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| 12.02.2008 |
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सिलवटों की सिहरन |
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अक्सर तेरा साया मेरे हाथ, मेरे दिल की तरह तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छू जाता है
तेरे जिस्म का एहसास मेरी चादरों में धीमे धीमे उतरता
है कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे, मैंने अपने घर के दरवाज़े खुले रख छोड़े हैं ........ |
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