डॉ. विजय कुमार सुखवानी

दीवान
अच्छे बुरे की पहचान ...
अब मकाँ होते हैं कभी घर ..
इन्सान की हर ख्वाहिश..
कहाँ गुज़ारा दिन कहाँ रात
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी...
दिल के लहू में
ना मिली छाँव कहीं यूँ ....
ये धूपछाँव क्या है ये ...
सब खामोश हैं यहाँ कोई...
साथ मेरे रही उम्र भर ज़िंदगी
हम कहीं भी रहें माँ की दुआ