अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
पहले मैं तो छोड़ के देखूँ
विजय विक्रान्त

चुन्नू को गुड़ खाने की बहुत बुरी आदत थी। सारा दिन बस उसको गुड़ चाहिए। परिणम यह हुआ कि उसका फुंसी और फोड़ों से बुरा हाल हो गया। माँ बाप अलग परेशान क्योंकि वो किसी की सुनता नहीं था। बस गुड़ खाने से मतलब।

बहुत जतन किए पर सब बेकार। दवाई का असर तो जब हो जब वो गुड़ खाना छोड़े। बस यही क्रम चलता रहा। कुछ दिन बाद पता चला कि गाँव में एक बहुत सिद्ध साधू आया हुआ है जो सब मुरादें पूरी करता है। चुन्नू के पिता बनवारी लाल ने सोचा कि क्यों न साधू महाराज से बिनती करूँ, शायद कुछ काम बन जाए और इसका गुड़ खाना छूट जाए। यह सोच कर बनवारी लाल चुन्नू को साथ लेकर साधू के पास गया और सारी कहानी सुनाने के बाद बोला कि महाराज इसका कुछ करो। साधू ने पहिले चुन्नू की ओर देखा फिर बनवारी की ओर देख कर कहा कि एक सप्ताह के बाद आना।
एक सप्ताह के बाद बनवारी लाल चुन्नू को लेकर साधू को मिलने गया। साधू ने थोड़ी देर तक चुन्नू की ओर देखा और फिर आँखों में आँखें डाल कर कहा कि बेटा गुड़ खाना छोड़ दो, यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है। इतना कह कर साधू ने दोनों बाप बेटे को घर जाने को कहा।

घर पहुँचते ही बनवारी लाल हैरान कि चुन्नू ने गुड़ नहीं माँगा। यही नहीं उसने तो कुछ दिन बाद गुड़ खाना बिल्कुल छोड़ दिया। धन्यवाद देने के लिए बनवारी लाल साधू के पास पहुँचा। धन्यवाद देने के बाद उस ने साधू के पैर पकड़ लिए और पूछा कि महाराज जब आपके बस कहने मात्र पर चुन्नू ने गुड़ खाना छोड़ दिया तो आप ने मुझे एक सप्ताह बाद क्यों बुलाया।

साधू कहने लगे कि बेटा बनवारी लाल, जिस दिन तुम चुन्नू को लेकर आए थे उस दिन मैं ने भी गुड़ खाया हुआ था। उसको कुछ कहने से पहिले मैं यह देखना चाहता था कि क्या मैं भी गुड़ खाना छोड़ सकता हूँ। उस एक सप्ताह में मैं ने गुड़ को हाथ तक नहीं लगाया था। यही कारण है कि मेरे कहने का चुन्नू पर फ़ौरन असर हो गया।

चुन्नू को कुछ शिक्षा देने से पहिले मैं तो छोड़ के देखूँ कि यह मेरे लिए सम्भव है या नहीं तभी मैं उसको कुछ कह सकता हूँ।

यह सुन बनवारी लाल ने साधू के पैर पकड़ लिए और घर की ओर चल पड़ा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें