अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

होली का हुड़दंग
विजय विक्रान्त



होली का आया पावन पर्व
जिस पर हम को है अपार गर्व
स्वागत में आपके आज
यहाँ सजाई हम ने रंगोली है

है अबीर गुलाल का दिन प्यारे
पिचकारियाँ तान लो तुम सारे
इक दूजे को रँग दो तुम रंग से
सतरंगों की आज ये होली है

इन्द्र धनुष के रंगों से तुम सब की
पिचकारी की धार से तुम सब की
हालत को ऐसा बना डालो
शकल सब की लगे जैसे भोली है

कोई शकल पहचान न पाए यहाँ
हम एक समान लगे सब यहाँ
कोई कुर्ती शरीर पे सूखी न हो
लगे ऐसा कि रंग से धो ली है

इस छेड़छाड़ में साजन ने
रंगों को भरा गोरे तन में
शरमा के गोरी ने बलम से कहा
तू ने रंग दी आज मेरी चोली है

मद मस्त चाल से हम सारे
गाएँ नाचें जैसे मतवारे
होठों से लगालें उसको हम
ठण्डाई जिस में घोली है


ठण्डाई पिएँ जी भर कर सब
और बर्फ़ी भांग की खाएँ सब
फिर ऐसी दुनिया में जा पहुँचें
जहाँ मतवालों की टोली है

फिर उसके बाद सभी मिलकर
हुड़दंग मचाएँ सभी मिलकर
नाचें गाएँ उछलें कूदें
लेके आज बहाना कि होली है

हो दिन ये मुबारिक आज सब को
खुशियों का ख़ज़ाना मिले सब को
हो उसकी सदा कृपा दृष्टी
जिसने भर दी ये सब की झोली है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें