अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
05.07.2015


चले जा रहे हैं.....

चले जा रहे हैं बस चले जा रहे हैं,
नहीं पता किधर, नहीं पता कहाँ,
बढ़े जा रहे हैं बस बढ़े जा रहे हैं।

झूठे हैं रास्ते झूठी हैं मंज़िलें,
झूठे हैं हमसफ़र झूठे हैं क़ाफ़िले,
झूठी हैं ख़्वाहिशें झूठी हैं हसरतें,
झूठी बुनियादों पे झूठी इमारतें,
झूठी उम्मीदों पे जिये जा रहे हैं,
जीने की चाह में मरे जा रहे हैं।

चले जा रहे हैं बस चले जा रहे हैं,
नहीं पता किधर, नहीं पता कहाँ,
बढ़े जा रहे हैं बस बढ़े जा रहे हैं....।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें