अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
10.20.2007
 
मैं भूल रही हूँ
विनीता अग्रवाल

ऐ निष्ठुर समय मुझको याद दिला दे
मैं कुछ कुछ भूल रही हूँ.....

वो नानी के हाथों की सोंधी पकावन
आँगन के चूल्हे की जलती जलावन
छत पर ही लेटे कहानी पढ़ना
हाथों में मीठी मीठी सी मठरी कुतरना
धूप की चादर से आँखों को ढँकना
सीढ़ी पे उछलना, उछल कर के चढ़ना
स्कूल के बस्ते में करती इकट्ठे
चिड़ियों के पंख औ पीपल के पत्ते
खाने की छुट्टी में रोटी की पुड़िया
हींग की खुशबू में लगती थी बढ़िया
पसीने से लथपथ घर को पहुँचना
नानी का हँसना, वो लिपटना चिपटना
ठंडे से लोटे में सुराही का पानी
वो देती थी मुझको अजब कहानी
चौके फर्श को बिस्तर बनाकर
धोती के पल्ले में खुद को छिपाकर
मैं सोती थी उसके कलेजे से चिपटी
उसके हाथों के तकिये पे छौने सी सिमटी
इस निष्ठुर समय ने छीना है सब कुछ
न नानी, न बचपन सभी गये हैं कहीं छुप
पूछा था ’नन्हीं’ की अँगुली जकड़कर
ले आ मेरे बीते दिन को पकड़कर
हँस के बोली वह,
कौन सी नानी औ कैसा वह बचपन
आँसू हैं कैसे, कैसी यह उलझन
ना, अब किसी से न कहूँगी
बीत गया जो उसी में रहूँगी

ऐ निष्ठुर समय मुझे वापिस लौटा दे
मैं कुछ कुछ भूल रही हूँ.....


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें