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05.03.2012
 
 यह जीभ
विजय विक्रान्त

इस बड़े शरीर की तुलना में
यह छोटी सी इक बेचारी है
पर रूप हैं इसके अनगिनित
कभी नम्र है कभी कटारी है
 

गहरे जीभ के घाव के आगे तो
तलवार की चोट तो कुछ भी नहीं
तलवार की चोट है भर जाती
जीभ के घाव का कोई इलाज नहीं

बैठे सरस्वती जब इस जिह्वा पर
वातावरण मधुर है बन जाता
कोमल हृदय के तार झनक उठते
द्वेष क्लेश वहाँ से है मिट जाता

जब प्रेम जिह्वा पे निवास करे
हर बात से फूल बरस जाते
और मुखड़े की इस मुस्कान से तो
मुरझाये हृदय भी खिल जाते

घायल की तड़प और पीड़ा में
जहाँ तन के घाव नहीं भरते
वहाँ प्यार भरे दो शब्द मगर
मरहम से अधिक असर करते
 

कटु शब्द और क्रोध के मिश्रण से
सोचने का संतुलन है खो जाता
ये वो तीर है कमान से निकल, फिर
वापिस तरकश में नहीं आता

क्रोध शांत होने पर फिर तुम को
तुम्हारे शब्द तुम्हारी आत्मा को बींधेंगे
उनकी चोट होगी भाले की नोक समान
उनकी गर्ज से तुम्हारे कान गूँजेंगे

सब जान बूझ कर भी फिर हम
अब कठोर शब्द नहीं बोलेंगे
करे विनती विजय सब मित्रों से
विनय भाव से हम सब बोलेंगे


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