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ISSN 2292-9754

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01.05.2015


वसुंधरा

सच है
एक सर्वविदित सच
कि आसमां झुकता है
वसुंधरा की ओर।

जानता है कि
सामर्थ्यवान नहीं वह
जो धार सके धरती की तरह
अपने पर सब कुछ
अनवरत सदियों सदियों तक
फिर भी, मिथ्या गर्व का भाव लिये
तथाकथित आदर्शों की अकड़ में
विराजता है उच्चतम ऊँचाइयों पर
बाँहें फैलाये
वसुंधरा की ओर...।

जानती है ज़मीन
आसमां के स्वार्थ और खोखले पौरुष को
फिर भी मुस्कुराती है हर पल
धरित्री के आदर्शों की मर्याद-रक्षा में
और बनी रहती है औरत...
एक मुकम्मल औरत
सोचो....
क्या होगा तब
जब सहनशीलता और
विवशताओं को धता बता
चल पड़ेगी वसुंधरा
अपने अस्तित्त्व की ऊँचाइयों की तरफ
ऊँचा.... और ऊँचा.....।
आसमां से भी ऊँचा..........!


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