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| 11.29.2008 |
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मूल-मंत्र |
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झींगा
शेर तालाब के किनारे काँस के झुंडों के बीच में अपने भूखे बच्चों और पत्नी
के साथ बैठा सूरज की मीठी धूप में ऊँघ रहा था।
इस
समय उसकी आँखें बंद थी और वह अपने सुनहरे दिनों के सपनों में खोया हुआ था
उसे अपनी जवानी के उन दिनों की याद आ रही थी जब वह खूब शक्तिशाली था उन
दिनों का भी क्या रंग था,
क्या ताक़त थी,
शरीर की चुस्ती और फुरती के आगे क्या मजाल थी कि कोई शिकार हाथों से निकल
जाये।
अगर उसे दिन में दो-तीन बार भी शिकार के पीछे दौड़ना पड़ता था तो वह तब भी
नहीं थकता था।
लेकिन अब उम्र का तक़ाज़ा था कि अब उसे एक शिकार मारने के लिए भी तालाब के
किनारे कई-कई घंटे इंतज़ार करना पड़ता था,
और
कभी तो पूरा दिन भी कोई शिकार नहीं मिलता था और भूखों ही सो जाना पड़ता था।
उसकी यह हालत बूढ़े हो जाने के कारण थी क्योंकि अब उसके शरीर की शक्ति अब
क्षीण हो चुकी थी इसलिए वह अब तालाब के किनारे पानी पीने आए एक-आध कमज़ोर
पशु को ही मार पता था और उसे उसी से ही अपने परिवार की भूख को शांत करना
पड़ता था।
लेकिन आज
सुबह से शाम होने को आयी,
तो
भी कोई शिकार दिखाई नहीं दिया था।
झींगा शेर
की माँद से कुछ दूर पर ही शेरू नाम का एक गीदड़ भी अपनी पत्नी रानी और अपने
दो बच्चों के साथ एक बिल में रहता था।
शेरू के
परिवार का पेट भी काफ़ी हद तक झींगा शेर के शिकार के ऊपर ही निर्भर करता था
क्योंकि जब झींगा किसी शिकार की मार डालता था तो शेरू का परिवार भी बची
झूठन को कई दिनों तक खाता था।
लेकिन आज
शेरू के परिवार का भी भूख के मारे बुरा हाल हुआ जा रहा था।
लेकिन फिर भी वह अपने परिवार के साथ किसी शुभ घड़ी के इंतजार में,
झींगे के ऊपर नज़रें गड़ाये बैठा था।
आखिर जब
सूरज क्षितिज में छुपने जा रहा था तो शुभ घड़ी आ पहुँची और एक दरियाई
घोड़ों का झुंड तालाब किनारे आ पहुँचा।
झुंड को देखते ही दोनों परिवारों में खुशी ही लहर दौड़ गई,
झींगे ने भी झुंड को देखते ही अपनी स्थिति को सँभाला और खड़ा होकर कमर को
धनुष बनाते हुए अँगड़ाई ली।
इसके बाद उसने हाथ पैरों को झटका और किसी पहलवान की तरह से आगे पीछे किया।
इसके बाद उसने मूल-मन्त्र करने के लिए अपनी पत्नी को पास बुलाया जिससे
झींगे के शरीर में एक उतेजना पैदा हो गई।
उसने अपनी
पूछ को कमर पर मोड़ा और आँखें लाल कीं,
फिर उसने अपनी पत्नी से पूछा-
-
“देखो
तो ज़रा मेरी पूँछ मुड़ कर पीठ पर आ गई है या नहीं?"
शेरनी ने
कहा –
“हाँ
स्वामी आप तो प्रचंड योद्धा की तरह से लग रहे हो।“
इसके बाद
झींगे ने पूछा -
“मेरी
आँखें कैसी लग रही हैं?"
शेरनी ने
कहा –
“स्वामी
आप की आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मानो कोई ज्वालामुखी लावा उगल रहा
हो!"
झींगे ने
इतना सुना तो वह पूर्ण रूप से उतेजित हो गया और उसने तूफ़ान की गति से दौड़
कर एक ही झटके में एक कमज़ोर से दिखाई देने वाले दरियाई घोड़े को मार गिराया
जिसे वह खींचकर अपने झुंड में ले आया।
इसके बाद
पूरे परिवार ने व्रत तोड़ा और खूब डट कर खाया और फिर पेट पर हाथ फिराते हुए
अपनी माँद की तरफ़ चल पड़े।
झींगा शेर
ने जब से शिकार किया तब से ही शेरू गीदड़ का परिवार भी उन पर आँखें गड़ाये
बैठा था,
झींगे का परिवार पत्तल से उठ कर चला तो शेरू झूठी पत्तल को साफ़ करने के
लिए उसकी तरफ़ दौड़ा और वह भी अपने परिवार सहित अपनी भूख मिटाने में जुट
गया।
परिवार के
सभी सदस्य झूठन को खा रहे थे लेकिन शेरू की पत्नी, रानी के मन में सुबह से
व्रत करते-करते कुछ प्रश्न जमा हो रहे थे,
जिन्हें पूछने का ह मौका तलाश रही थी।
आख़िर
उसने भोजन करते-करते शेरू से पूछा -
“स्वामी
आख़िर हम कब तक दूसरों का झूठा खाते रहेंगे,
क्या हम अपने लिए ख़ुद शिकार नहीं कर सकते?"
शेरू ने
रानी के ये वाक्य सुने तो मुँह चलाते हुए बोला -
“अरे
जब तक मिलता है तब तक खाओ,
आगे की आगे सोचेंगे।"
रानी
त्योरियाँ चढ़ाते हुए बोली –
“नहीं
आगे न खायेंगे,
तुम भी तो जवान हो,
झींगा बूढ़ा हो चुका हैं लेकिन अब भी शिकार करता हैं क्या तुम नहीं कर
सकते?"
रानी की
इस बात पर शेरू चुप रहा,
कुछ न बोला।
उधर रानी
ने पेट भर खाया और बच्चों को को लेकर अपने बिल में जा लेटी।
शेरू वही झूठन चाटता रहा लेकिन रानी फिर उसके साथ न बोली।
शेरू की
झूठन ख़त्म हुई तो वह भी बिल की तरफ़ चला,
लेकिन उदास क़दमों से।
उसे वास्तव में रानी ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। वह जाकर बिल में
लेट गया लेकिन उसे नींद नहीं आई,
वह
सोच रहा था आख़िर झींगा इतना बड़ा शिकार कैसे मार लेता है,
ऐसी कोन सी शक्ति है उसके पास, जो उसमें बूढ़ा होने पर भी इतना जोश और
ताक़त पैदा कर देती है।
शेरू
इन्हीं विचारों में काफ़ी देर तक उलझा रहा और यह सोच कर सोया कि कल झींगे
शेर की जासूसी करता हूँ और देखता हूँ की ऐसी कौन सी शक्ति है जो उसमें इतना
जोश भर देती है।
इतना सोच कर शेरू गीदड़ निश्चिंत होकर सो गया।
अगले दिन
शेरू जल्दी जाग गया,
उसने बिल से बाहर मुँह निकाल कर देखा तो अभी काफ़ी अँधेरा था,
और
पाला पड़ने के कारण काफ़ी ठंड थी।
लेकिन उसने उसकी परवाह नहीं की और वह अपनी पत्नी और बच्चों के उठने से पहले
ही झींगे शेर की माँद की तरफ़ चल दिया और जाकर एक काँस के झुंड के पीछे छिप
कर बैठ गया।
झींगा शेर
अभी जागा न था,
कुछ देर बाद सूरज की मीठी धूप चारों ओर फैली तो झींगा अपनी माँद से बाहर
आया और उसने कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई तोड़ी और फिर जाकर धूप में बैठ
गया।
इसके बाद उसके बच्चे और शेरनी
जागी, वे भी माँद से बाहर आये और धूप में बैठ कर ऊँघने लगे और झींगा अपनी
उसी तलाश में लग गया कि कब शिकार आये और कब वह उसे मार कर अपने आज के भोजन
का इंतज़ाम करे।
काँस के
झुंड के पीछे छिपा शेरू झींगे शेर कि इस सारी दिनचर्या को बड़े ध्यान से
देख रहा था और इस समय वह झींगे के हर पैंतरे को बड़े ध्यान से सीख कर रहा
था।
झींगा
अपने परिवार के साथ धूप में बैठा था तो एक जंगली भैंसा पानी कि टोह में उधर
से आ निकला,
वह
धीमे और टूटे क़दमों से चल रहा था। देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शायद
वह बीमार था और बीमारी में अपनी प्यास बुझाने तालाब किनारे आया था।
आख़िर जब
झींगे ने जंगली भैंसे को देखा तो उसे सुबह-सुबह पौ-बारह होते नज़र आये और वह
भैंसे को देखकर खड़ा हो गया।
झींगे शेर
के खड़े होते ही शेरू गीदड़ के भी कान खड़े हो गये,
उसकी एक आँख शिकार पर लगी हुई थी तो दूसरी आँख झींगे कि हर हरक़त को बारीकी
से देख रही थी।
ज्यों ही
भैंसा तालाब में पानी पीने के लिए घुसा तो झींगे शेर ने अपना मूल-मंत्र
पढ़ा।
वह पास
बैठी शेरनी से बोला –
“देखो
तो ज़रा मेरी पूँछ मुड़ कर पीठ पर आ गई है या नहीं?”
शेरनी ने
कहा –
“हाँ
स्वामी आप तो प्रचंड योद्धा की तरह से लग रहे हो!"
इसके बाद
झींगे ने पूछा -
“मेरी
आँखें कैसी लग रही हैं?"
शेरनी ने
कहा -"स्वामी आप की आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मानो कोई ज्वालामुखी
लावा उगल रहा हो!"
शेर ने
इतना सुना तो वह पूर्ण रूप से उत्तेजित हो गया और इससे पहले कि जंगली भैंसा
पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता,
झींगे शेर ने एक ही वार में तूफ़ान कि गति से आगे बढ़कर भैंसे को धराशायी कर
दिया और उसे खींचकर अपने झुंड में ले आया।
काँस के
झुंड के पीछे छुपा शेरू गीदड़ झींगे की ये सारी हरक़त देख रहा था उसने जब
झींगे का मूल-मंत्र सुना तो खुशी से झूम उठा और खुशी को कारण जमीन में
लोटपोट हो गया।
उसने भी आज शक्ति के उस मूल-मन्त्र को पा लिया था जिसे पढ़कर वह भी अधिक
शक्तिशाली हो सकता था।
वह
धूल से उठा और खुशी से कुलाँचे भरता हुआ अपने बिल में जा घुसा।
शेरू की
पत्नी रानी अब तक जग चुकी थी उसने शेरू को इतना खुश होते देखा तो बोली –
"क्या
बात हैं बड़े खुश नज़र आ रहे हो,
ऐसा सुबह-सुबह क्या मिल गया जो तुम फूले नहीं समा रहे हो?"
शेरू
बच्चों के पास बैठते हुए टाँग पर टाँग रखकर बोला -
"तुम
कहती थी ना मैं शिकार नहीं कर सकता और मैं डरपोक और बुजदिल हूँ,
तो तुम झूठ बोलती थी,
तुम नहीं जानती मेरे अन्दर कितनी शक्ति है,
मैं चाहूँ तो अच्छे से अच्छे
बलशाली को धूल चटा सकता हूँ।“
रानी
त्योरियाँ चढाते हुए बोली –
“रहने
दो, कभी किसी चूहे का शिकार तो किया नहीं,
कहते हो बलशाली को धूल चटा सकता हूँ।"
शेरू
रहस्यमय मुस्कान होंठों पर लाते हुए बोला –
“अरे
तुम्हें क्या पता,
जब
मैं तुम्हें अपनी शक्ति दिखाऊँगा तब देखना दाँतों तले उँगली दबा लोगी,
तुम बस ऐसा कहना जैसा मैं कहता हूँ।"
“ठीक
हैं कह दूँगी लेकिन कुछ कर के तो दिखाओ", रानी ने कहा।
इसके बाद
शेरू का पूरा परिवार उठा और जाकर तालाब किनारे काँस के झुंड में छिपकर बैठ
गया
और
शेरू इस बात का इंतज़ार करने लगा कि कब कोई शिकार आये और वह उसे अपने
मूल-मंत्र से धराशायी करे।
शेरू को
अपने परिवार सहित काँस में छुपे-छुपे शाम हो गई थी।
सूरज अब डूबने ही वाला था लेकिन शेरू को अब तक कोई ऐसा शिकार दिखाई नहीं
दिया था जिस पर वह अपना मूल-मंत्र आज़मा सके।
आख़िर जब
शाम होने को आयी तो दरयाई-घोड़ों का वही झुंड जो कल आया था तालाब किनारे
पानी पीने आ पहुँचा।
जिसे देखते ही शेरू गीदड़ के मुँह में पानी भर आया और उसके पैरों में खुजली
होने लगी और ज्यों ही घोड़ों का झुंड तालाब में पानी पीने घुसा तो शेरू खड़ा
हो गया।
उसने भी अपनी कमर को धनुष बनाते हुए अँगड़ाई तोड़ी और अपनी पत्नी रानी से
मूल-मंत्र पढ़ते हुए बोला -
“देखो
तो ज़रा मेरी पूँछ मुड़कर पीठ पर आ गई है या नहीं?"
रानी ने
कहा,
“हाँ
स्वामी आप तो इस समय एक प्रचंड योद्धा की तरह लग रहे हो।“
शेरू
आँखें निकलते हुए -"और मेरी आँखें तो देखो लाल हुई या नहीं?”
“हाँ
स्वामी आपकी आँखें तो इस समय ऐसी लग रही हैं मानो ज्वालामुखी लावा उगल रहा
हो!”
शेरू ने
इतना सुना तो वास्तव में उसे अपने अन्दर एक शक्ति सी जान पड़ी।
वह
तेज़ी से काँस के झुंड के ऊपर से कूदते हुए किसी तूफ़ान की तरह से एक दरियाई
घोड़े पर कूद पड़ा। लेकिन ज्योंही शेरू ने घोड़े की पिछली टाँग में अपने
दाँत गाड़ने चाहे तो घोड़े ने अपनी शक्तिशाली दुल्लती से शेरू को काँस के
झुंडों के ऊपर से दर्जनों मीटर दूर फेंक दिया,
जिसके कारण जमीन पर पड़ते ही शेरू का मुँह ज़मीन में चार-पाँच अंगुल नीचे धस
गया।
उसकी लाल
ज्वालामुखी आँखें धूल मिट्टी के कारण सूखे कुएँ की तरह से रुँध गई और उनका
लाल रंग भी पीला-पीला सा दिखाई देने लगा।
इसके आलावा उसकी धनुष रूपी पूँछ भी टूटकर नीचे को मुड़ती हुई किसी पिटी
भिखारिन की भाँति दोनों टाँगों के बीच में छुप गई।
इतना सब
होने के बाद शेरू अपनी टूटी टाँग से खड़ा हुआ और किसी पैर बँधे ख़च्चर की
भाँति लँगड़ता हुआ अपने बिल की तरफ़ चल दिया।
शेरू की
महेरिया रानी अपने बच्चों के साथ इस समय दूर से अपने स्वामी की इस वीरता को
देख रही थी।
लेकिन जब
उसने स्वामी को स्वादिष्ट शिकार की जगह जंगली धूल खाते देखा तो उसे बड़ा
दुःख हुआ और वह ख़बर लेने के लिए अपने स्वामी की तरफ़ दौड़ी।
एक
बार रानी डर गई थी लेकिन अगले ही पल शेरू की हालत पर रानी हँस पड़ी उसने
उसकी इतनी बुरी हालत आज से पहले कभी नहीं देखी थी। शेरू ने जब पत्नी के द्वारा उपहास होते देखा तो वह जल उठा और वह रानी हो जलती आँखों से देखते हुए अपने बिल की दीवार के पास बैठ कर अपनी टाँग के दर्द को जीभ से चाटने लगा। लेकिन रानी को अब भी अपने स्वामी की इस मूर्खता भरी वीरता पर हँसी आ रही थी और वह हँसी के कारण मिट्टी में लोट-पोट थी। |
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