वरी नॉट माँ, जैसा कहोगी वैसा ही होगा... किसी प्रकार से ये मेरे दफ्‍तर में फ़िट हो जाएँ ऐसी ही जुगाड़ खोजूँगी....।" और उसी दिन, गन्धर्व किन्नर सी सूरत वाला एक लम्बा चौड़ा प्राणी उसके साथ चला आया था। बरगद वृक्ष के समान ही वह दम्भी था। कनकलता ने कहा था "सर मीट माई मदर....।" उत्तर में सर के चेहरे की कसी चमड़ी पहले की अपेक्षा और भी अधिक तन गई थी। वह कह रही थी, "मिस्टर बर्वे, हमारी मदद करेंगे... ही हैज़ बीन टू काइण्ड टू अस...।" इस पर मिस्टर बर्वे ने भौंहों को तनिक टेढ़ा कर और मोटे ओंठों के थूथन को आगे को निकाल कर, सभी को अत्यन्त हीन दृष्टि से ताका था। ऐसा करते वक्त वह एक मोटे बिल्ले के समान लगा था, जो वहाँ बाकी बैठे लोगों को चूहे समझ कर सटक जाना चाहता था। सिद्धेश्वरी तो एक ही लय में भागती रह गई थी, मिठाई, नमकीन की प्लेटें सजाती समेटती हुई, और कनकलता...वह मिस्टर बर्वे की बगल में बैठ ही ही हो होकर हँसती रही थी। ...कनक, गजेन्द्र और बीच में मिस्टर बर्वे...। तस्वीरें खुद ब खुद बिगड़ने लगी थीं। वे दोनों घर के बाहर वाली बैठक में पर्दे के पीछे बैठ कर कब गुपचुप बैठने, बतियाने लगे, यह सब अत्यन्त तेजी के साथ हो गया था। पड़ोस की महिलाएँ समझा गईं थीं एक्स्ट्रा मैरिटल" रिश्तों का गूढ़ रहस्य। सिद्धेश्वरी ने सिर को धुन लिया था, किसे दोष देती वह? मिस्टर बर्वे सुबह से लेकर शाम तक कनक के पीछे पीछे एक सजग प्रहरी की तरह दौड़ते थे। कनक को स्वयं भी कभी ऐसे व्यवहार से कोई आपत्ति न होती थी। इतवार को सिनेमा और सप्ताह के शेष दिनों में सैर सपाटे के अनेकों कार्यक्रम रचे जाते।  मूर्ख पति यह सब देखता और आँखें बन्द कर सो रहता। सिद्धेश्वरी ने कनक से पूछा तो बड़े प्रेम से लिपटते हुए उसने उत्तर दिया था, "माँ हम पर ढेरों एहसान हैं मिस्टर बर्वे के, फिर अफ़सर को ऑब्लाइज़करने के लिये सभी कुछ करना पड़ता है, यहाँ तक कि.....।" उसके आगे सिद्धेश्वरी कुछ भी न सुन सकी थी। वृन्दा से कुछ कहने का साहस किया था पर वह तो उल्टे मरखनी गाय की तरह सींग फैलाकर झपट पड़ी थी, "तुम्हारे मूर्ख लड़के के लिये हीरा ढूँढ कर ला दिया तो तेवर बढ़ गए...ज़रा सा किसी से हँसती बोलती है तो तुम्हारे दोनों के भले के लिये ही.... तुम माँ बेटे मौज से रह सको इसी कारण मैंने चप्पलें घिसीं थीं.... वर्ना उसके घर की देहरी पर तो सैंकड़ों लड़के सिर फोड़ते थे....।" अवश्य कोई गहरा षडयन्त्र रच गई थी वृन्दा, उस छलना नारी पर आँख मूँद कर विश्वास करने के लिए सिद्धेश्वरी स्वयं को ही दोषी मान रही थी। गजाधर की नौकरी मिस्टर बर्वे की फ़र्म में लगी तो रातों रात तर्क वितर्क करने की क्षमता उसमें कैसे पैदा हो गई यह भी सिद्धेश्वरी कभी जान न सकी। सुन्दर स्त्री के हाथ कपड़े की थपकी पर खुरदुरे होने से पहले ही बेटे ने माँ को डपट दिया था,"कितना कठोर हृदय रखती हो...,पहले उसके चरित्र पर शंका करती थीं.... अब चैन से जीने भी नहीं देती....कपड़े बर्तन धोने का उसका भला क्या काम...घर के काम में मन नहीं लगता अब तुम्हारा....?" ऐसे कितने ही अमोघ शस्त्रों से वह हर क्षण आहत होने लगी थी। मिस्टर बर्वे के एहसानों को चुकाते हुए कनक एक दिन कब आँखों से ओझल हुई, वह सब भी अचानक ही हो गया था। ऑफ़िस से टूअर पर जो गई तो दुबारा लौट कर नहीं आई थी, कितने ही सन्दूक खाली कर के गई थी वह इसका हिसाब रखने की सुध किसे थी? गजाधर भी सारा मुलम्मा सिद्धेश्वरी के कन्धों पर टाँग कर महीनों अंट शंट बकता रहा था। क्षीण बुद्धि का मनुष्य होने के बावजूद भी कृतघ्न पुत्र होने के सारे गुण थे उसमें। किन्तु आज सिद्धेश्वरी ने फ़ैसला कर लिया था वह गजाधर से कह देगी कि इस नर्क से उसे निकाल कर किसी अन्य जगह की तलाश कर रहे वह। हर क्षण नागफनी सा जीवन अब न जी सकेगी। किन्तु अगले क्षण वह सिहर उठी थी,क्योंकि वृन्दा आई थी और गुर्राते हुए कह रही थी, "मिस्टर बर्वे का लाखों का घाटा करा गया कम्बख्‍़त...., कागज़ों के पुलिन्दे काँख में दाब कर सोया रहता था....लात मार कर नौकरी से निकाला गया है... अब माँ बेटे भूखे मरेंगे...पर मेरा हृदय भी तो मोम का है....दोनों का पेट मैं ही भरूँगी...। सिद्धेश्वरी आँगन में उग आए एक नये नागफनी के पौधे को ताक रही थी अपलक।



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