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05.03.2012
 

सिलवटों की सिहरन 
विजय कुमार सप्पत्ति


अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुँध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सिलवटें बना जाता है …..

मेरे हाथ, मेरे दिल की तरह
काँपते है, जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..

तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छू जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ, कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी ख़ामोशी को आग लगा जाते हो …

तेरे जिस्म का एहसास मेरी चादरों में धीमे धीमे उतरता है
मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में,
पर तेरी मुस्कराहट,
जाने कैसे बहती चली आती है,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..

कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे,
कोई माझी, तेरे किनारे मुझे ले जाए,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा,
या मुझे वहाँ बुला ले......

मैंने अपने घर के दरवाज़े खुले रख छोड़े हैं ........


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