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11.15.2007
 
डूबते अंधेरे
विकेश निझावन

पूरा मोहल्ला दीपों की रोशनी से जगमगा उठा है। यह रोशनी केवल आज नहीं तीन दिन पहले से ही शुरू हो गई थी। बस कहीं अंधेरा था तो अनुराधा के यहाँ। अभी तीन माह पहले ही तो बेचारी के पति राहुल का देहान्त हुआ है।

खरबन्दा परिवार वालों ने तो अपनी तीन मंज़िला इमारत को पूरी तरह से झिलमिल करती लड़ियों से जड़ दिया है। खुशी जितनी अधिक हो प्रकाश भी उतना फैलाने को मन होता है।

खरबन्दा परिवार तो एक साथ तीन-तीन खुशियाँ मना रहा है। छोटी बहू के सात दिन पहले ही बेटा हुआ है। बड़ा बेटा रोहित भी अचानक ही अमरीका से आ पहुँचा है। और खरबन्दा साहब की अपनी प्रमोशन ही उनके पाँव ज़मीन पर नहीं टिकने दे पा रही।

मिसेज खरबन्दा तो रात पूरे मोहल्ले में न्यौता दे आयी थी- दीवाली की रात हमारे यहाँ ज़रूर आइयेगा। बबू अमरीका से आया है न। लक्ष्मी-पूजन मिल कर करेंगे।

- लक्ष्मी-पूजन या अमरीका की सड़ियाँ दिखाना चाहती हो? सुनयना ने व्यंग्य किया था।

-हाँ-हाँ  वह भी दिखाऊँगी।  तुम आओ तो!

दूसरों की खुशी खुशी तो देती है लेकिन कई बार दूसरे की खुशी में अपनी खुशी दबने लगे तो वह ईर्ष्या भी पैदा करती है।

मिसेज चोपड़ा ने तो सबके सामने हाथ नचाते हुए कह दिया था- आजकल विदेश जाना कौन-सा मुश्किल बात है मिसेज खरबन्दा। मैं तो खुद ही दो बार सिंगापुर हो आयी हूँ।

मिसेज खरबन्दा ने उसकी बात की ओर ज़रा भी कान नहीं धरे थे। सत्या और उर्मिल तो खी-खी करके हँस दी थीं।

मिसेज खरबन्दा जितने घरों में गई  दीवाली की मिठाई और उपहार ले जाना नहीं भूली थीं। इस बार खरबन्दा साहब मिठाई के डिब्बों के साथ कांच के छः गिलासों वाला गिफ्ट पैक भी ले आए थे।

मेहता की बहू ने डिब्बा खोला तो उछल पड़ी थी- हाय! कितने सुन्दर गिलास हैं। लेकिन मिसेज मेहता नाक-भौं सिकोड़ती बोलीं- काहे के सुन्दर! तीस रूपये से ज्यादा के न होंगे।

-ममी  गिफ्ट तो गिफ्ट होता है। उसको पैसे से नहीं तोला जाता।

-बस रहने दे तू। बड़ी आयी दूसरों की तरफ़दारी करने वाली। मिसेज मेहता गुस्से से भर आयी थी।

बहू कुछ नहीं बोली। जानती थी कि सासूजी ईर्ष्यालु प्रवृत्ति की हैं।

 

मिसेज खरबन्दा भले ही खुशी के अतिरेक में थीं किन्तु मन की बुरी नहीं हैं। अपने मिलनसार स्वभाव के कारण मोहल्ले के सब लोगों से खूब बना कर रखी है। किसी के यहाँ कोई सुख-दुख हो  मिसेज खरबन्दा सबसे पहले पहुँचती हैं।  कुछ लोग उन पर हँस भी देते हैं लेकिन मिसेज खरबन्दा स्पष्ट रूप से कहती हैं अगर सुख-दुख में भी पूरी तरह से साथ न दिया तो फिर आस-पड़ोस का क्या फायदा।

 

सभी के यहाँ दीवाली की बधाई देते हुए मिसेज खरबन्दा अनुराधा के यहाँ पहुँची थी। हालाँकि दीवाली देने वालों की सूची में अनुराधा का नाम कहीं नहीं था। कारण यह था कि यह सूची खरबन्दा की बड़ी बेटी मंजू ने बनायी थी। मंजू जानती थी कि अनुराधा के पति का देहान्त हुए अभी तीन महीने ही तो हुए हैं। इस बरस वह दीवाली नहीं मना पाएगी। लेकिन मिसेज खरबन्दा पूरे मन और उत्साह से अनुराधा के यहाँ पहुँची थी। अनुराधा का छोटा बेटा दूर छूटते पटाखों को गौर से देख रहा था।

अनुराधा को देखते ही मिसेज खरबन्दा ने लपक कर उसे गले लगाया था और मिठाई का डिब्बा उसकी ओर बढ़ाती बोलीं- अनुराधा बिटिया दीवाली मुबारिक हो!

अनुराधा की आँखें एकाएक छलछला आयीं- आप यह क्यों ले आयीं मिसेज खरबन्दा। आपको पता है इस बार हम दीवाली नहीं मनाने के। सोनू के पापा को अभी तीन महीने ही तो हुए हैं।

-ओह! में तो भूल ही गयी थी। लेकिन अगले वर्ष तो मनाओगी न दीवाली?

-हाँ! अगले वर्ष मनाऊँगी। अनुराधा ने टूटती आवाज़ मे जवाब दिया।

मिसेज खरबन्दा से रहा नहीं गया। बोलीं- तो अगले वर्ष सोनू के पापा ज़िन्दा हो जाएँगे क्या?

अनुराधा अवाक मिसेज खरबन्दा के चेहरे की ओर देखने लगी।

मिसेज खरबन्दा जानती थी अनुराधा इस बात से आहत होगी। सहसा आगे बढ़ कर उसका हाथ अपने हाथ में लेती बोलीं- मैं जानती हूँ मेरी बात तुम्हें बुरी लगी है। तू जानती है जाने वाले वापिस नहीं आते।  लेकिन ज़िन्दगी फिर भी चलती रहती है। तेरा यह जख़्म एक साल में भरने वाला नहीं है।  इसे वक्त लगेगा अभी। तुझे अब राहुल के अतीत के साथ नहीं सोनू के भविष्य के साथ जीना है।  देख तो कैसे गुमसुम सा बाहर दरवाज़े पर बैठा है।

इस बार अनुराधा की आँखों से झरना फूट पड़ा। मिसेज खरबन्दा देर तक उसे सहलाती रहीं।

अनुराधा जरा शान्त हुई तो मिसेज खरबन्दा उठती हुई बोलीं- अब मैं चलती हूँ। दीवाली पूजन पर तुम मेरे यहाँ आओगी। और तुम्हारे घर में भी मुझे पूरी रोशनी चाहिये। मत सोचना कि लोग क्या कहेंगे। सोनू का पूरा जीवन अभी तुम्हारे सामने है।

 

ठीक आठ बजे खरबन्दा परिवार के यहाँ दीवाली पूजन शुरू हो गया था। कुछ लोग इससे पहले ही खरबन्दा परिवार को दीवाली की बधाई और भेंट दे गये थे। कुछ लोग पूजन के समय भी आये थे। उन लोगों के बीच अनुराधा भी थी। मिसेज खरबन्दा ने तिरछी नज़रों से देख लिया था।

पूजन के बाद मिसेज खरबन्दा ने सभी को प्रसाद दिया। जैसे ही वे अनुराधा के पास पहुँचीं अनुराधा दबे से बोली- मैंने भी दीप जलाए हैं मिसेज खरबन्दा।

- अच्छा किया न!  प्रसाद के साथ-साथ मिसेज खरबन्दा ने अनुराधा को एक लिफाफा पकड़ाया- ये सोनू के लिये है।  पटाखे हैं इसमें। रोकना नहीं उसे।

अनुराधा अपलक मिसेज खरबन्दा के चेहरे की ओर देखने लगी तो मिसेज खरबन्दा तनिक मुस्कान बिखेरती बोलीं- रात तो आती है अनुराधा। लेकिन कुछ अंधेरों को हमें स्वयं डुबोना होता है।

इस वक्त अनुराधा के भीतर ताकत थी और एक उत्साह भी था जिसे वह घर पहुँचते ही सोनू की झोली में डाल देना चाहती थी।



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