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ISSN 2292-9754

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09.06.2016


जमुना
मराठी कहानी "जमुना"
मूल लेखक - रवीन्द्र पिंगे
अनुवादक - विकास वर्मा

सब भली-भाँति जानते हैं कि बिहार में अनेक प्रचंड नदियाँ बहती हैं। ज़ाहिर है इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इस राज्य में पानी की कोई कमी नहीं होनी चाहिए। लेकिन सच्चाई क्या है? सूखा। भीषण, भयंकर गर्मी। आधा बिहार इस सूखे के हमले से हमेशा त्रस्त रहता है। न तो यहाँ बारिश होती है, न ओस ही पड़ती है। धरती यहाँ स्थायी रूप से झुलसी हुई और पूरी तरह से शुष्क नज़र आती है। मीलों तक बस रेत, कंकड़ और काला चूना-पत्थर। जहाँ घास का पनपना भी मुश्किल हो वहाँ गेहूँ और चने के बचे रहने की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है।

फिर भी यहाँ के बाशिंदे खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं। ख़ासतौर पर दक्षिणी बिहार के चायबासा क्षेत्र के लिए ऐसा कहा जा सकता है। साल-दर-साल के सूखे ने यहाँ की मिट्टी को सुखा डाला है। आदत से मजबूर ये लोग रोज़ सुबह-सुबह अपने औज़ार उठाते हैं और खाली पेट किसी तरह खेतों तक पहुँच जाते हैं। वहाँ ये ख़ुद को इतनी मेहनत के साथ झोंक देते हैं जितना इनके लिए मुमकिन हो। भूख लगने पर निगल लेते हैं रूखा-सूखा चना-चबेना जो अपने छोटे-छोटे बंडलों में ये साथ बाँधकर लाते हैं। और जब गर्मी की तपिश सहन नहीं हो पाती तो दूर किसी पेड़ की छाया में शरण ले लेते हैं। जब सूरज छिपने लगता है तो ये फिर से काम के लिए खेतों में पहुँच जाते हैं और तब तक काम में जुटे रहते हैं जब तक अँधेरा न हो जाए। इनमें से किसी के भी परिवार में बहुत ज़्यादा सदस्य नहीं होते, क्योंकि ऐसा इनके लिए मुमकिन भी नहीं है। उन्हें क्या तो खिलाएँगे? क्या पहनाएँगे?

इसे नियम माना जा सकता है कि बिहारी पुरुष सख़्त जान होते हैं। उनके शरीर काफ़ी कष्ट झेल सकते हैं। दो वक़्त की रोटी के लिए रोज़ वे कोयले की खदानों में कड़ी मेहनत कर लेंगे। जिन्हें कोयले की खानों में नौकरी की उम्मीद नहीं होती वे किसी तरह कलकत्ता पहुँच जाते हैं। वहाँ वे रिक्शा चलाते हैं। ट्राम और बस चलाते हैं। ढाबे की भट्टियों पर झुककर दाल-भात बनाते हैं। बोझा ढोते हैं। ज़िंदा रहने की इस लड़ाई में, उनके पास पीछे मुड़कर देखने का कोई वक़्त नहीं होता। कलकत्ता के फुटपाथों पर गुज़र-बसर करते हुए, तेज़ बारिश से बचने के लिए वे सड़क-किनारे की दुकानों में शरण ले लेते हैं। शायद हज़ारों की इस भीड़ में से कोई इक्का-दुक्का बिहारी बाबू ही इस शहर को छोड़कर वापस अपने सूखा-पीड़ित गाँव की ओर लौटा हो। और जिसे कलकत्ता में काम नहीं मिलता, वह इलाहाबाद चला जाता है या फिर वाराणसी में जाकर पसीना बहाता है।

इन परिस्थितियों में, तीस-पैंतीस साल की विधवा, जमुना अपने दुधमुँहे बच्चे के साथ कर ही क्या सकती थी? ऐसा कोई नहीं था जिसे वह अपना कह सकती हो। उसके गुज़र चुके पति के परिवार में ग्यारह लोग थे जिनके खाने का इंतज़ाम करना होता था। इस कुटुंब के सात सदस्य हमेशा बेरोज़गार रहते थे। साहूकार ने उसे काम पर रखने से मना कर दिया था और उसे उधार देने के लिए कोई तैयार नहीं था। इसलिए पंचायत बुलाई गई। गाँव वालों को यह सलाह देने में ग्राम प्रमुख को कोई संकोच नहीं हुआ कि जमुना को बेच दिया जाए। "इससे एक व्यक्ति को खिलाने का बोझ कम हो जाएगा। लेकिन इसकी लड़की बड़साई इसके साथ नहीं जाएगी," प्रमुख ने कहा। "अभी बच्ची को अपने पास रखो। सिर्फ जमुना को बेच दो।"

*

पड़ौस के गाँव के महादेव को अभी तक शादी के लिए कोई औरत नहीं मिल पाई थी। वह हकलाता था और लंगड़ाकर चलता था। मवेशियों की देखभाल करना उसका काम था। वह मीलों दूर पैदल चलकर तालाब से पानी लाता, अपनी धोती को धोता और सुखाता था। लेकिन बस इतना ही वह करता था। लोग कहते थे वह मंदबुद्धि था। फिर भी, कुछ अर्थों में, वह सब कुछ समझ सकता था।

उसके बाप ने एक बड़ी ब्याज़ दर पर तीन हज़ार रुपए उधार लिए। गवाहों की मौजूदगी में उसने ये पैसे जमुना के ससुर को दिए, और जमुना को घर ले आया। अगर वह ठीक से पेश आई तो वे महादेव से उसकी शादी करने की सोचेंगे।

अपने पहले पति के बाद, महादेव के साथ रहना जमुना को आसान लगा। अगर उसे चार रोटी खाने के लिए दे दी जाएँ तो वह संतुष्ट हो जाता था। कोई गुस्सा-वुस्सा नहीं, कोई चीखना-चिल्लाना नहीं, कोई मार-पीट नहीं। न ही वह उसके ऊपर पति होने का रौब झाड़ता था।

लेकिन जमुना खाने का एक निवाला भी अपने मुँह में नहीं डाल सकी। वह यही सोचती रही कि उसकी बेटी बड़साई कैसी होगी? क्या कर रही होगी? क्या उसे याद करके रोती होगी? काश वह घर से भाग पाती। वह अपनी बेटी के बिना नहीं रह सकती थी।

फिर एक रात, जब सारी दुनिया चाँद की रोशनी में डूबी हुई थी, जमुना को थोड़ी हिम्मत मिली। वह पीछे के दरवाज़े से बाहर निकल गई।

अगले दिन पूरे गाँव में बस एक ही बात पर चर्चा हो रही थी- जमुना भाग गई! पूरा गाँव उसकी खोज में लग गया। उस क्षेत्र का चप्पा-चप्पा छान डाला गया। लेकिन जमुना का कोई नामोनिशान न था।

महादेव को इस सबकी कोई जानकारी नहीं थी। बल्कि उसने तो यह भी ध्यान नहीं दिया कि जमुना घर पर नहीं थी।

*

तीसरे दिन सुबह-सुबह, जमुना महादेव के दरवाज़े की चौखट पर खड़ी नज़र आई। परिवार के सब लोग स्तब्ध रह गए। फिर वे फट पड़े, "कहाँ थी बेशर्म? किस गंदगी में मुँह मार रही थी?"

"मैं अपनी बच्ची, अपनी बड़साई से मिलने गई थी।"

"तो मिल ली उससे?"

"नहीं। मुझे गाँव का रास्ता नहीं पता था। इसलिए आधे रास्ते से ही लौट आई।"

"जाने से पहले तूने किसी को बताया क्यों नहीं?"

"मैं डर गई थी।"

"झूठ। सब झूठ। तू अपने यार से मिलने गई थी।"

"नहीं, नहीं। मैं ऐसी नहीं हूँ।"

"नहीं यह सच नहीं है। तू वहीं आँगन में खड़ी रह। घर में घुसने की जुर्रत मत करना। तुझे कुछ नहीं मिलेगा, पानी की एक बूंद भी नहीं।"

जमुना वहीं खड़ी रही, बिना हिले, थकान से चूर ।

महादेव को नहीं पता था क्या हो रहा था।

*

उस रात पूरा गाँव इकट्ठा हुआ। निर्णय लिया गया। जमुना को निर्वस्त्र खुले में खड़े रहने की सज़ा दी गई। उसे पानी भी नहीं दिया जाना था। न ही उसे हिलने की इजाज़त थी। गाँव की औरतों को उस पर नज़र रखनी थी।

बिहार के गाँवों में रातें काफ़ी ठंडी हो जाती हैं। फिर भी, निर्वस्त्र जमुना किसी तरह ज़िंदा बच गई। अगले दिन, वह नहाई, साड़ी पहनी और घर पहुँच गई। परिवार के लोग उसे देख ग़ुस्से से लाल हो गए। अगर यह कलमुँही दोबारा भाग गई तो पूरे गाँव का नाम ख़राब होगा। और महादेव के लिए कोई दूसरी औरत भी नहीं मिल पाएगी।

फिर, पाँच पहाड़ियों के पार बसे एक गाँव से यह ख़बर आई कि गोपाल नाम के डाकिए को पत्नी की ज़रूरत है। गाँव वाले पाँचों पहाड़ियों को पार कर वहाँ पहुँचे और पूरी जाँच-पड़ताल की। गोपाल डाकिए की पत्नी गुज़र चुकी थी। वह काफ़ी उम्रदराज़ था और उसे गाँजा पीने की बुरी लत थी, लेकिन उसे आमदनी नियमित होती थी। इसलिए एक सौदा पक्का किया गया। गोपाल डाकिए को तीन हज़ार रुपए नकद गिनकर देने थे, और बदले में वह जमुना को अपने साथ ले जा सकता था। एक बार वह चली गई, तो गाँव पर पड़ा बुरा साया भी दूर हो जाएगा। और सभी गाँव वालों को पूरी-खीर की दावत भी मिल जाएगी।

महादेव के बाप के घर में तीन हज़ार के नोट आ गए। जमुना ने चुपचाप घर की चौखट से बाहर क़दम रखा और पाँच पहाड़ियों के पार जाने के लिए, लंगड़ाकर चलने वाले गोपाल डाकिए के पीछे चल दी। परिवार के लोगों ने चैन की साँस ली। खीर और पूरी की दावत के बारे में सोचकर, गाँव वाले फूले नहीं समा रहे थे।

महादेव नहीं जानता था क्या हो गया था।

*

जमुना ने गोपाल डाकिए के घर में मुश्किल से एक हफ़्ता बिताया। अँधेरे में छिपकर वह भाग गई। पाँचों पहाड़ियों को पार कर, एक दिन सुबह-सुबह, अधमरी हालत में वह महादेव के दरवाज़े पर पहुँच गई।

महादेव के परिवार के लोगों ने पीट-पीटकर उसका कचूमर निकाल दिया। उसे भूखा रखा। गोपाल डाकिया भागता-भागता उसके पीछे आया। ग़ुस्से से पागल होते हुए उसने महादेव के बाप के पुरखों सहित हर किसी को जमकर कोसा। "तुम दो बाप की औलादो, हरामज़ादो, चुपचाप मेरे तीन हज़ार लौटा दो, वरना मैं ठेकेदार को बुलाऊँगा और पूरे गाँव में आग लगवा दूँगा। मैं शिकायत करूँगा कि तुमने मेरे डाक के थैले चुराए हैं, सरकारी दस्तावेज़ चोरी किए हैं। मैं ऐसी सौ शिकायतें दर्ज़ करवाऊँगा और तुम सबसे जेल में पत्थर तुड़वाऊँगा। मेरे पैसे अभी वापस करो, नहीं तो......।"

गाँव वाले, जिन्होंने खीर-पूरी की भरपूर दावत उड़ाई थी, जल्दी-जल्दी इकट्ठा हुए। वे सदमे में थे। "यह जमुना औरत है या डायन?" वे पूछ रहे थे। फिर उन्होंने एक सुर में कहा: महादेव के बाप को, किसी भी तरह, पैसे का इंतज़ाम करना ही होगा। उसे गवाहों की मौजूदगी में फौरन तीन हज़ार रुपए गोपाल डाकिए को लौटाने होंगे।

महादेव के बूढ़े लाचार बाप ने किसी तरह से पैसे इकट्ठे किए। बतौर गवाह गाँव के बड़े-बुज़ुर्गों की मौजूदगी में उसने ख़ुद को गोपाल डाकिए के ऋण से मुक्त किया। लेकिन जमुना को अपने घर में घुसने की इजाज़त उसने नहीं दी। वह गोशाला में बैठी रही। फिर, सिर झुकाकर वह दूसरी औरतों के पीछे खेतों में चली गई। उसकी तरफ फेंके गए रोटी के टुकड़ों के साथ ही उसने उनकी गालियों को भी निगल लिया। "बेवकूफ़, यहीं गोशाला में निठल्ली बैठी रह," वे चिल्लायीं। लेकिन किसी ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि वह उस घर से भागी क्यों जहाँ उसे सिर छिपाने के लिए छत और खाने के लिए रोटी मिली थी?

महादेव को पता ही नहीं चला क्या हो रहा था।

*

ऐसा नहीं था कि गाँव वालों को यह ख़बर मिली, बल्कि यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि किसी ने जाकर पता किया कि चायबासा के पुलिसवाले- तारानाथ को अपने घर के लिए एक औरत चाहिए। वो भी बिना किसी देरी के। लेकिन वह इसके लिए दो हज़ार से एक कौड़ी भी ज़्यादा देने के लिए तैयार नहीं था। "अगर तुम राज़ी हो तो उसे भेज दो। मगर उस औरत को सब काम करने होंगे। हुक्का तैयार करना होगा, पीकदान धोना होगा, रोज़ जूते चमकाने होंगे। इसके अलावा, झाड़ू-पोंछा और चूल्हा-बर्तन तो हर औरत का काम होता ही है। शाम को उसे बोतल और गिलास तैयार रखना होगा। ये उसके रोज़मर्रा के काम होंगे। इसके साथ ही, उसे रोज़ खेतों में जाना होगा। एक बैल मर गया है। इसकी जगह उसे लेनी होगी और चारे की गाड़ी को खींचना होगा। खेत को साफ़ रखना होगा। अगर ये सब काम नहीं किए गए तो इसका जवाब उसे तारानाथ को देना पड़ेगा। मैं एक गड्ढा खोदूँगा और उसमें उसे दफ़ना दूँगा। उसका नामोनिशान भी कहीं बाक़ी नहीं रहेगा। तो? तैयार हो तुम? बोलो। तुम्हें मंज़ूर है यह? ये रहे दो हज़ार। इसे लो और औरत को भेज दो।"

गाँव में बैठक हुई। "पुलिस वाले के घर में, कम से कम, कोई भूखा नहीं मरेगा," सबने कहा। "बाक़ी बातों से हमें कोई लेना-देना नहीं। जो भी हो गाँव को इस अमंगल से छुटकारा दिलाना ही होगा।"

महादेव के बाप ने पूछा, "लेकिन एक हज़ार रुपए के नुकसान का क्या?"

"यह तुम्हें भुगतना होगा। तुम अपने घर में एक डायन लेकर आए और गाँव का नाम ख़राब किया, फिर भी इतनी हिम्मत से पूछ रहे हो कि मेरे एक हज़ार का क्या? चुपचाप दो हज़ार में जमुना का सौदा करो। और अगर यह डायन एक बार और तुम्हारे दरवाज़े पर दिखाई दी, तो तैयार रहना, एक ही रात में अपने घर और सामान से हाथ धो बैठोगे।"

तारानाथ पुलिसवाला पहुँच गया। उसका डंडा उसकी कमर से लटक रहा था। घर में घुसते ही उसने महादेव के बाप के सामने दो हज़ार की गड्डी फेंकी और बोला, "ध्यान से पैसे गिनो और उसके बाद फ़ौरन औरत को, वो जो कोई भी है, सामने करो।"

भूखी, अधमरी जमुना लड़खड़ाती हुई तारानाथ पुलिसवाले के पीछे-पीछे बाहर चली गई।

महादेव को समझ ही नहीं आया वहाँ क्या चल रहा था।


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