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ISSN 2292-9754

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10.31.2014


मैं आज़ादी ठुकराता हूँ

जब दुनिया की भीड़ में यारों
मैं खुद को तन्हा पाता हूँ
कुछ ऐसे मंज़र देख के यारों
मैं बोहोत डर जाता हूँ

बोझा ढोता बूढ़ा बाबा
जब भी कोई देखूँ मैं
अपने काँधे देख के यारों
शर्म से झुक सा जाता हूँ

जब कोई छोटी भूखी बच्ची
हाथ फैलाये आती है
घर बैठी अपनी बच्ची को
मैं सोच बोहोत घबराता हूँ

जब देखूँ उस बूढ़ी बी को
जिसकी आँखे है पथराईं
अपनी माँ को याद मैं कर के
बस रोता ही जाता हूँ

जब कोई औरत बिन पैराहन
सामने मेरे आती है
अपनी बीवी की साड़ी को
सोच बोहोत शर्माता हूँ

कोका कोला पीतीं नस्लें
जब भी यारों देखूँ मैं
गन्दा पानी पीते बच्चे
सोच सिहर सा जाता हूँ

गर यही है आज़ादी
और ऐसा मेरा हिन्दुस्तान
तो माफ़ी देना मेरे यारों
मैं आज़ादी ठुकराता हूँ


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