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ISSN 2292-9754

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11.29.2014


मैं कहाँ का शायर

मैं कहाँ का शायर
मैं कहाँ का कवि
बोलता है कोई
मैं बस सुनता हूँ
कोई लिखवाता है
मैं तो बस लिखता हूँ
दुखः मुझे हो या
और किसी को
दर्द मुझे हो या
और किसी को
मैं तो बस
महसूस करता हूँ
ये हवा, ये पर्वत,
ये फूल पत्ते
ये बदलते मौसम
ये दिलकश नज़ारे
न जाने करते हैं
किस ओर इशारे
सर्दी के दिन और
लम्बी लम्बी रातें
ज़माने से छुप के
ख़ुद से वो बातें
ये प्यारी प्यारी सूरतें
किसने बनाई हैं
ये मोहनी मूरतें
जिन्हें देखे जो एक बार
तो बस देखता रहे
कोई और है जो
मुझे दिखाता है –
मैं तो बस देखता हूँ
एक नाज़ुक सा दिल है
बस मेरे पास,
जो महसूस करता है
तरह तरह के
जज़्बात उमड़ते हैं उसमें
और ख़्यालात
सँवरते हैं उसमें,
मैं तो बस उन्हें
कागज़ पे उतार देता हूँ
कहाँ का शायर, मैं कहाँ का कवि...?


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