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| 05.07.2008 |
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भाग्य का लिखा टल नहीं सकता |
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बनारस के
ज्योतिषाचार्य पण्डित कपिलदेव के बारे में प्रसिद्ध था वो जन्म कुण्डली और
ग्रहों का अध्ययन करके किसी का भी भविष्य ठीक ठीक बता सकते थे। कभी कभी तो
यदि ग्रहों का चक्कर अनुकूल न हो तो उपाय भी सुझा देते थे। अभी तक उनकी
भविष्यवाणी या उचित उपाय सदा सच होते आए थे और दूर दूर के लोग उनको बहुत
मानते थे तथा सम्मान देते थे।
कपिलदेव
जी के परिवार में केवल पत्नी योगेश्वरी देवी और पुत्री कलावती थी। जैसे
जैसे कलावती बड़ी होने लगी,
योगेश्वरी देवी को उसके विवाह की चिंता होने लगी। वो बार बार पति को ये बात
याद दिलाती थी कि वो जल्दी से जल्दी पुत्री के हाथ पीले कर दें। कपिलदेव जी
को भी अपनी ज़िम्मेवारी का पूरा एहसास था मगर एक भविष्य की घटना जो उन्हें
घुन्न की तरह खाए जा रही थी,
उसे वो पत्नी से कहते हुए बहुत घबरा रहे थे। आखिर पत्नी के बहुत आग्रह करने
पर वो बोले
–
“योगेश्वरी,
तुम क्या समझती हो कि मुझे इस बात का फ़िक्र नहीं है। मैंने कलावती की
कुण्डली कई बार देखी है और हर बार इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि ये कन्या
विवाह के तीन साल बाद विधवा हो जाएगी।”
कपिलदेव
की ये बातें सुनकर योगेश्वरी बोली,
“हे
नाथ अगर इस के भाग्य में यही क्खा है तो इसका कोई उपाय भी तो होगा।”
“उपाय
तो अवश्य है परंतु ग्रह इतने बलवान हैं कि कोई भी उपाय काम नहीं करेगा।”
ऐसा कहकर कपिलदेव दुखी होकर रो पड़ा।
योगेश्वरी
देवी बहुत सहनशील औरत थी। उसने दिल नहीं छोड़ा और पति से आग्रह किया कि जो
भी उपाय है हम उसे करेंगे। आप बस वर तलाश में लग जाओ। माता पिता ने
एक योग्य वर ढूँढ कर मकर संक्रांति के दिन शादी का महूरत निकाला। सब
ग्रहों का अध्य्यन करके कपिलदेव ने एक चाँदी का कटोरा लिया और उसके बीच में
एक बहुत छोटा सा सुराख कर के पानी में तैरने के लिए छोड़ दिया और बोले,
“ग्रहों
के अनुसार जब ये कटोरा पानी से भर कर डूब जाएगा वही फेरों का महूरत होगा और
बुरी घड़ी टल जाएगी।”
उधर
कलावती अपने पूरे साज शृंगार से सुसज्जित थी। सोने चाँदी और मोतियों के
आभूषण उस पर बहुत अच्छे लग रहे थे। उस ने भी चाँदी के लोटे की बात सुनी और
उसे देखने को उत्सुकित हो गई। पिता की आज्ञा लेकर अपनी सहेलियों सहित वो
नीचे आई और जहाँ लोटा तैर रहा था वहाँ सिर झुका कर सुराख में से पानी को
आता देखने लगी और थोड़ी देर बाद वापिस चली गई। उसे क्या मालूम था कि जब वो
झाँक कर कटोरे में देख रही थी तो उस के सिर के आभूषण का एक मोती कटोरे में
गिर गया है और कटोरे के उस छोटे से सुराख को बन्द कर दिया है। इधर सारे लोग
लोटा डूबने की इंतज़ार में थे कि कब लोटा डूबे और कब शादी की रसम शुरू हो।
कपिलदेव के हिसाब से लोटे को डूबने में कोई दो घण्टे लगने चाहिये थे मगर जब
इस बात को तीन घण्टे हो गए और लोटा फिर भी नहीं डूबा तो सब ने वहाँ जाकर
लोटे का निरिक्षण किया और जो पाया उसे देख कर चकित हो गए। हालाँकि शादी का
महूरत निकल चुका था मगर लड़के वालों के आग्रह करने पर शादी कर दी गई। ठीक
तीन साल बाद वही हुआ जिसका डर था।
ज़ोर
लगाले मनुष्य तू कितना,
भाग्य
पलट न पाओगे
हाथ
की रेखाओं में जो लिखा है,
उसी
को बस तुम पाओगे |
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