अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.28.2014


अचानक....
मूल लेखिका : शुभा सरमा
अनुवादक : विकास वर्मा

शुभा सरमा की पुस्तक “फ्लाई ऑन द वॉल एण्ड अदर स्टोरीज़” (लीफी पब्लीकेशन्स प्रा.लि.) में शामिल उनकी अंग्रेज़ी कहानी “ए चांस एनकाउंटर” का हिन्दी अनुवाद। श्रीमती शुभा सरमा 1999 बैच की आई.ए.एस. अधिकारी हैं और यह इनकी पहली पुस्तक है।

बारिश बहुत तेज़ हो रही थी। लगता था जैसे सामने एक पर्दा टाँग दिया गया हो जो आगे के दृश्य को धुँधला बना रहा था। रोशनी मंद पड़ती जा रही थी और हवा चीख-चीखकर उसकी आँखों में पानी के थपेड़े मार रही थी, जिससे देख पाना और भी मुश्किल हो रहा था। ऐसे हालात में यह लगभग नामुमकिन था कि आगे की सड़क साफ नज़र आए। जीप की हेडलाइटें इस भयानक काली रात में ज़्यादा दूर तक रोशनी नहीं डाल पा रही थीं और प्रबीर गड्ढों से बच निकलने की नाकाम कोशिश कर रहा था। उसके बूढ़े ड्राइवर को मोतियाबिंद की तकलीफ़ के कारण फिलहाल लगभग पूरी तरह से दिखाई देना बंद हो गया था और वह बगल की सीट पर बैठा ठंड से काँप रहा था। अभी एक घंटा पहले ही उसके ज़ोर देने पर उसने गाड़ी चलाना बंद किया था। प्रबीर को उसकी नाकाबिलियत पर गुस्सा तो आया लेकिन यह जल्द ही हमदर्दी और अफ़सोस में बदल गया, क्योंकि उसे महसूस हो गया था कि ऐसे मौसम में, इन फिसलन भरी और खस्ताहाल सड़कों पर गाड़ी चलाना कितना मुश्किल काम था। आखिरकार एक बूढ़े आदमी से कितनी उम्मीद की जा सकती थी। उनका सफ़र धीमा और थकान भरा था लेकिन प्रबीर ने अभी तक कम से कम किसी बड़े हादसे से तो ख़ुद को बचा ही लिया था। आगे रंगापारा का छोटा गाँव पड़ता था और उन्हें उम्मीद थी कि एक बार वहाँ पहुँचने पर उन्हें रात बिताने के लिए कोई न कोई जगह मिल जाएगी। तभी, अँधेरे में एक ब्लैक एँड व्हाइट बोर्ड नज़र आया। यह नंगापरिया टी-स्टेट का साइन-बोर्ड था। प्रबीर ने एक पल में ही फैसला किया कि वहीं किस्मत आज़माई जाए और फौरन मुख्य सड़क को छोड़ते हुए गाड़ी संकरे रास्ते पर मोड़ दी।

रास्ता कच्चा और झाड़ियों से भरा हुआ था। मूसलाधार बारिश के कारण प्रबीर को जीप चलाने में बेहद मुश्किल हो रही थी। लगभग दो किलोमीटर बाद, उन्होंने देखा कि एक फाटक के कारण रास्ता बंद था। उसका ड्राइवर बोरा छाता लेकर नीचे उतरा। अपने पाँवों की अकड़न के कारण उसकी चाल बेढंगी हो रही थी। उसने फाटक खोला और वे नंगापरिया टी-स्टेट के भीतर आ गए। कच्चे रास्ते की जगह अब पथरीला रास्ता शुरू हो गया था जो पुराने बंगले तक जाता था। बरामदे में एक लालटेन अपनी पूरी रोशनी के साथ जल रही थी।

बोरा चौकीदार को ढूँढकर ले आया, जो हालाँकि एक बूढ़ा आदमी था, लेकिन इसके बावजूद उसकी चाल-ढाल में गज़ब की चुस्ती दिखाई देती थी। वह तूफ़ान में भटके इन दोनों अजनबियों को आसरा देने के लिए तैयार हो गया। देश के इस हिस्से में बारिश और तूफ़ान का आना आम बात है, और चूँकि ये अचानक और तेज़ गति से आते हैं, इसलिए हमेशा एक डर-सा बना रहता है। आमतौर पर यहाँ कोई भी परिवार तूफ़ान में भटके लोगों को आसरा देने से मना नहीं करता, और नंगापरिया के उस चौकीदार ने भी इस परंपरा को नहीं तोड़ा। भीतर, बंगला काफी सुंदर तरीके से सजाया गया था और बेहद व्यवस्थित था। उसके वास्तु-शिल्प पर औपनिवेशिक और असमी, दोनों तत्वों का मिला-जुला असर था। कमरे चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे खंभों वाले बरामदे से घिरे थे। कमरों की ऊँची छतें खुलेपन का एहसास करा रही थीं। प्रबीर ने कल्पना की मानो ताक के नीचे अलाव में आग अपनी पूरी लौ में जल रही हो और सुंदर पोशाकों में पुरुष और महिलाएँ काष्ठ-फलक से सजे कमरे में भोजन कर रहे हों। जब वह बंगले की साज-सज्जा और बनावट की तारीफ़ कर रहा था, चौकीदार उसके लिए गर्म काली चाय ले आया, जिसे वहाँ ‘लाल साह’ के नाम से जाना जाता है। इस अप्रत्याशित मेहमाननवाज़ी ने उन्हें काफी राहत पहुँचाई। चौकीदार का बर्ताव दोस्ताना था और इस वीराने में इन दोनों की मौजूदगी उसे अच्छी लगी। एक छोटी मेज़ पर बैठकर वह उनसे बतियाने लगा। उसने बताया कि एक समय यह बंगला नंगापरिया टी-स्टेट के असिस्टेंट मैनेजर का था। कई असिस्टेंट मैनेजर अपने परिवार के साथ इस बंगले की विस्तृत चारदीवारी में रहते आए थे। हालाँकि यह एक सौ पचास साल पुराना था, लेकिन वक्त की मार का सामना इसने बखूबी किया था। अब यह खाली पड़ा था क्योंकि चाय का बागान बंद हो चुका था। जिस परिवार के पास स्टेट का मालिकाना हक था, वह काफी बुरे वक्त से गुज़रा था और चाय के कारोबार में दिलचस्पी लेने वाला अब कोई नहीं बचा था। बागान में झाड़-झंखाड़ उग आए थे और वह अस्त-व्यस्त हो गया था। केवल बंगले का इस्तेमाल कभी-कभी उनके द्वारा किया जाता था जब वे सप्ताह के आखिरी दिनों में छुट्टियाँ बिताने के लिए गुवाहाटी से नीचे आया करते थे। पाँच साल पहले, जब से परिवार कलकत्ता में बस गया था, तब से कोई यात्रा नहीं हो पाई थी। चौकीदार अपने परिवार के साथ आउटहाउस में रहता था। कुछ आदिवासी भी उसके साथ रहते थे जो पहले चाय-बागान में काम किया करते थे। जब चौकीदार उन्हें अपने किस्से सुना रहा था, उसकी बहन ने प्रबीर के लिए एक कमरा तैयार कर दिया। बोरा को मुख्य इमारत से लगा एक छोटा कमरा दे दिया गया। जब उन्हें भरोसा हो गया कि वह आराम से है, तो वे उसके लिए खाना लाने चले गए।

बंगले ने प्रबीर पर जादू का-सा असर किया था। उसमें पुराने ज़माने के ऐशोआराम की झलक अभी भी देखी जा सकती थी- पुराना शानदार फर्नीचर, बड़े-बड़े पर्दे, फ्रेम में जड़ी तस्वीरें और पुराने ब्लैक एँड व्हाइट फोटो। चौकीदार और उसका परिवार काफी वफ़ादार मालूम पड़ते थे, क्योंकि धूल का एक कण भी कहीं दिखाई नहीं देता था और हरेक चीज़ बेहद करीने से उसी जगह रखी गई थी जहाँ उसे होना चाहिए था। तभी, प्रबीर को एक अजीब-सा डरावना एहसास हुआ मानो बंगले के लिए वक्त रुक गया हो और उसे अभी भी अपने असली मालिक के लौटने का इंतज़ार हो, लेकिन उसने इस एहसास को ज़्यादा हावी नहीं होने दिया।

चावल और माछी झोल के सादे भोजन के बाद, बोरा चौकीदार के साथ आउटहाउस में चला गया। बंगले को बंद कर दिया गया और प्रबीर उसमें अकेला रह गया।

तूफ़ान में काफी मुश्किल भरे सफ़र की थकान के कारण और जल्दी सोने की आदत की वज़ह से प्रबीर जल्दी ही गहरी नींद में डूब गया। बंगले की छत, जो अँग्रेज़ी के ‘ए’ आकार की थी, से टकराती बारिश की ‘टप-टप’ की आवाज़ से उसकी नींद खुल गई। केवल रात की जानी-पहचानी आवाज़ें सुनाई दे रही थीं– खुली खिड़की के बाहर एक मेंढक टर्रा रहा था, दूर उल्लू की धीमी आवाज़ सुनाई दे रही थी, झींगुरों का गुनगुनाता स्वर कानों में पड़ रहा था। बिस्तर पर लेटे-लेटे उसने अपने मौजूदा हालात के बारे में सोचा। उसकी एचएमटी घड़ी में रात के 1.13 बजे थे। तभी, उसे दोबारा वही आवाज़ सुनाई दी- वही आवाज़ जिसे सुनकर वह जाग गया था- तेज़ खाँसी की आवाज़। उसके भीतर का डॉक्टर सक्रिय हो उठा। इससे पहले कि वह अपनी तर्कबुद्धि के आधार पर कुछ सोचकर रुक पाता, खाँसी की दवा की शीशी के साथ वह दरवाज़े से बाहर निकल आया। बंगला रोशनी से जगमगा रहा था। गोल बरामदे में, रेशमी गाऊन पहने एक बूढ़ा आदमी बाँस से बने सोफ़े पर बैठा था। उसके सामने मेज़ पर शतरंज की बिसात सजी हुई थी। सफ़ेद मोहरों की तरफ से चाल चल दी गई थी और काली मोहरों की तरफ से जवाबी चाल का इंतज़ार किया जा रहा था। बीच-बीच में खाँसी के हमले के कारण उसका शरीर काँप जाता था।

“श्रीमान, इससे आपको कुछ राहत मिलेगी। लेकिन मेरी सलाह है कि आपको अपनी जाँच करानी चाहिए। आपको एंटी-बायोटिक की खुराक की ज़रूरत हो सकती है।”

बूढ़े आदमी के चेहरे से कुलीनता झलक रही थी और उसके सिर के बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे। अपनी धूसर आँखों से, जिनमें मोतियाबिंद के शुरूआती लक्षण दिखाई दे रहे थे, उसने प्रबीर पर एक चुभती हुई निगाह डाली। उसके चौड़े माथे और चौकोर आकार के चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई थीं जो उसे चरित्र और गरिमा प्रदान करती थीं। प्रबीर ने सोचा शायद वह भी कोई भटका हुआ राही है जो आसरे की तलाश में यहाँ आया है। लेकिन चौकीदार ने तो बंगले में किसी दूसरे मेहमान के बारे में नहीं बताया था। इसका मतलब है कि वह बाद में यहाँ आया था?

“तो आप एक डॉक्टर हैं,” आवाज़ गहरी और साफ थी जो बूढ़े आदमी के आकर्षक व्यक्तित्व से मेल खाती थी।

“जी हाँ जनाब। इस तूफ़ान में मैं अपना सफ़र जारी नहीं रख सका। चौकीदार की दया रही कि उसने मुझे आसरा दिया। कल, बल्कि आज ही, मेरा नुमालीगढ़ जाने का विचार है जहाँ मैं काम करता हूँ।”

“चूँकि आपके पास कुछ घंटे अभी बाकी हैं, आइए शतरंज की एक बाज़ी हो जाए। आपको काली मोहरों से खेलने में कोई परेशानी तो नहीं?”

खुद भी शतरंज के खेल का बेहद शौकीन होने के कारण प्रबीर फौरन तैयार हो गया। दोनों में कड़ा मुक़ाबला चल रहा था और प्रबीर अपने काबिल प्रतिद्वंद्वी को काँटे की टक्कर दे रहा था। जैसे ही खेल निर्णायक चरण में पहुँचा, बूढ़े आदमी ने अचानक प्रबीर से पूछा, “आप किस वक्त यहाँ से निकलेंगे?”

“मैंने सोचा है श्रीमान कि छ्ह बजे निकलना ठीक रहेगा।”

प्रबीर ने बाहर देखा कि अभी भी पानी बरस रहा था।

“आपको भरली नदी पार करनी पड़ेगी। डोलाबारी में। आपको अभी निकल जाना चाहिए’” हालाँकि बात धीरे से कही गई थी लेकिन उसमें कितनी चिंता का भाव था, इसे समझने में प्रबीर से कोई गलती नहीं हुई। अभी 4.30 बजे थे।

“यह बाज़ी तो खत्म हो जाने दीजिए, जनाब।”

“नहीं, आप अभी निकलिए।”

प्रबीर को बूढ़े आदमी के इस बर्ताव से बेहद हैरानी हुई। वह शतरंज के खेल का पूरा मज़ा ले रहा था। उसने बहुत सावधानी से अपना जाल बिछाया था। तीन या चार चालें और, और बूढ़े आदमी के हाथी और घोड़े का काम-तमाम होने वाला था। शायद बूढ़े आदमी ने उसके दाँव को पहचान लिया था, जो असल में एक आम दाँव था। उसका अहम् हार स्वीकार करने की इज़ाज़त नहीं दे रहा था और इसीलिए वह अपनी इज़्ज़त बचाने का रास्ता ढूँढ रहा था। फिर भी, उसकी सहजबुद्धि उसे यह एहसास भी करा रही थी कि शायद यह असली वज़ह नहीं है। किसी तरह का तमाशा करने की प्रबीर की इच्छा नहीं थी, इसलिए वह अपने कमरे में लौट गया। उसने जल्दी से कपड़े पहने और अपना सामान बाँधकर बोरा को ढूँढने चला गया। काफी सुबह का वक्त होने के बावजूद बोरा तैयार था। दिन की रोशनी में बोरा को पूरा विश्वास था कि वह गाड़ी ठीक से चला पाएगा। बरामदे में जीप को लाने के बाद उसने प्रबीर का बैग रखा और चौकीदार को बुलाने चला गया। प्रबीर ने आखिरी बार बंगले को देखा। सामने के कमरे में टँगे एक ब्लैक एंड व्हाइट पोर्ट्रेट ने उसका ध्यान खींचा। नज़दीक से देखने पर उसने पाया कि उसकी शक्ल रहस्यमयी ढंग से उस बूढ़े से मिलती थी। वह बूढ़ा अब कहीं नज़र नहीं आ रहा था। अचानक प्रबीर को एक अजीब-सी प्रबल अनुभूति हुई कि उसे फौरन उस जगह को छोड़ देना चाहिए।

*

सुबह के 5.30 बज गए थे और प्रबीर को उम्मीद थी कि वे 6.00 बजे तक भरली नदी का पुल पार कर लेंगे। बोरा ध्यान से गाड़ी चला रहा था और चूँकि सड़कें खाली थीं, वह गाड़ी तेज़ चला रहा था। 8.00 बजे तक वे नुमालीगढ़ पहुँच गए। जल्दी-जल्दी नहाकर और नाश्ता करके, प्रबीर डिस्पेंसरी में अपने सहकर्मियों के पास पहुँच गया। दिन की पाली में प्रबीर पाँच अन्य नवयुवकों के साथ काम करता था। उनका काम था नुमालीगढ़ अस्पताल को नियमित रूप से और भली-भाँति चलाना। उनकी टीम अच्छी थी और उनके आपसी संबंध शानदार थे। दोपहर के खाने के वक्त, प्रबीर ने अपने अनुभव और वापसी के रोमांचक सफ़र के बारे में उन्हें बताया। देबू फुकन नाम का एक डॉक्टर तेज़पुर से था जो नंगापरिया के काफी नज़दीक है। जैसे ही प्रबीर ने अपनी कहानी पूरी की, एक सन्नाटा छा गया। और फिर देबू ने एक किस्सा सुनाना शुरू किया जो उसके द्वारा अभी तक सुने गए सभी किस्सों में सबसे अविश्वसनीय था।

नंगापरिया का आखिरी असिस्टेंट मैनेजर बिनोद बोरठाकुर था, एक कुलीन भद्रपुरुष जो अकेले रहना पसंद करता था और शतरंज में जिसकी बेहद दिलचस्पी थी। एक दिन, उसका इकलौता बेटा नागाँव से लौट रहा था, जब भरली नदी में अचानक आई बाढ़ के कारण डोलाबारी में उसकी गाड़ी बह गई। कहा जाता है कि दमे के मरीज़ उस बूढ़े आदमी को अपने बेटे की मौत की ख़बर तब मिली जब वह अपने बंगले में बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था। बूढ़ा उस सदमे को सह नहीं सका और बाँस से बने सोफ़े पर बैठे हुए, अपने उस बेटे का इंतज़ार करते-करते उसकी मौत हो गई जो कभी लौटकर नहीं आया। उसके सामने शतरंज की बिसात सजी हुई थी।

प्रबीर उस तूफानी रात की घटनाओं को याद करते हुए, स्तब्ध चुप्पी के साथ बैठा था। नॉर्मल और पैरा-नॉर्मल के बीच की रेखाएँ उसके मस्तिष्क में धुँधली पड़ती जा रही थीं। फोटोग्राफ, दमे के मरीज़ की खांसी की आवाज़, शतरंज की बिसात। कई सारे इत्तेफाक उसके सामने थे। वह पत्थर बना बैठा था, जब दूसरे लोगों ने तीन बजे के स्थानीय समाचार सुनने के लिए टीवी खोला। न्यूज़ रीडर की आवाज़ सुनाई दे रही थी.......

“आज सुबह लगभग 6.05 बजे, भरली नदी के बढ़ते पानी में डोलाबारी का पुल बह गया। पुल पार कर रही बस में सवार पंद्रह लोगों के बह जाने का अंदेशा है। तलाश और खोजबीन अभियान..............”


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें