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ISSN 2292-9754

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02.05.2015


शब्द गुम होते गए

शब्द गुम होते गए

भीड़ के विस्तार के संग प्रीत की बढ़ती पिपासा
वर्जनाओं के शहर में बेधती पल पल निराशा
यत्न की मुट्ठी सहेजी रेत तुम होते गये।
शब्द गुम होते गये।

जंगलों के नाम पर कुछ लोग यूकेलिप्टसी
पल रहे कुछ भाव हरियाली लपेटे कैक्टसी
आस मंजूषा में रखे वेद तुम होते गये।
शब्द गुम होते गये।

आइये मिल बैठ कर हम ज़िन्दगी को गुनगुनायें
हाथियों के पाँव से हम चींटियाँ कुछ तो बचायें
आज बेचैनी में कैसे मौन तुम होते गये
शब्द गुम होते गये।


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