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ISSN 2292-9754

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07.17.2016


सनसेट सरप्राइज़
(शुभा सरमा की पुस्तक "फ्लाई ऑन द वॉल एण्ड अदर स्टोरीज़" (लीफी पब्लीकेशन्स प्रा.लि.) में शामिल उनकी अंग्रेज़ी कहानी "सनसेट सरप्राइज़" का हिन्दी अनुवाद।)
मूल लेखिका : शुभा सरमा
अनुवादक : विकास वर्मा

मम्मी ने उसे हॉर्लिक्स का कप पकड़ाया तो वह चम्मच से उसे मिलाते हुए उगते सूरज को देखने लगी। उसकी छब्बीस साल की ज़िंदगी में यह शायद तीसरी या चौथी दफ़ा ही था कि वह उगते सूरज को देख रही थी। पहली बार उस दिन देखा था जब दादी गुज़र गई थीं और डैडी और मम्मी उनकी बॉडी हॉस्पिटल से लेकर आए थे। और उसके बाद तब, जब सुबह-सुबह पूनम मौसी, कारगिल में मौसा जी की मौत की ख़बर मिलने पर, रोते-बिलखते उनके घर आई थीं। तीसरी बार नींद भारी आँखों से उगते सूरज को तब देखा था जब उनके पड़ोस के घर में चोरों के एक गैंग ने सेंध लगाई थी और डबल मर्डर की जाँच के सिलसिले में पुलिस ने उन्हें जगा दिया था।

सूर्योदय जैसा इतना पवित्र और सुंदर दृश्य उसके जीवन में बुरी ख़बरों का संकेत कैसे बन गया था?

"शालिनी, तुम्हें पेपर चाहिए?" जब मम्मी उसे शालू न कहकर शालिनी बुलाती थीं, वह समझ जाती थी कि मम्मी उसे लेकर परेशान हैं। इसीलिए उसने एक बनावटी मुस्कराहट चेहरे पर ओढ़ ली थी, लेकिन मम्मी-डैडी में से किसी से भी वह अपनी परेशानी छिपा नहीं पायी थी और तैयार होने के बहाने से अपने कमरे की तनहाई में गुम हो गई थी।

आमतौर पर, काम पर जाने के लिए तैयार होना उसे बेहद पसंद था। वह हमेशा बहुत ध्यान से तैयार होती थी, लेकिन हाल के दिनों में यह तैयारी और भी बढ़ गई थी। वह अपने कपड़ों को बहुत ध्यान से चुनती और फिर उन्हीं के हिसाब से साज-सँवार का बाक़ी सामान इस्तेमाल करती। पिछले छह महीनों से, आई एन ए मार्केट मेट्रो स्टेशन से कनॉट-प्लेस तक का उसका रोज़ का सफ़र उस एक शख़्स की वजह से कुछ ख़ास-सा बन गया था।

शालिनी को अभी तक उससे वह पहली मुलाक़ात याद थी- दिवाली की वजह से मेट्रो में ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ थी और वह अपने पीछे खड़े आदमी की बेहूदा हरकतों से बचने की कोशिश कर रही थी। उसे रोना आ रहा था, पर तभी यह देखकर उसे हैरानी हुई कि एक अनजान शख़्स ने उसके लिए अपनी सीट छोड़ दी और एक ढाल की तरह उसके और उस घिनौने आदमी के बीच खड़ा हो गया। राहत की साँस लेते हुए, शालिनी ने सिर झुकाकर उसे शुक्रिया अदा किया और बाक़ी का सफ़र चुपके-चुपके उस शख़्स को निहारते हुए बिताया। वह मिल्स एंड बूंस के नायक की तरह तो नहीं था लेकिन बिना दाढ़ी-मूछ का उसका युवा चेहरा-मोहरा उसे घायल करने के लिए काफ़ी था। उस दिन से पहले शालिनी ने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया था, लेकिन दिवाली के मौक़े पर हुई इस अचानक मुलाक़ात के बाद वह हर कहीं नज़र आने लगा था।

उनकी ये मुलाक़ातें, अगर इन्हें मुलाक़ात मान लिया जाए तो, बिना लफ़्ज़ों की होती थीं। वे एक-दूसरे को देखकर मुस्कराते और फौरन नज़रें इधर-उधर कर लेते। वह शालिनी से पहले मेट्रो पकड़ लेता था और जिस दिन भीड़ ज़्यादा होती, वह हमेशा अपनी बगल की सीट उसके लिए रोक कर रखता था। कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ होने की वजह से जब वह उसके कंधे के पास सट कर खड़ी होती, तो उसका मन करता था कि वह अपने सिर को उसके कंधे पर रख दे। ऐसा करने से वह ख़ुद को बड़ी मुश्किल से रोक पाती थी। वह जानती थी कि यह सब बड़ा नाटकीय-सा था, लेकिन क्या यह नाटक ही प्यार की रूमानियत को कुछ ख़ास नहीं बना देता! कल तक शालिनी उस अनाम अजनबी के साथ अपने बेलफ़्ज़ रिश्ते से संतुष्ट थी। लेकिन आज उसके सपने चकनाचूर हो रहे थे। यह काफ़ी कुछ उस 'पहले प्यार' को खो देने जैसा था जो रूमानी क़िस्सों में वह अब तक पढ़ती आई थी।

कल शाम मम्मी ने शालिनी को बताया था कि मिस्टर कपूर और उनकी पत्नी, अपने बेटे के साथ, के-लाउंज में कॉफी पर उनसे मिलने आ रहे हैं। यह कोई आम मुलाक़ात नहीं थी बल्कि अपनी होने वाली बहू से मिलने का एक शालीन तरीक़ा था। इसी प्रथा को आमतौर पर उत्तर भारत में लड़की देखना कहा जाता है। कई पीढ़ियों से उनके परिवार की शादियाँ इसी तरह से तय होती आ रही थीं। पूनम मौसी को तो चाय की ट्रे के साथ उस कमरे में जाना पड़ा था जहाँ उनके होने वाले सास-ससुर मुस्कराते हुए उनके माता-पिता के साथ बैठे थे। शालिनी को इस मुश्किल क़वायद से तो छूट मिल गई थी लेकिन फिर भी "देखने-परखने" की प्रक्रिया से तो उसे गुज़रना ही था। आम हालातों में उसे इस सब से कोई शिकायत नहीं होती, बल्कि शायद शादी के ख़याल से वह ख़ुश ही होती। लेकिन कल, उसने ख़ुद को दुविधा के बादलों से घिरा हुआ पाया।

मम्मी, हमेशा की तरह, समझ गई कि कुछ गड़बड़ है।

"क्या बात है शालिनी? क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कोई है? तुम जानती हो हम कभी तुम पर यह ज़ोर नहीं डालेंगे कि तुम अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी करो। अगर कोई लड़का है तो मुझे बताओ; तुम्हारे डैडी और मैं जा कर उसके माँ-बाप से मिलकर सब ठीक कर देंगे।"

शालिनी चुप रही। वह अपने बारे में तो जानती थी। पर उसके बारे में? क्या वह भी उसे पसंद करता है? या फिर साथ सफ़र करने वाली एक मजबूर लड़की की मदद उसने महज़ इंसानियत के नाते की थी। या उससे भी बदतर, अपने एक-जैसे सफ़र की बोरियत को दूर करने के लिए यह सिर्फ़ एक सस्ता मनोरंजन था। एक-दूसरे को देखकर मुस्कराने, चुपके से निहारने और कभी-कभार उँगलियों से छू-भर लेने के अलावा, उन्होंने कभी एक शब्द भी एक-दूसरे से नहीं बोला था। और अगर वह पहले से ही शादीशुदा हुआ तो? हिंदुस्तान की औरतों का सिंदूर और मंगलसूत्र तो बाक़ी दुनिया को यह बताने के लिए काफ़ी होता है कि वह शादीशुदा है, लेकिन आदमियों के मामले में ऐसा कोई संकेत नहीं होता।
"नहीं मम्मी। ऐसा कुछ नहीं है।"

इन शब्दों के साथ, शालिनी ने अपनी भावनाओं को हमेशा के लिए दबाकर आगे बढ़ने का संकल्प कर लिया। उसने फ़ैसला किया कि आज आख़िरी बार वह 9:23 की मेट्रो लेगी। कल से वह 8:58 की मेट्रो पकड़ेगी और काम पर कुछ जल्दी पहुँच जाया करेगी। एक बार इस अध्याय को बंद कर देने के बाद, इसे दोबारा शुरू करने में कोई समझदारी नहीं थी। लेकिन बस आज, आख़िरी बार वह उसे देखना चाहती थी; शायद बताना चाहती थी कि वह किसी और से शादी करने जा रही है और उसकी प्रतिक्रिया से उसकी भावनाओं को पढ़ना चाहती थी। उसके दिल में उम्मीद की एक हल्की सी किरण अभी भी जल रही थी कि शायद सब ठीक हो जाए।

वह चिंता भरी आँखों से उस कोच की भीड़ में उसे तलाशती रही जिसमें वे हमेशा सफ़र करते थे। लेकिन वह नहीं आया। जब आख़िरी रोशनी बुझ जाती है तो कोई आवाज़ नहीं होती; ख़्वा बों के चकनाचूर होने और दिल के टूटने की भी आवाज़ नहीं होती। और इसीलिए, शालिनी की सिसकियाँ मेट्रो के शोर में गुम हो गईं।

*

उसने कम से कम साज-सिंगार और गहनों के साथ गुलाबी चंदेरी रेशमी साड़ी पहनी थी। यह रंग उसके साँवले चेहरे पर फब रह था और इससे इस बात का पता नहीं चल पा रहा था कि उसके चेहरे की रंगत दूसरे दिनों के मुक़ाबले फीकी थी। उसके छोटे 'पिक्सी स्टाइल' बाल उसके सिर पर चमकदार टोपी की तरह लग रहे थे और उसके सुंदर नैन-नक्श के साथ खूब जंच रहे थे। डैडी ने उसके परिष्कृत सौंदर्य को देखकर अपनी खुशी का इज़हार किया और मम्मी ने बुरी नज़र से उसे बचाने के लिए उसके कान के पीछे एक छोटा सा काला टीका लगा दिया। उसे पता था कि अपनी पूरी कोशिश के बावजूद, वह बहुत कमज़ोर दिखाई दे रही थी। उसकी आँखों में सूनापन था और ज़िंदगी की चमक वहाँ से गायब हो गई थी। उसके होंठों के कोने जैसे उदासी और अस्वीकृति के भाव से झुके हुए थे। उसे कोई उत्साह, कोई उत्सुकता महसूस नहीं हो रही थी और न अपने रूप-रंग को लेकर कोई गर्व ही हो रहा था। उसने इस ख़ास तरीक़े से साज-सिंगार किया था क्योंकि सब उससे ऐसी उम्मीद कर रहे थे। कुछ ही देर में एक महंगे फ़र्नीचर पीस की तरह उसकी जाँच-परख की जाने वाली थी और इसी भाव से उसने ख़ुद को अभिव्यक्त किया था।

शाम ठीक 6:15 पर, जब क्षितिज पर गुलाबी-नारंगी रंग का सूरज दिखाई दे रहा था, वे के-लाउंज पहुँचे और देखा कि मिसेज़ और मिस्टर कपूर पहले से ही वहाँ इंतज़ार कर रहे थे।

"सॉरी आपको इंतज़ार कराया," डैडी ने मिस्टर कपूर से हाथ मिलते हुए कहा।

"नहीं, असल में हम ही पहले आ गए। प्लीज़ आप लोग बैठिए। रोहित बस पाँच मिनट में आने वाला है। वह ऑफिस से सीधे यहीं आ रहा है।"

शालिनी ने ध्यान से कपूर दंपति को देखा। वे एक आम उच्च मध्यमवर्गीय जोड़े की तरह दिखाई दे रहे थे। 'उसके' माँ-बाप कैसे दिखते होंगे? क्या वे उससे मिलने के लिए कोई दूसरा तरीक़ा अपनाते?

"आह! रोहित आ गया।" मिस्टर कपूर ने अपने बेटे की तरफ हाथ हिलाया।

जैसे ही शालिनी ने उस इंसान से मिलने के लिए ख़ुद को तैयार किया जो भविष्य में उसका पति हो सकता था, उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा और उसकी हथेलियाँ चिपचिपी-सी हो गईं। पिछले कुछ घंटों से ख़ुद को इन सब बातों से अलग-थलग रखने के बावजूद, अचानक उसे एक अजीब सा डर महसूस होने लगा। क्या यह ठीक होगा कि वह शादी एक इंसान से करे और अपने दिल में किसी और का सपना देखे? क्या यह विश्वासघात नहीं होगा? इससे बेहतर यह होगा कि वह कुँवारी ही मर जाए। उसे यहाँ आने से मना कर देना चाहिए था, मम्मी को सच्चाई बताने की हिम्मत उसमें होनी चाहिए थी और इस ढोंग का हिस्सा बनने से उसे इंकार कर देना चाहिए था। वह किसी भी हालत में इस शादी के लिए तैयार नहीं हो सकती। यह पाप होगा, इन लोगों के ख़िलाफ़ एक जुर्म होगा। और आखिर में सच सामने आ ही जाएगा और तब शर्मिंदगी के सिवा कुछ बाक़ी नहीं रहेगा। एक सिहरा देने वाली शर्मिंदगी। उसके क़दमों की आहट पास आ रही थी। शालिनी के कानों में उसके दिल की धड़कनों की आवाज़ इतनी तेज़ आने लगी मानो उसे बहरा कर देगी। कुछ पलों बाद, दिल की धड़कनों के शोर में उसे एक कोमल युवा स्वर सुनाई दिया और कुछ शर्माते हुए उसने ऊपर देखा......यह तो वही था! वह भी उतनी ही हैरानी के साथ उसे देख रहा था। फिर उसने एक ऐसी मुस्कराहट के साथ शालिनी को देखा जो शुरू तो उसके होंठों से हुई थी लेकिन जिसकी चमक उसकी आँखों तक पहुँच गई। अचानक, शालिनी की दुनिया में इंद्रधनुष के रंग और मीठे संगीत की लहर घुल गई। और इस सबके बीच, के-लाउंज की खिड़की से नज़र आ रहे चमकीले सूरज के सामने, रोहित अपनी युवा मुस्कराहट के साथ खड़ा था।

शायद, सूरज भी मुस्करा रहा था।


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