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| 10.20.2007 |
| अच्छे बुरे की पहचान मुश्किल हो गई है विजय कुमार सुखवानी |
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अच्छे बुरे की पहचान मुश्किल हो गई है
थी ज़िंदगी आसान मुश्किल हो गई है न थी कोई मुश्किल जब सारा जहाँ घर था जब से घर हुआ जहान मुश्किल हो गई है दुश्मनों के बीच ज़िंदगी कभी आसां न थी अब दोस्तों के दरमियान मुश्किल हो गई है इतना ज़हर घुल गया है हवाओं में कि परिंदों के वास्ते उड़ान मुश्किल हो गई है झूठ बोलने की तो है पूरी आजादी मगर सच्चाई करना बयान मुश्किल हो गई है |
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