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ISSN 2292-9754

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03.14.2015


सब तुम्हें पाने को है

छीन लो आकाश से बुलंदियों का सपना
छीन लो धरती से गौरवमयी इतिहास अपना
छीन लो सागर से रंगीन तरंगों की लड़ी
छीन लो तुम जंगलों से विलुप्त जीवन की कड़ी
सँजो हृदय में इनकी दौलत इक नया संसार गढ़ो
मनुष्यता को नाज़ हो इंसान तुम उस ओर बढ़ो
तकनीक को विकसित करो पर ध्यान बस इतना रहे
खाली न हो दिलों से हम इंसान का कद बढ़ता रहे
अपनी बुलंदियों का सूरज नित गगन चढ़ता रहे
रंग अपनी आस्था का विश्व पर मढ़ता रहे
इक सुनहरी सभ्यता की ओर जग बढ़ता रहे
वासना के थोथे अंगारों से बचना है तुम्हें
चल पड़ो इक नया संसार रचना है तुम्हें
फ़ैशन की अंधी दौड़ मे कदम कदम पर आग है
आने वाली सभ्यता की आँख में जंचना है तुम्हें
‘विनय’ बचा लो खुद को गर बचानी है तुम्हें मानवता
तकनीक के संसार मे संस्कार रचना है तुम्हें
कह दो अपनी हीनता से वीरता आने को है
कालिमा बढ़ने लगी है अब निशा जाने को है
यह कमर कसता समय संदेश फैलाने को है
खोने को कुछ भी नहीं है सब तुम्हें पाने को है 


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