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ISSN 2292-9754

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11.18.2014


रस्ता वही दिखाओ

अन्धकार के गर्त से बाहर,
हाथ पकड़ ले जाओ।
उजियारों के गाँव जो जाए,
रस्ता वही दिखाओ॥

देखी है दोरंगी दुनिया,
छल प्रपंच का जाल यहाँ।
फँसा कबूतर जाल के अन्दर,
जाए भी तो जाए कहाँ?
अन्तर्मन में द्वन्द्व मचा है,
आकर तुम सुलझाओ।
उजियारों के गाँव जो जाए,
रस्ता वही दिखाओ॥

कितने कितने प्रश्न खड़े हैं,
डाल के अपना डेरा।
किसने साँपों की बस्ती में,
बीन बजा कर छेड़ा।
दहक रही आँखों में ज्वाला,
आकर इसे बुझाओ।
उजियारों के गाँव जो जाए,
रस्ता वही दिखाओ॥

घृणा-द्वेष के विष-वमन से,
जन-जन टूट रहा है।
अपने-अपने सन्नाटों को
अन्दर घूँट रहा है।
कटना - बँटना छोड़ इन्हें,
जुड़ने की अदा सिखाओ।
उजियारों के गाँव जो जाए,
रस्ता वही दिखाओ॥


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