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| 10.20.2007 |
| कुछ इस तरह से ज़िन्दगी को देखना विजय कुमार सुखवानी |
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कुछ इस तरह से ज़िन्दगी को देखना
अंधेरों में भी तुम रोशनी को देखना ज़र्रे ज़र्रे में फैला है उसी का वुजूद हर एक शै में बस उसी को देखना लबों की तबस्सुम पूरा सच नहीं कहती आँखों में छिपी हुई नमी को देखना देखना हो गर ख़ुदा को इस जमीं पर किसी बच्चे की मासूम हँसी को देखना फ़िजूल है आदमी में ख़ुदा को ढूँढना बेहतर है आदमी में आदमी को देखना हर शख़्स में होता है कुछ दीद के काबिल ग़ौर से देखना जब भी किसी को देखना |
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