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| 04.04.2009 |
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नभ के पंछी |
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हरीमन बी की नज़रें तो नज़रें पर हाथ भी ग़ज़ब के पारखी थे। मानो आँखें हाथों
में ऊग आई हो। उसके हाथ इस कदर मुस्तैदी से आमों की छँटाई करते थे मानो एक
जोड़ी नहीं बल्कि कई कई जोड़ी सूक्ष्म आँखें हाथों में जड़ी हो।
कौन से आम का पाच डालना,
कौन से आचार के आम है, किस पाच को
कितने दिन रखना सब बातों में उस्तादों की उस्ताद थी हरीमन बी। होगी भी भला
क्यूँ नहीं जिस उम्र में बच्चे बस्ता लटकाए स्कूल जाते है उस उमर से अब्बू
के साथ आम के धन्धें में लगी थी हरीमन। पेड़ की पत्ती देखकर ही आम की पहचान
करना अपने अब्बू से ही सीखी थी। जब से अब तक आम का कितना ठेका भरना है सारा
सौदा वही तय करती आयी है। केवल पचास की उमर ही नहीं अब तो वह दादी बनने
वाली हैं। खलीफा का फोन आया था-
“अम्मा,
आजकल नगमा उल्टियाँ करने लगी है। जी पता नहीं कैसा कैसा
रहता है। न जाने कैसा रोग लगा है बस मीठा ही मीठा खावै है......”
“हा
ऽ यो ऽ ऽ रब्बा!”
अनायास ही फूट पड़ा था उसके मुँह से। बहुरिया पेट से है,
नादान लड़का इतना भी नहीं समझ पाया। दुनिया कहाँ से कहाँ
चली गई और एक यह है अपना खलीफा जो अपनी दुनियादारी ही ना जाने।”
फोन सुनकर बड़बड़ाती हुई हरीमन घर के भीतर घुसी थी। आँगन की
खटिया पर लेटे अख्तर मियाँ के कानों उसकी बड़बड़ाहट के अंतिम शब्द पहुँचे
थे।
“क्या
हुआ री खलीफा को?
तू यूँ ही बड़बड़ाती रहेगी कि कुछ बतायेगी भी.......”दमा
से पीड़ित अख्तर को खाँसी का दौरा उठा। वह खौं खौं कर खाँसने लगा। उसकी साँस
धौंकनी की तरह चलने लगी। खाँसी के साथ थूक का बगुला निकला और मियाँ ने
अधलेटे लेटे वही आँगन में
’पिच्च‘ से थूक दिया।
“उफ!”
कितनी बार कहा यहाँ-वहाँ मत थूका
करो। जब सारे दिन मक्खियाँ भिन्नभिनाएँगी तो कसूर मेरा होगा।”
हरीमन ने थूक पर राख डालते हुए कहा।
“क्या
कर दिया है खलीफा ने?
तू क्यों कोस रही है उसे?”
हरीमन चुनरी का पल्लू मुँह पर दाबे
’फिस्स‘ से हँस पड़ी।
“लो
इन्हें बताओ कि क्या किया है खलीफा ने।”
वह हाथ नचाकर गर्दन मटका कर बोली - जो तुमने अपनी जवानी
में किया होगा वही करेगा न वह भी।”
एक आँख टेढ़ी कर उसने कहा। मुस्कान उसके होठों पर अभी भी
खेल रही थी।
“तुम
से आगे भी कहीं जा सके है वो। तुम्हारा ही छोरा है।”
“अरी
बदजात कुछ बकेगी भी या यूँ ही पहेली बुझाती रहेगी।”
जब अख्तर मियाँ झुँझलाए से अपनी औकात पर उतर आये तो हरीमन
की भी त्यौंरियाँ चढ़ आयीं।
“ए
लो सुन लो कूंजड़े की बात। बाप न मारी मेढकी और बेटा तीरंदाज।”
खिसयाई सी हरीमन बिना खसम को बताए पहेली बुझाती हुई आम के
टोकरे को सिर पर धर बाहर निकल गई ।
अख्तर वही खटिया पर अधलेटा बड़बड़ाता रहा और डिबिया से जर्दा निकाल तम्बाकू
बनाने में लीन हो गया।
बहू के गर्भवती होने की बात सोच हरीमन का मन आम की बौराई डाली सा झूम झूमकर
मतवाला हुआ जा रहा था। अक्सर बेमेल दुपट्टा ओढ़ने वाली हरीमन की आज सजधज ही
निराली थी। उसका हरा दुपट्टा फ्रॉक और चूड़ीदार से मेल कर रहा था। आज तो वह
बड़े रसिक अंदाज में हँस-हँसकर
पेढ़ी पर बैठी ग्राहकों को आम तौल रही थी। उसके अधरों पर झूलती नाक की
नथनियाँ हँसी के साथ साथ इठला रही थी। नथनी के लाल मोती सुबह के उजास में
दप-दप कर रहे थे।
पास ही की पेढ़ी पर बैठी मुनियाँ से हरीमन की प्रसन्नता छिपी नही रही।
“री
ऽ आपा,
कहूँ आज क्या हुई ग्या? जो तेरी
कली-कली फूट पड़ रही है।”
मुन्नी की बात सुनी की अनसुनी कर हरीमन एकटक उसे देखने लगी
थी। अभी पिछले बरस ही तो मुन्नी के पोता हुआ था। सरकारी अस्पताल में।
ना...ना...बाबा....ना। वो तो मुन्नी थी जो सरकारी का जोखिम ले लिया। मुन्नी
से मिलने जब वह अस्पताल पहुँची थी तो उसकी आँखों में वो दृश्य जीवंत हो
उठा। कैसे मुन्नी उससे लिपट कर फफक पड़ी थी।
“ओ
ऽ री ऽ ऽ ईं...ईं...ईं आपा आज तो मैं कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रही।”
मुन्नी अर्थात हरीमन बी की छोटी चचेरी बहन। उसने जो आप बीती सुनाई वह हरीमन
के दिल के आईने में यूँ कि यूँ जड़ी हुई है -
’मुंई डाक्टर छोरिया बैठी बैठी चाय सुड़कती रही....ये पीर
कैसी होवै है? कुवांरी छोरियाँ ये दरद क्या
जाने.....पर नर्से? वे तो औरत जात होकर औरत का दरद
न जाने। सुब्बो बिचारी चीखती रही.....नर्से डपटती रही। चुपचाप सो जा अभी
देर है। बच्चा क्या यूँ ही होवै है? चल करवट ले और
करवट दिला कर जैसे ही वह मुड़ी कि बच्चा पाँख से बाहर। बदहवास मुन्नी
अस्पताल में इस छोर से उस छोर दौड़े -
“
अरे कोई तो सँभालो बच्चा हो गया है। अरे सिस्टर अरे
डाक्टरनी साहिबा आपके पैर पड़ूँ, खुदा कसम एक बार
जाकर सँभालो बच्चा बाहर आ गया है।”
“जाहिल
लोग है ऐसे ही परेशान करते हैं। चीख-चीखकर
पूरा अस्पताल सिर पर ले लिया है। ज़रा दो मिनिट दम तक नहीं मारने देते। मेडम
आप आराम से चाय पी लीजिये फिर देख लेना पेशेन्ट को। मैं अभी करवट दिला कर
आयी हूँ......”
हाँ सही कहूँ आपा। डाक्टरनी छोरियाँ हाथों पर दस्ताने पहने जित्ते और नाल
काटने के औजार आवै उत्ते तो बालक ने मैला पानी पी लिया।
हाय री दैय्या!
इतना बयान कर मुन्नी सुबकती रही। बड़बड़ाती रही-
“नौ
महीना बहू को बिस्तर से पैर नीचे नहीं धरने दिया... बहुतेरे दुख देखे पर
बहू से तिनका तक नहीं उठवाया....पर कुछ हाथ नहीं लगा।”
बहू के प्रसव को लेकर मन में उठी दहशत की ठीकरी,
सीधी बौराई हुई खुशियों पर जा लगी और क्षण भर में ही खुशी
डाल पे बैठे पंछी की तरह फुर्र हो गई।
’नहीं...नहीं सरकारी अस्पताल में लापरवाही बहुत होती है।
जच्चा-बच्चा की ठीक से परवाह नहीं की जाती। वो तो अपनी बहू को प्राईवेट
मेटरनिटी होम में ही ले जायेगी।‘ हरीमन ने आम तौलते
हुए निर्णय लिया। इतने में सामने सफेद मारूति कार आकर खड़ी हुई। उसमें से
निकली महिला हाथ में पर्स लटकाए उसी की ओर बढ़ रही थी। हरीमन की आँखें उसे
पहचान गई। उसके चेहरे की मुस्कान कुछ चौड़ी होकर पूरे मुँह पर पसर गई। वाणी
में शक्कर सी मिठास घोल वह बोली -
“बढ़िया
हापुस दूँ डॉक्टरनी बाईसा। ऐसा बढ़िया खुशबूदार मीठा गट आम कि आप याद करोगी
हरीमन कुंजड़ी को.....”
हरीमन मन ही मन पुलक उठी। खूब पहचाना उसने। यही तो वह
डाक्टरनी है श्यामा मेटरनिटी होम वाली। आमों के मौसम में कई पेटिया आम
खरीदती हैं। हरीमन भी बड़ी चालक रही। ऊपर असली हापुस में नीचे नकली हापुस
डाल और कभी डंडी मार आम दिये पर अब हरीमन ऐसा नहीं करेगी। उसने हाथ ऊपर उठा
अल्ला ताला से तौबा की।
हरीमन ने खूब छाँट-छाँटकर आम निकाले। आम देखकर डॉक्टरनी खुश हो गई। उसे
प्रसन्न देख हरीमन ने अपनी बहू के प्रसव कराने की बात चलायी।
“हाँ
हाँ ले आना मेटरनिटी होम पर। सारा चेकअप हो जायेगा और कार्ड भी बन जायेगा।”
अब जब भी खलीफा से फोन पर बात होगी वो कह देगी -
’बहू को यहीं ले आ। अब वो उसे यहीं रखेगी अपनी आँखों के
सामने। इतना प्यार देगी कि दुनिया भी देखे कि सासुएँ भी बहुओं से ऐसा लाड़
लड़ावै है।‘
फिर एक दिन खलीफा का फोन आया। हरीमन ने बहू को उसके पास ले आने की बात कही
और खलीफा मान भी गया कि वह समय आने पर ले आयेगा उसके पास।
उसके बाद वह रातभर सो नहीं पाती। जब नींद खुलती ताने-बाने
बुनती रहती। नगमा को कहा रखेगी पहला प्रश्न तो यहीं था। एक ही कोठरी का घर
था उसका। ’जब सर्दी में ्रसव होगा तो बिचारा
बुढ्ढा कहाँ जायेगा? सरदी में खुले आँगन में सोने
से तो रहा। नहीं तो सरदी के मारे बिचारा अकड़ जायेगा।‘
वह अख्तर मियाँ को बूढ़ा ही कहा करती थी। सोचा थोड़े दिन
बुढ्ढे को बाजी के घर भेज देगी। पर इन बकरियों का क्या होगा?
मुर्गियाँ तो पड़ी रहेगी अपने दड़बे में। कित्ती बार कहा कि
इन बकरियों को बेच बुचा कर नक्की करो पर बूढ़ा माने तब न दूसरे ही पल वह
सोचने लगी - ’बकरी है तो बहू को दूध मिला करेगा।
अच्छा हुआ जो उसने नहीं बेची।‘ उसे तसल्ली हुई। कल
दिन निकलते ही वह पंसारी के यहाँ से पुराना गुड़ ले आयेगी। गुड़ जितना पुराना
उतना अच्छा जचकी के लिए.......उसे अजवाईन भी खरीदनी होगी। वह सपने बुनने
लगी। देशी घी का पूरा डिब्बा चाहियेगा। बहुत खर्चा होगा। कहाँ से आयेगा
पैसा? खलीफा देगा? वो दे या
ना दे वो माँगेगी नहीं। वो इत्ती भी गई गुजरी नहीं है। वह कल से ही पैसा
जमा करना शुरू कर देगी अभी तो बहुत दिन बाकी है।
सुबह भोर का तारा उगने से पहले ही वह बिस्तर छोड़ उठ खड़ी हुई। आज कई काम
निबटाने है उसको। उसकी खटपट की आवाज सुन अख्तर मियाँ की नींद उचट गई -
“री
ऽ कौन जमाने की दुसमण है तू?
न सौवे है न सोने देवै।”
“यूँ
ही खटिया पे पड़ा-पड़ा दादा बन जायेगा। ऊँ हूँ! इसे कौन सा जोर आने वाला है।
एक अकेली मेरी जान और हजारों काम। ये क्या जाने?”
बड़बड़ाती हरीमन ने मुँह बनाया और फिस्स से दीवार पर थूंक
मारा। फिर क्या था दोनों में जो सुबह-सुबह तू-तू
मैं-मैं शुरू हुई सारे ही पड़ौसी जाग गये। सभी को पता चल गया कि अख्तर मियाँ
के घर पोता आने वाला है।
हरीमन बहू को प्रसव पर आने की तैयारी में जुट गई। अख्तर मियाँ की चाय पतली
और फीकी हो गई। अब उसे दिन में पाँच की जगह केवल दो बार ही चाय मिलने लगी।
इससे शक्कर की बचत होने लगी।आधा किलो दूध बेचने से आय भी होने लगी।
“रोज
रोज गुड की डली क्यूँ?
सब्जी नहीं छौंकी?
“क्यों?
तेल-घी नहीं बचाना, सब तुम्हें ही
खिला दूँगी तो बहुरिया को क्या खिलाऊँगी? ऐसे ही
पोता नहीं आवै। कौर-कौर पेट कटे तब पोते का मुँह देखना नसीब होवै।”
बिचारे अख्तर मियाँ पर बुरी बीत रही थी। इधर हरीमन बहू का
इंतजार करती। खलीफा फोन पर कहता -
“अबकी
लेकर आ रहा हूँ अम्मी। बस जल्द ही....”
हरीमन अँगुलियों पर दिन गिनती। हर रोज उल्टी गिनती
गिनती। इधर गिनती घटती उधर हरीमन के बटुए में नोट बढ़ते जाते। रोज के सौदे
में से दस बीस रूपये बटुए में पहुँच जाते।
’कल नगमा आ रही है जचकी पर‘ हरीमन
ने बटुआ निकाल कर नोट गिने। आज जाकर डॉक्टरनी से मिल आऊँ। दवा और फीस के
कुल कितने रूपये लगेंगे, पता लगा आऊँ। रिक्से में
बैठ वह मेटरनिटी होम पहुँची। अन्दर डॉक्टरनी बैठी थी बड़ी हँसमुख चेहरे
वाली। उसको देख कर मुस्कुरा पड़ी।
“बाईजी
पिछाणो कि नीं?
म्हूं हरीमन कुंजड़ी। देलीगेट रे कोने फल वाली....आम की
दुकान वाली हरीमन।”
“हाँ
हाँ हरीमन मैं अच्छी तरह पिछाण री हूँ। कहाँ है पेशेन्ट?”
“कल
लाऊँगी बाईसा। काले आयेगी वो।”
“ठीक
है तुम पैसा जमा कर कार्ड बनवा लो।”
हरीमन ने पैसे जमा करवा कर कार्ड बनवा लिया। फीस और दवाईयों का कुल खर्च
लगभग पाँच-सात हजार के आसपास होगा। इससे भी अधिक रूपया उसके पास जमा हो गया
था।
’अब वह नगमा को प्राईवेट नर्सिंग होम ले जा सकेगी। ये शहर
का सबसे बढ़िया अस्पताल है। थोड़ा मंहगा है पर कोई बात नहीं। इस बार आम के
ठेके थोड़े कम लेगी। जान है तो जहान हैं बच्चा जनना औरत का नया जनम होवै है।
जान के आगे पैसे का क्या मोल? पैसा तो हाथ का मैल
है।‘ उसने अपने मन को ढाढस बंधाया।
“जरा
हटना बाई”
पौंछा लगा रही सफाईकर्मी ने उसे टोंका तो वह चौंकी। फिनायल
की बास उसके नथुनों से टकराई तो बरबस ही उसके मुँह से निकल पड़ा -
“आह!
कितना साफ सुथरा और बेदाग अस्पताल है।”
डॉक्टरनी के बरताव और अस्पताल देख उसे अपने निर्णय पर पूरा विश्वास हो गया।
ठीक वैसा ही गहरा विश्वास जो आम का ठेका लेते समय उसे होता है। आम अच्छा
उतरेा,
गूदा ज्यादा और गुठली छोटी होगी,
मीठा होगा और दिखने बिल्कुल इसके जैसा। हरीमन की नज़र परिसर की दीवार पर लगे
खिलखिलाते नन्हे मुन्ने के पोस्टर पर अटक गई। बिल्कुल ऐसा ही पोता चाहिए
उसे।
वह प्रसन्नचित्त घर लौट आयी। बहू के लिए पूरा कमरा खाली कर दिया था उसने।
अख्तर मियाँ के सोने का प्रबंध बाजी के यहाँ हो ही चुका था। मुर्गियाँ भी
मुनियाँ को सौंप दी थी। आँगन के एक कोने में थोड़े फलों का ढेर पड़ा था। उसने
उन्हें व्यवस्थित किया। सब कुछ ठीक ठाक था,
’बस कल खलीफा बहू को ले आये‘। सुबह
जब दिन निकला तो वह हरीमन बी को वह और दिन से भी ज्यादा हसीन लगा। उसकी
बोटी-बोटी खिल रही थी। उसके हाथ में ग़ज़ब की फुर्ती
समायी हुई थी पर आँखें बाहर ड्योढ़ी पर लगी हुई थी। ज़रा सा खटका होता तो वह
बाहर देखने को लपकती। दिन शाम और फिर रात में ढल गया। एक दिन जिस तरह बीता,
दूसरा भी उसी तरह गुज़रा। हरीमन की इसके साथ ही बेचैनी
बढ़ने लगी। खलीफा का कोई फोन नहीं था। ’या अल्लाह!
कहीं बहू की तबीयत तो खराब नहीं हो गई?‘ वो आशंकित
होने लगी। पूरे दस दिन गुज़र गये खलीफा ने कोई सूचना नहीं दी। हरीमन की
आँखें बाट देखते-देखते थकने लगी। आखिर उसने खुद जाने का फैसला लिया था कि
उसी दोपहर खलीफा का फोन आया। वह बेताब सी फोन पर लपकी -
“अम्मा
तुम दादी बन गई हो। मुबारक हो”
“क्या
हुआ बेटा! तू नगमा को लाने वाला था?
मेरी आँखें तुम्हारे दीदार के लिए तरस गई......”
हरीमन का गला रूंधने लगा।
“नगमा
ने एक चाँद सी बेटी को जन्म दिया है......”
“हाय
अल्लाह! कब हुई मेरी पोती?
कैसी है वो? मैं अभी निकल पड़ती हूँ
वहाँ आने के लिए.......”
“नगमा
और नूरी बिल्कुल ठीक है। नाजनीन ऐसी जैसे खुदा का नूर हो......मम्मी ने
उसका नाम नूरी रखा है....”
“मम्मी
कौन...?”
“दरअसल
अम्मा,
नगमा ने अपनी मम्मी को बुला लिया था.....यहाँ सब ठीक से है”
इतना कहकर उधर से खलीफा ने फोन काट दिया। हरीमन बी स्तब्ध रह गई। उसकी पारखी नज़रें धुँधली हो आयी। अपने नूर के इस छलावे पर वह अपनी ही टोकरी में रखे फलों का सही अंदाज़ नहीं लगा पा रही थी। मानो उसकी आँखें धोखा खा रही हो। डबडबाई आँखों से उसने आसमान को देखा। साफ आसमान में पंछियों के झुंड विचर रहे थे। नीचे कई सारे दरखत उनके इन्तजार में खड़े थे। ये पंछी, किस डाल पर जाकर बैठेंगें? कहाँ अपना आशियाँ बनायेंगे......और वो किस डाली को आबाद करेंगे? ये किसे नहीं मालूम था। शायद हरीमन बी की पारखी नज़रों को भी नहीं। |
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