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10.20.2007
 
अब मकाँ होते हैं कभी घर हुआ करते थे
विजय कुमार सुखवानी


अब मकाँ होते हैं कभी घर हुआ करते थे
बड़े पुरसकूँ तब शामोसहर हुआ करते थे

आमदा हैं काटने पर जिन्हें आज हम
बुजुर्गों की मानिंद वो शजर हुआ करते थे

ताउम्र माँ बाप को उठाये फिरे शानों पर
किसे यकीं होगा ऐसे बशर हुआ करते थे

आज अपने भी खटकते हैं हमें आँखों में
किसी वक्त गैर भी नूरेनज़र हुआ करते थे

इस कदर कुशादा हैं इंसान की ज़रूरतें
वहाँ इमारतें हैं जहाँ समंदर हुआ करते थे

इंसानियत वफ़ा सच्चाई ईमानदारी
इन्सान में क्या क्या हुनर हुआ करते थे

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