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इस
बड़े शरीर की तुलना में
यह छोटी सी इक बेचारी है
पर रूप हैं इसके अनगिनित
कभी नम्र है कभी कटारी है
गहरे
जीभ के घाव के आगे तो
तलवार की चोट तो कुछ भी नहीं
तलवार की चोट है भर जाती
जीभ के घाव का कोई इलाज नहीं
बैठे
सरस्वती जब इस जिह्वा पर
वातावरण मधुर है बन जाता
कोमल हृदय के तार झनक उठते
द्वेष क्लेश वहाँ से है मिट जाता
जब
प्रेम जिह्वा पे निवास करे
हर बात से फूल बरस जाते
और मुखड़े की इस मुस्कान से तो
मुरझाये हृदय भी खिल जाते
घायल
की तड़प और पीड़ा में
जहाँ तन के घाव नहीं भरते
वहाँ प्यार भरे दो शब्द मगर
मरहम से अधिक असर करते
कटु
शब्द और क्रोध के मिश्रण से
सोचने का संतुलन है खो जाता
ये वो तीर है कमान से निकल, फिर
वापिस तरकश में नहीं आता
क्रोध
शांत होने पर फिर तुम को
तुम्हारे शब्द तुम्हारी आत्मा को बींधेंगे
उनकी चोट होगी भाले की नोक समान
उनकी गर्ज से तुम्हारे कान गूँजेंगे
सब
जान बूझ कर भी फिर हम
अब कठोर शब्द नहीं बोलेंगे
करे विनती विजय सब मित्रों से
विनय भाव से हम सब बोलेंगे
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