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05.03.2012
 
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा
विजय विक्रान्त

जीवन में अक्सर बार बार
यूँ ऐसे भी दिन आते हैं
जब मन उदास हो जाता है
या फिर खुशी के बादल छाते हैं
उस समय आत्मा के ये शब्द
हमें बार बार जतलाते हैं

संतुलित रहो और धैर्य धरो,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा

महायुद्ध में जीत कर राजा ने
अपने शत्रु का मुँह तोड़ दिया
छीना राज पाट धन दौलत और
उसे भिखारी बना कर छोड़ दिया
हुआ घमण्ड जब उस अहंकारी राजा को
अंतर आत्मा ने आके झँझोड़ दिया

किस बात पे फूलते हो पगले,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा

रणभूमी में घायल होकर
उस वीर की देह लहूलुहान हुई
पर देश की रक्षा करने की
उसकी प्रतिज्ञा और बलवान हुई
तन का जब साथ था छूटने लगा
मन में आस्था फिर यूँ महान हुई

मैं हूँ वीर लड़ाकू सेनानी,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा

आया जीत के जुआरी जुए से जब
पीकर खूब वो शराब फिर मदमस्त हो गया
नहीं होश उसे किसी दुनिया की
वो तो अपनी ही दुनिया में मस्त हो गया
टूटा उसका नशा जब अगले दिन
पुरानी हारों को याद करके पस्त हो गया

उसे स्वयं को आभास होने लगा,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा

मरुस्थल को पार करने के लिए
अपने घर से चला इक बंजारा
बीच राह उसे जब प्यास लगी
गिर पड़ा वहीं पर बेचारा
देह के पूरे निढाल होने पर भी
हिम्मत ने कहा- तू क्यों हारा

थोड़ा प्रयत्न करो, उठो आगे बढ़ो,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा

इस बाढ़ ने कैसा विनाश किया
घर बार हैं सब के बहा डाले
छोटे बच्चों को देख बिलखता हुआ
माँ बाप ने हथियार वहीं डाले
आशावादी दिल के इन शब्दों ने
साहस सब के फिर यूँ बढ़ा डाले

तुम वीर लड़ो वीरों की तरह,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा

जीवन के उतार चढ़ाव पे सब
करें स्वयं अपने पर हम विश्वास
चढ़ाई पर नहीं घमण्ड करेंगे हम
उतराई पर नहीं होंगे हम निराश
अमर संदेश सदा यह हमारे को
देगा ज्ञान, करें हम बुराई का नाश

करे याद ’विजय’ इन शब्दों में,
यह पल भी यूँ ही गुज़र जाएगा


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