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02.19.2014


नंगा

Nangaबोझा ढोते ढोते मनोज की आँखें भीग गयीं और हौले से बड़ी सी पेटी को उसने नीचे रखा और रुमाल से पेशानी पर आया पसीना पोंछा। सच कहा है किसी ने, काया और माया, इन पर किसी का बस नहीं, बीते हुए कल की यादें उसे फिर सताने लगीं तो उसने सिर झटक कर उनसे पीछा छुड़ाया और फिर सारी पेटियों को करीने से लगाने लगा। यह सेब की पेटियाँ आज ही काशमीर से आई थीं और शाम तक इन्हें शहर के बाहर बड़े रेलवे सामन घर में पहुँचाना है। काम करते करते भी उसकी यादों ने उसका पीछा किया, और वह फिर अतीत में खो गया।

 काशमीर के किसी खामोश से कोने में उसका गाँव, स्वर्ग सी सुन्दर यह धरती और चारों तरफ खुशहाली, भाईचारे और प्रेम का माहौल। हरी-भरी वाटिका सा यह गाँव, अपने आप में एक सम्पूर्णता का प्रतीक था। यहाँ सब धर्मों के अनुयायी आपस में प्रेमभाव से रहते व एक दूसरे का सुख दुख के साथी थे। जहाँ एक ओर सूर्य उदय पर मुल्ला की अजान होती वहीं समीप के मन्दिर से शंख और घंटियों का स्वर मिलजुला स्वरूप लेकर एक अलौकिक संगीत की तरह गाँव में गूँजता। गाँव में सभी एक से थे, साफ दिल वाले लोग, शहर की खुदगर्ज़ हवा से दूर। मनोज का परिवार भी इसी गाँव में रहता था और उसका बचपन भी यहाँ की मिट्टी में पलकर जवानी की देहलीज तक पहुँचा था। बाप, दादाओं की तरह मनोज का परिवार भी एक किसान परिवार था। अपनी छोटी सी खेती और सेब के बाग थे उनके। गुजारे भर के लिए काफी था एक छोटे से परिवार के लिए जहाँ उसके माता पिता के अलावा उसका बड़ा भाई श्याम था।

दोनों भाई पिता का हाथ बँटाते और खेती बाड़ी करते; कभी सेब खुद शहर जाकर बेचते या साल भर के लिए पट्टे पर उठा लेते । भगवान का दिया सब कुछ था उनके पास गाँव में शहरी छाप अभी पड़ी न थी; एक छोटा सा स्कूल था जहाँ मास्टरजी एक खपरैल नुमा मकान में पढ़ाते थे । मनोज ने सिर्फ दो जमातें पढ़कर पढ़ाई छोड़ दी थी । उसका मन ना तो अंग्रेजी की ए बी सी डी में लगता था ना गणित के अंकों में । उसे तो भाता था मस्त जीवन जहाँ कोई पाबन्दियाँ न हों खेतों में घूमना कभी नदी में नहाना कभी अखरोट के पेड़ों पर चढ़कर मस्ती करना तो कभी अपनी गाय और बकरियों को चराने जाना।

उसकी तरह श्याम ने भी बचपन में ही पढ़ाई छोड़ दी थी पर उसे इस बात का दुख था और मनोज ने भी जब राह पकड़ी तो वह आपे से बाहर हो गया। भाई को उसने बहुत समझाया, "देख बेटा, ज्ञान से आदमी की पहचान होती है, पढ़ा लिखा आदमी पहचान खुद बना लेता है। हम भी चाहते हैं कि तू पढ़े लिखे और बड़ा आदमी बने। मनोज ने कहा "मुझे बड़ा आदमी नहीं बनना, मै भी तुम्हारी और बाबा की भाँति खेती बाड़ी करूँगा, मुझे यही अच्छा लगता है, पढ़ाई मुझे भाती नहीं, "हमें किस चीज की कमी है।" लाख समझाने पर भी मनोज पर कोई असर नहीं पड़ा, फलत: वह भी एक अंगूठा छाप ही रहा पर अपनी खेती बाड़ी और ढोर होने की वजह से वे स्वयंभू थे घर में, गुजारे लायक रुपयों की कोई कमी न थी। सुख शांती से उनका जीवन चल रहा था। व सादगी और शांती का जीवन............।

कालांतर में बड़े भाई की शादी हो गई और मनोज को माँ समान भाभी का ढेर सारा प्यार मिला। यह सुखी जीवन यूँही अविरल चलता रहता भिन्न भिन्न धर्मों के लोग सीर शक्कर की भाँति आपस में मिलकर रहते और काशमीर के अतिप्रिय सूफीसंतों की परम्परा इसी तरह चिरकाल तक चलती रहती किन्तु दोनों को कुछ और ही मंजूर था। शायद विधाता को यहाँ का शांत वातावरण नहीं भाया और धीरे धीरे एक अनजाना डर काशमीर की उस शांती को भंग करने लगा। नफरत की आग चारों तरफ फैलने लगी। भाई - भाई का दुश्मन बन गया, जो हिन्दू-मुसलमान सदियों से मिलजुल कर रहते थे मंदिर मस्जिद जिनकी साँझी विरासत थी। लालद्यद और नुनद ......... की वाणी का ज्ञान जिन्होंने मिलजुल कर अपनाया था उसी मुसलमान को अब काशमीरी पंडित अब इस्लाम के दुश्मन और काफ़िर नजर आने लगे। कश्यप की इस धरती को, जहाँ गाँधीजी को आशा की किरण नजर आई थी, एक भयानक अंधेरे ने जकड़ लिया। जहाँ जीव हत्या एक दिर्या बन गई। सरहद पार के पा हुए यह भटके हुए नौजवान काशमीर घाटी को हिन्दू रहित करना चाहते थे शायद सिकन्दर बुत शिकन और पठानी हुक्मरानों की आत्मा जीवित होकर इतिहास दोहराना चाहती थी दहशत के इस माहौल में कहीं बम धमाके में 10 मरे तो कहीं बस मे जारहे अल्पसंख्यकों हिन्दुओं को आतंकवादियों ने चुन चुन कर मौत के घाट उतारा। किसी हिन्दू स्त्री का बलात्कार करके उसके शव को मटियामेट करके वितस्ता नदी में बहा दिया। खौफ का यह माहौल जब जंगल की आग की तरह समूचे काशमीर में फैला तो मनोज का वह गाँव कैसे बच पाता। उसके घर के आसपास रहने वाले उसी के मुस्लिम मित्र कहने लगे ......... "अरे औ दाल खोर पंडित की औलाद, यहाँ अब जल्दी ही पाकिस्तान बनने वाला है। अच्छा है यह जनेऊ उतार कर खतना करवा ले, मुसलमान हो जायेगा तो मजे से रहेगा, नहीं तो बेटा भाग ले यहाँ से।" मनोज उनकी यह बात हँसी में उड़ा लेता ......... "शब्बीर तू भी बड़ा पाजी है, खाना पीना हिन्दुस्तान का और गुण जाने पाकिस्तान के, अरे बेवकूफ तुम्हें क्या लगता है, पाकिस्तान बन जाने पर तुम्हारी कोई लाटरी खुल जाएगी। पचास बरस होने पर भी उनके अपने लोग जो भारत छोड़कर पाकिस्तान रहने गये थे, आज भी मुहाजिर कहलाते हैं, और दूसरे दर्जे की जिन्दगी बसर करते हैं, तुम्हारा क्या होगा, यह तो ईश्वर ही जाने?"

 "अरे छोड़ तेरे ईश्वर को भी देख लेंगे। इन्शाह अल्लाह तेरे इस मन्दिर में नमाज पढ़ी जाएगी अब जल्दी ही............।"

"हा हा हा हा हा।"

ज्यादा बहस में न पड़कर मनोज ने घर की राह ली और भाई को सारा हाल सुनाया। भाई ने उसे बताया कि उनके कुछ रिश्तेदार जो शहर श्रीनगर में रहते थे वे घर छोड़कर जम्मू व अन्य नगरों मे रहने के लिये चले गऐ हैं और हालात सुधरते ही वापस लौट आएँगे। पर गाँव के कुछ बुर्जुग मुस्लमानों ने अल्पसंख्यक हिन्दुओं को ढाढस बंधाई और कहा कि उनके रहते कोई पंडितों का बाल भी बांका नहीं कर सकता। रमजानजू ने मनोज के बाबा को समझाया "रामजू यह तो एक आंधी है जिसका सामना हमने मिलकर करना है मेरे भाई मुझे अल्लाताला पर पूरा यकीन है कि यह आंधी आकर चली जायेगी और फिर हम पहले कि तरह रहने लगेंगे।"

रमजानजू की बातें सुनकर मनोज के परिवार को कुछ ढाढस बंधी और उन्होंने गाँव छोड़कर जाने का विचार त्याग दिया और फिर जाते भी कहाँ। गाँव से बाहर सिर्फ कभी कभार शहर श्रीनगर तक गए थे और फिर जम्मू शहर में अपना कोई सगा सम्बंधी भी तो नहीं था। सब दूर दराज गाँव में रहते थे।

कुछ दिनों तक जीवन पहले जैसे ही चलने लगा कि एक त्रासदी ने गाँव वालों को हिला दिया मनोज के घर से कोई 10 मकान दूर गाँव के मुखिया नारायण कौल का घर था, सुख सम्पदा से भरपूर, लम्बी चौड़ी खेती अखरोट और बादाम के कई बाग। नारायण कौल का बड़ा बेटा शायद पुलिस में था और एक दिन शहर से अपने घरवालों से मिलने आया था। दिन में वह मनोज को भी मिला और उसका हाल पूछा था।

रात के दूसरे पहर गाँव में शोर मच गया तो सब लोग घरों से बाहर आने लगे शोर नारायण कौल के घर से आ रहा था मनोज, श्याम और मनोज के बाबा नारायण कौल की तरफ भागे तो वहाँ गाँव के कुछ लोग पहले से ही जमा थे। मनोज ने देखा कि नारायण कौल और उसके बेटे को चार पाँच बन्दूक धारीयों ने घेर रखा था। नारायण कौल का बेटा विनोद कौल जख्मी हालत में उनसे कुछ कह रहा था उसके होंठ फटे हुऐ थे पास जाकर मनोज ने उनका वार्तालाप सुना, बन्दूकधारी कह रहा था, "सुनो पंडित हमें पक्की सूचना मिली है कि तुम सी बी आई के लिए काम करते हो, इसलिए तुम हमारी मुहिम के रास्ते में एक रुकावट हो। सच सच बताओ, तुम्हें क्या क्या पता है, और तुम्हारे क्या मनसूबे हैं, नहीं तो ऐसी भयानक मौत मरोगे कि तुम्हारी रुह काँप उठेगी।

विनोद ने उत्तर दिया, "भाई मैं भगवान की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं रियासत पुलिस में एक उपनिरिक्षक हूँ, और इसके अलावा कुछ भी नहीं। मैं तो आज तक काशमीर से बाहर भी नहीं गया। आप मुझे बेकार मार रहे हैं। खुदारा मेरा विशवास करो, मैं सच बोल रहा हूँ।"

बन्दूकधारी ने अपने साथी की ओर देखकर कहा - "सलीम, यह दालखोर पंडित इस तरह नहीं मानेगा, इसे मुख्यालय ले चलो वहाँ कमाण्डर साहब खुद इससे पूछताछ करेंगे।" यह कहकर उसने विनोद को आगे बढ़ने को कहा। नारायण कौल जो अभी तक यह नजारा चुपचाप देख रहा था, आगे बढ़कर बंदूकधारी के पाँव से लिपट गया, "भाई मेरे बेटे को छोड़ दो, वह बेकसूर है, आपने जो भी पूछताछ करनी हो यहीं कर लो, मेरे बेटे को छोड़ दो।"

बन्दूकधारी ने बन्दूक की ट बुढ़े नारायण के कंधे पर मारी, "पीछे हट जा पंडित, हमें गद्दारों से सख्त नफरत है। सुनो गाँव वालो, हम मुलके काशमीर को आज़ाद कराने के लिए मुजाहिद हुए हैं, इस इस्लाम के काम में जो भी रुकावट डालेगा, अपनी मौत का खुद जुम्मेदार होगा।" यह कहकर अपने आप को मुजाहिद कहने वाले विनोद को अपने साथ ले गए। सारा गाँव सकते की हालत में गया और लोग तरह तरह की बातें बनाते हुए अपने अपने घरों को लौट गए।

मनोज को सारी रात नींद नहीं आई और हर पल उसका ध्यान विनोद के खौफज़दा चेहरे की तरफ चला जाता और यह सोचते सोचते जाने कभी उसकी आँख लग गई और वह सो गया। और अभी भोर की पहली किरण ही फूटी थी कि गाँव भर में कोहराम सा मच गया। सब लोग रोने चिल्लाने कि आवाजें सुनकर उसी दिशा में भागे, मनोज भी दौड़ कर वहाँ पहुँचा, जहाँ गाँव का आहता था, जहाँ चिनार के दो बड़े पेड़ थे, और उनकी बड़ी बड़ी शाखों से एक छत सी बन गई थी। यहाँ गाँव भर के बच्चे खेलते थे, और बूढ़े लोग पेड़ की छांव तले हुक्का पीते थे। वहाँ पहुँच कर मनोज ने जो दृष्य देखा उसके मुह से चीख निकलते निकलते रह गई। पेड़ पर विनोद की क्षत-विक्षत लाश लटक कर झूल रही थी उसके सारे कपड़े खून से लथपथ थे, उसके हाथों के नाखून उखाड़े गए थे, उसके गाल चाकुओं से गोदे हुए थे। उसके नाक, कान, कटे हुए थे, और वह भागकर सीधे घर गया। घर में माँ व भाभी, हतप्रभ सी, उसे तीर की तरह, घर में आता देखकर बोली, "मनोज बेटा, क्या हुआ, अरे तू रो क्यों रहा है?"

"अब हम यहाँ नहीं रहेंगे...... अब हम यहाँ नहीं रहेंगे " कहते कहते वह रो पड़ा।

गाँव में यह खौफ का वातावरण बना रहा, और इस बीच कई हिन्दू, जिनका कोई सगा सम्बन्धी काशमीर के बाहर जम्मू या अन्य स्थानों पर था, गाँव छोड़ कर चले गए। अपने ज़मीन, मकान और मवेशी, अपने भरोसेमन्द पड़ोसियों के हवाले करके, वे रोते बिलखते गाँव छोड़कर चले गए। पर मनोज के बाबा ने हिम्मत नहीं हारी उन्हें विश्वास था यह वक्ती तनाव है और शीघ्र ही खत्म हो जाएगा।

पर उनके विशवास को ठेस लगी उस दिन, जिस दिन, सुबह सुबह घर के दरवाजे पर चिपका हुआ एक पत्र मिला। यह पत्र मुजाहिदों की किसी तेंजीम ने लिखा था और इस में फरमान था कि काशमीर की आजादी के लिए कैसे ये लोग अपनी जान न्योछावर कर रहे हैं और इस नेक काम के लिए काफी रुपयों की जरूरत होती थी। रामजू को 50,000 रुपये की मांग की गई थी, नहीं तो गाँव से चले जाने को कहा गया था.........। 50,000 रुपये की बात सुनकर रामजू को गश आ गया था। ठीक है वह खाता पीता किसान था पर इतनी बड़ी रकम उसने जीवन में कभी न देखी थी। मुजाहिदों ने दो रोज का वक्त दिया था। और रामजू की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। यह दो दिन इसी उहापोह में गुजर गए। और फिर वह भयानक रात...... जो मनोज के मानस पटल पर पत्थर की लकीर की तरह खुदी हुई थी। रात का वो आखिरी पहर था कि उसे शोर की आवाज सुनाई दी ...... पर आजकल इस शोर का वह आदी हो गया था। पर उसे घर के बाहर तेज रोशनी दिखाई दी और धुआँ सा उठता दिखाई देखा। वह दौड़, कर बाहर भागा तो देखा उसका घर धूं धूं करके जल रहा था। बड़ी मुश्किल से घर के सदस्यों की जान बच पाई पर वह चाहकर भी अपनी भूरी गाय को नहीं बचा पाया उसके दर्द से रम्भाने की आवाज आज तक मनोज को सुनाई देती .........।

भोर होने तक उनका सब कुछ लुट चुका था। गाँव वालों के समझाने बुझाने पर... उन्होंने गाँव छोड़ने का निश्चय किया बचे हुए मवेशी उन्होंने अपने पड़ोसी गफारा को सौंप दिये और आग से बचा हुआ कुछ सामान लेकर वह गाँव छोड़ कर शहर काशमीर आये। सारी राह मनोज ने अपनी माँ और अपनी भाभी को रोते हुए देखा। धर्म-कर्म वाली उसकी माँ का, वह प्यारा संसार छूट गया। पीढ़ियों से संजोये अपने घर, अपनी नींव को, जिसे तिनका तिनका कर बनाया था, एक पल में छोड़ना पड़ा, यह कैसी त्रासदी, यह कैसा इन्साफ, हमसे क्या गल्ती हो गई महादेव, जो कि शिवरात्री के पर्व पर ही हमारा संसार हमसे छीन लिया!

रोते बिलखते यह परिवार पहले उद्यमपुर और फिर जम्मू पहूँचा। दो दिन मंदिर में गुजारने के उपरान्त उन्हें एक विस्थापित...... , हाँ यही शब्द इस्तेमाल किया था उस अफसर ने...... एक विस्थापित शिविर में उन्हें एक शामियाना दिया गया था। इसी एक शामियाने में वे पाँच प्राणी एक नया संसार बसाने की कोशिश में लग गए। कड़ाके की सर्दी में यह शामियाना पर्याप्त नहीं था। दान में मिले चंद कम्बल जो जाले जैसे थे पाँच प्राणीयों के लिये पर्याप्त नहीं थे। पर जीवन चलता है रुकता नहीं दिन हफ्‍तों में और हफ्‍ते महीनों मे बदलने लगे.........। गाँव से निकलते समय रामजू के पास कुछ नगदी एवं बहू और पत्नी के कुछ जेवर थे वही काम आए किन्तु पेट की आग के सामने यह सब कब तक टिक पाते। आखिर मनोज और शयाम को जीविकोपार्जन के लिए अनजान शहर के धक्के खाने पड़े......। विस्थापन के दर्द और नई जगह के परायेपन ने रामजू को तोड़कर रख दिया...... उसकी सेहत दिन पर दिन iगरती चली गई...... उस से अब यह बढ़ती हुई गर्मी सही नहीं जाती......। कहाँ काशमीर की शीतलता और कहाँ यह तपती धरती......।

गाँव के आत्मनिर्भर जीवन से पहली बार बाहर निकले मनोज और शयाम को जीवन की इस कड़वी सच्चाई का सामना करन पड़ा कि अनपढ़ व्यiक्त के लिये इस समाज में कोई जगह नहीं। हर जगह दुत्कार मिलने पर दोनों भाई सोच रहे थे कि हमारी बिरादरी में शायद ही कोई ऐसा व्यiक्त होगा जो अनपढ़ हो......। मनोज की आँखों से आँसू बह निकले और भाई के गले लग कर रो पड़ा...... "भैया काश मैंने आपकी बात मानली होती...... काश मैंने पढ़ाई की होती तो आज यह दिन न देखने पड़ते।"
थक हार कर दोनों भाई अब कोई भी काम करने को तैयार हो गए और फिर शयाम को एक दुकान में नौकर का काम मिल गया । सुबह शाम दुकान की सफाई करना ग्राहकों को पानी पिलाना और दुकान के मालिक के लिए दोपहर में उसके घर से उसका खाना लाना यही उसका काम था। महीने के 300 रुपये और एक समय का खाना तय हुआ था। इसी प्रकार मनोज को एक फल विक्रेता के यहाँ नौकरी मिल गई। यह फल विक्रेता काशमीर से सेब नाशपाती अखरोट मंगवाता था और फिर जम्मू के बाहर भिजवाता था। मनोज काशमीर से आई हरे फल की पेटीयों को लौरी से उतारने का काम करता या फिर कभी पेटीयों को लौरी में लदवाकर उन्हें ठन्डे सामान गृह में भिजवाता उसे भी 300 रुपये महावर मिलते थे। सरकार की तरफ से एक परिवार को 500 रुपये की मदद और चावल मिलते थे। 1100 रुपये में पाँच व्यक्तियों का यह परिवार कैसे गुजारा करता था यह वही जानते थे। उस पर दवा-दारू का खर्चा अलग से था।

 उनका नया घर सरकारी कपड़े से बना वह शामियाना सिर्फ एक गर्मी और फिर बरसात सह कर दम तोड़ चुका था जगह जगह उसमें छेद हो गए थे......। सारी गर्मी रामजू और उसकी पत्नी ने तड़प तड़प कर काटी और फिर एक दिन जब मनोज की माँ जब विस्थापित शिविर के कामचलाऊ मंदिर से वापस आ रही थी उसे साँप ने डस लिया......। साँप शायद जहरीला था अत: डाक्टर के आने से पहले ही वह सारे परिवार को रोता बिलखता छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हो गई। यह सदमा रामजू सह न पाया और उसने चारपाई पकड़ ली......। सोते जागते वह यह रट लगाये रहता कि मुझे गाँव वापस ले चलो और वह भी जो एक रात सोया तो अगले दिन उठ न पाया...। एक महीने के अन्तराल मे माँ बाप का साया उठ जाने से जैसे दोनों भाई पागल हो गए थे इसीलिये उन्होंने शामियाना छोड़कर कहीं और रहने का फैसला कर लिया।

सारे शहर की खाक छान ली दोनों भाईयों ने पर जैसे उनके लायक कहीं कोई बसेरा था ही नहीं किराये इतने ऊँचे हो गए थे कि वे सोच भी नहीं सकते थे और फिर कई मकान मालिक तो अग्रिम किराया भी माँग रहे थे। दोनों भाईयों ने अपने अपने मालिकों से पेशगी माँगी पर दो टूक सा जवाब मिला।

थक हार कर दोनों भाईयों ने अपनी तरह कुछ विस्थापित लोगों से बात की जो इन्हीं की तरह अब और शामियानों में नहीं रहना चाहते थे। किसी ने कहा कि बहुत से विस्थापितों ने सरकारी इमारतों और फ़्‍लैटों पर कब्जा किया हुआ है और सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी सरकार उन्हें निकालने में ना कामयाब रही और अंतत: चुप हो गई इस तरह काफी लोगों को मुफ़्‍त की रहने लायक छत नसीब हुई। फिर एक दिन शहर से थोड़ा बाहर एक अधबनी इमारत में काफी सारे विस्थापितों ने कब्जा कर लिया। यह इमारत नीम खाम तैयार ही थी सिर्फ प्लास्टर नहीं किया गया था। मनोज के परिवार को भी एक कमरा नसीब हुआ। सर्दीयों का मौसम शुरु हो चुका था इसलिए कोई खास परेशानी नहीं हुई। प्रशासन ने उन्हें इमारत खाली करने को नोटिस भी दिया और पुलिस कुछ लोगों को पकड़कर भी ले गई पर कुछ राजनैतिक पार्टियों की सिफारिश पर उन्हें रहने दिया गया।

अब दोनों भाई मेहनत मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे थे जीवन फिर एक रफ़्‍तार से चलने लगा। यही इमारत अब उनका संसार बन गई अपनी परम्परा और रीती रिवाजों को कायम रखते हुए इस इमारत में बसने वाले अपने तीज त्योहार मनाते। काशमीर से दूर रहकर भी उन्हें अपनी माटी से प्रेम था। मनोज की भाभी भी और औरतों के साथ इस परम्परा को मना रही थी "पन" उत्सव पर तीन चार परिवारों ने मिल कर रोट बनाए और "बीबगरा" माँ की पूजा की। इसी प्रकार दिपावली पर सबने दिये जलाए और लक्ष्मी पूजा की। कितना प्रेम भाव बन गया था इन लोगों में शायद विस्थापन के दर्द ने सबको एक सूत्र में बांध दिया था। यह सांझे दर्द का रिश्ता एक बंधन मे बंध चुका था। फिर आया महाशिवरात्री का पर्व, होली, दिपावली की भांती यह पर्व भी सब ने मिल बांट कर सद्‍भावना एवं प्रेम से मनाया।

मनोज अब जवान हो चुका था और कई बार उसके भैया भाभी ने उसके विवाह का जिक्र किया पर मनोज ने साफ मना कर दिया। वह बैठे ठाले यह मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता था। और फिर कौन उसे अपनी लड़की देगा इस फटे हाल में। भाई भाभी के लाख समझाने पर भी वह राजी नहीं हुआ उसका कहना था वह किसी लड़की की जिन्दगी इस नरक में क्यों खराब करेगा। हाँ जब वह अपने पैरों पर अच्छी तरह खड़ा हो जायेगा ढंग का मकान हासिल करेगा तब वह शादी के बारे में सोच सकता है। भाभी ने उसे समझाया कि विस्थापन से उसके जीवन की नैया रुक तो नहीं गई। अब इस फटेहाली में भी शादीयाँ होती हैं बारात चाहे शामियाने में आये या किसी टूटी इमारत में आज भी बच्चे जनते हैं। पर लाख समझाने पर भी मनो नीं माना तो भाई भाभी ने कहना ही छोड़ दिया।

सर्दियाँ खत्म हुई तो गर्मी का प्रचन्ड उठता ही चला गया। अब कमरे में सोना मुमकिन न था, इसलिए मनोज ने अपनी चारपाई छत पर लगानी शुरु कर दी, और मस्ती से उसकी रात गुजरती, पर श्याम को नीचे गर्मी में परेशानी होती, उसे शब्दों में ब्यान करना मुश्किल था। उसकी पत्नी थी, और उसे लेकर वह कैसे छत पर सोता। पर एक दिन उसे एक युक्ति सूझी, उसने छत पर अपनी चारपाई के पायों के साथ चार बांस बाँध दिए, और एक मसहरी बाँध दी, फिर उसकी देखा देखी इमारत में रह रहे सारे लोगों ने यही युक्ति अपनाई। कम से कम भट्टी की तरह झुलसते कमरे से तो छत की गरम हवा अच्छी थी। कहाँ वह अपने घरों का महफूज वातावरण, और कहाँ यह सड़क पर नरक जैसी जिन्दगी, पर कहते हैं ना आदमी की फितरत में उदास रहना लिखा ही नहीं, वह हर हाल में अपनी खुशी का सामान ढूँढ ही लेता है। पर औरों कि यह खुशी मनोज की जिन्दगी का बवाल बन गई। पहले जब वह अकेला छत पर सोता था तो उसे चैन की नींद आती थी पर जब से छत पर शादी-शुदा लोगों ने सोना शुरु किया मनोज की रातों की नींद उड़ गई। उसकी चारपाई से थोड़ी दूर मसहैरी के नीचे लेटा हुआ कुमार और उसकी बीवी का जोड़ा रात भर ...चुहलबाजी करता तो उसे नींद कैसे आती।बन्सीलाल और उसकी पत्नी कमला की चारपाई तो देर रात तक चूँ चूँ का संगीत सुनाती। अन्धेरे में युगल जोड़ों की सरगोशियाँ और कभी इठलाती चाँदनी में उनके बदनों की जुम्बिश और विभिन्न आवाजों ने मनोज को सारी रात करवटें बदलने को मजबूर कर दिया। कई रोज तक वह बर्दाश्त करता रहा नीचे जाकर कमरे में भी सोने की कोशिश की पर सिर्फ ईंट गारे से बना यह कमरा रात को किसी भट्टी की तरह सुलगता था तो फिर बात बर्दाश्त के बाहर हो जाती थी। और एक दिन मौका देखकर वह भाई से बोला "भैया श्याम मैं कई दिनों से आपसे एक बात करना चाहता हूँ पर समझ नहीं आता कैसे कहूँ।" श्याम ने उसे पास बैठा कर कहा देख "भाई मैं तेरा बड़ा भाई जरूर हूँ पर तू मुझे अपना दोस्त समझ और बता तेरी समस्या क्या है"। बड़े जतन के बाद मनोज ने कहा "भैया बात दरसल यह है कि मैं शादी करना चाहता हूँ... मैं मानता हूँ कि मुझे इस बात से परहेज था पर... भाई अब छत पर अकेले सोना मेरे बसकी बात नहीं... वह मरदूद कुमार और उसकी बीवी रात भर न जाने क्या क्या बकते रहते हैं ...... भाई अब बस मेरी शादी करवा दो... मेरे पास कुछ जमा किए हुए रुपये हैं मालिक के पास...... आप बात चलवा दो...।"

भाई की बातें सुन कर श्याम जोर से हँसा और जाकर अपनी पत्नी को सारी बातें सुनाकर ताकीद की कि कोई अच्छी लड़की देखकर मनोज का रिश्ता पक्का करवा दे। यह बात इतनी आसान नहीं थी क्योकि एक अनपढ़ विस्थापित को कौन अपनी बेटी देता पर श्याम की पत्नी श्यामा भली औरत थी उसने इमारत में रह रही अपनी सखियों से यह बात कही तो सब हँस पड़ीं पर उससे वादा किया कि कोई अच्छी लड़की देखकर बात पक्की करवा देंगे। देखते देखते एक महीना और बीत गया पर कही बात नहीं बन पाई और एक दिन मनोज की भाभी के पास एक औरत अपनी भान्जी का रिश्ता लेकर आई।

लड़की भी काशमीर के एक छोटे से गाँव की थी उसके बाबा पिछले साल नदी में डूब कर मर गए थे। उसकी माँ उसके बचपन में ही उसको छोड़ कर ईश्वर को प्यारी हो गई थी। अब दूर के रिश्ते के मामा मामी के पास वह पल रही थी और उसके मामा की अपनी 3 बेटियां थीं जो शादी के काबिल हो चुकी थीं वह किसी दुकान पर छोटी मोटी नौकरी करके अपना व अपने परिवार का पेट बड़ी मुश्किल से पाल रहे थे इसीलिए वह अपनी बहन की अमानत को किसी सुयोग्य वर के हाथ सौंपकर इस जिम्मेदारी से मुक्ति पाना चाहते थे।

उस औरत ने श्यामा से साफ कहा कि उनके पास दान दहेज देने की कोई गुंजाइश नहीं है अगर वे लोग लड़की को ही दहेज समझकर उसे स्वीकार करें तो बात बन सकती है। फिर बात आगे बढ़ी और मनोज ने लड़की पसंद करली और शीघ्र ही शादी का महूर्त निकालने के लिए वह भाई से जिद करने लगा......। भाई भाभी न समझाया कि गर्मीयाँ खत्म होते ही वह उसकी शादी कर देंगे। पर वह कहाँ मानने वाला था। फलत: बीस दिन के बाद उसकी शादी पक्की कर दी गई। बड़ी अच्छी लड़की थी रूपा । गाँव की अल्हड़ जवानी लिए वह एक सुन्दरता की तसवीर थी। गोल चाँद सा मुखड़ा सिन्दूर मिले मक्खन जैसा खिलता रंग काली कजरारी आँखें और गुलाब की पंखुड़ियों से प्यारे होंठ, मनोज अपनी किस्मत पर फूला ना समाया। वह शादी से पहले रूपा से कभी बाहू के किले पर मिला तो कभी काम से छुट्टी लेकर उसे शकुन्तला सिनेमा में पिक्चर भी दिखा लाया। उन्होंने युगल दम्पती की तरह स्टूडियो मे फोटो भीखिंचवा लिए। मनोज अब बेसब्री से उस रात का इन्तजार करने लगा और अब यह छत की आवाजें उसका रोयाँ रोयाँ हिला देती।

शादी के दो दिन पहले मनोज ने भाई की मदद से नया फोल्डिंग पलंग खरीदा। मजबूती से चार बांस पायों के साथ बाँध दिए और एक नई मसहरी भी लगा दी। पलंग पर उसने नई नकोर चादर और नया तकिया बिछाया और सोने की कोशिश करने लगा। खुली हवा में सोने वाला मनोज़ मसहरी की चार दीवारी में अपना दम घुटता सा महसूस करने लगा। पर यह सोच कर सोने की कोशिश करने लगा, कि अब तो उसे इस बात की आदत डाल लेनी चाहिए। रात का पहला पहर बीतते ही, छत पर वही आवाजें आने लगी। चारपाईयों की चूं चूं, और दबी दबी सिसकारियों की आवाजें, कही चूमने का स्वर सुनाई पड़ा, तो कहीं निर्लज्ज हँसी का ......। यह आवाजें सुनकर मनोज सिहर उठा...... क्या वह भी शादी के बाद ऐसी आवाजें निकालेगा...... क्या उसका कृत्य भी लोग उसी आन्नद से देखेंगे और सुनेंगे, जैसे वह देखता और सुनता आया है, यह नंगी आवाजें, अब उसे किसी रस का आभास देने के जाय, पिघले हुए सीसे की तरह लग रही थी, जो उसके कानों में उड़ेला जा रहा था......। यह कैसी जिन्दगी जी रहे हैं वे सभी लोग...... जानवरों जैसा व्यवहार, सड़क पर एक किस्म का नंगा व्यवहार......। लोग उसे भी सुनेंगे और व्यंग्य कसेंगे। वह क्या करे...... शादी से मना भी नहीं कर सकता...... रूपा के मामा और रूपा शायद सदमे से ही मर जायें। कही भाग भी नहीं सकता है...... भगवान यह कैसी विडम्बना में फंस गया मैं। यही सोचते सोचते भोर का हल्का उजाला छत पर छाने लगा और काली रात का परदा विस्थापितों की नंगी जिन्दगियों से हटकर उन्हें सरे आम रुस्वा करने लगा। मनोज अपनी मसहरी की घुटन से निकला तो उसने देखा कि रतन की मसहरी का एक भाग ढलका हुआ है और उसकी पत्नी का नंगा बदन दिख रहा है मदन की फटी हुई मसहरी से उसका नंगा बदन साफ नजर आरहा है जो खुली हुई लुंगी में से साफ दिख रहा था। महाराज कृष्ण की जवान बेटी की जवानी मसहरी के पोरो से साफ दिख रही थी। यह नंगापन देखकर मनोज काँप उठा उसे अपने आप से घृणा होने लगी। क्यों उनके संसार में आग लग गई क्यों उन्हें उनकी नीवों से निकाला गया। जहाँ उनका घर चाहे वह घास का झोपड़ा हो या एक आलीशान बंगला उनकी इज्जत का रखवाला था इस अनजानी बस्ती में उनकी इज्जत सरे बाजार लुट गई...... वह चाहने लगा कि उनकी शादी का दिन कभी न आये......। समय रुक जाए और यहीं थम जाए पर समय न कभी रुका है न किसी कि विनती पर रुक सकता है......।

उसके विवाह की वेला भी आ गई। चन्द लोगों की यह बारात जिसमें उसका भाई और गाँव के कुछ यार दोस्त शामिल थे एक मैटाडोर में "मुट्ठी" कैम्प की तरफ रवाना हुए। यहाँ पर एक शामियाने में उसका विवाह सम्पन्न हुआ। अग्नि के सामने एक दूसरे को पति पत्नी स्वीकार किया और फिर सारी रस्मों से निबट कर वह रात को एक बजे अपनी दुलहन के साथ अपने घर लौटा। भाभी ने उसका स्वागत किया। और फिर उन्हें नीचे कमरे में छोड़कर सब ऊपर चले गए। यार दोस्तों ने काफी छेड़ छाड़ की कोई मोगरे के फूल ले आया था तो कोई बादाम वाला दूध। महेन्द्र कौल सहाब तो उसे चुपचाप कुछ गुर सिखा के मुस्कराते हुए चले गए। अब कमरे में सिर्फ मनोज और रूपा थे। लाज की गठरी बनी रूपा जो अब अपने दुलहन वाले लिबास को बदलकर नाइटी में आ गई थी। कमरे के पीले प्रकाश में और भी खूबसूरत लग रही थी। उसके गोरे मुख पर एक अजीब सी कशिश लग रही थी। इस रात के स्वप्न देखने वाले मनोज की आँखों में एक अजीब सी चमक थी पर गरमी के मारे बुरा हाल था। उसका नया कुरता पसीने से तर हो कर उसकी कमर से चिपक गया था। बड़ी कोशिश की उसने की कमरे मे ही सो जाए पर कमरे में गर्मी की शिद्दत और असंख्य मच्छरों ने बुरा हाल कर दिया। हार कर मनोज ने रूपा से छत पर चलने के लिए कहा मनोज का दिल छत पर चढ़ते समय काँप रहा था और माथे पर पसीने की बूँदें टपकने लगी उसका दिल जैसे वक्ष का पिंजरा तोड़कर बाहर आने को आतुर हो उठा। छत पर हलकी चाँदनी छिटकी हुई थी और गहरी खामोशी छाई थी वह रूपा का हाथ पकड़ कर तुरन्त अपनी सजी सजाई मसहरी में घुस गया। चूं चर चर की आवाज रात की खामोशी को तोड़ती हुई निकल गई। मनोज ने चुपचाप अपने आस पास की स्थिती का जायजा लिया। चूँ चर की आवाज सुनते ही चारों तरफ से हलकी हलकी आवाजें आने लगीं कुमार की बीवी की दबी दबी हँसी उसे सुनाई दी और दूसरी चारपाइयों पर भी करवटें बदलने की आवाजें आने लगीं कुछ लोग तो जानबूझ कर पानी पीने के बहाने मसहरी हटाकर उनकी और देखकर चुलहबाजी कर रहे थे।

मनोज और सिमटकर बैठ गया वह हिला तक नहीं ताकि उसकी आवाज न सुनले कोई सारी रात आँखों आँखों में कट गई रूपा भी जागती रही। दोनों आँखों की मूक भाषा में एक दुसरे को छिटकी हुई चाँदनी में समझने की कोशिश करते रहे भोर की पहली किरण फूटते ही मनोज ने अपना बिस्तर समेटा और रूपा को लेकर नीचे भागा। कुछ देर बाद बाकी सारे लोग जाग गए और मनोज के दोस्त उसे बधाई देने पहुँचे। "क्या बेटा बाजी मार ली, कहीं हमारी नाक हो नहीं कटाई।" बेचारा मनोज सिर्फ हाँ हूँ करता गया। सारा दिन उसका मन काम में न लगा। उसे रात की आगमन से घबराहट होने लगी वह प्रार्थना करने लगा कि रात कभी न आए पर उसे फिर आना था और फिर मनोज और रूपा की रात उसी तरह आधा सोते आधा जागते कटी। इसी तरह एक हफ़्‍ता हो गया तो एक दिन रूपा का मामा उसे कुछ दिन के लिए मायके लिवाने के लिए आया। मनोज ने जैसे चैन की साँस ली और उसने अपनी मसहरी से लिपट कर सोने की कोशिश की। वह जितना उन नंगी आवाजों से पीछा छुड़ाने की कोशिश करता वह उतना ही उसका पीछा करती।

जब रूपा को मायके गए 15 दिन हो गए और मनोज ने उसे लिवाने की कोई सुध न दिखाई तो उसे उसके यार दोस्त संगी साथी छेड़ने लगे अरे क्या भाभी से झगड़ा हो गया है साले रह कैसे लेता है तू बीवी के बिना। मनोज सिर्फ हूँ हाँ करके या मुस्करा कर बात टालने की कोशिश करता पर अगले दिन जब वह काम से लौट रहा था कि उसने भाई भाभी को बातें करते सुना।

श्याम कह रहा था, "अरे सुनो भाग्यवान तुम्हें क्या लगता है मनोज क्यों बहू को घर नहीं ला रहा क्या उसे लड़की पसंद नहीं ?"

श्यामा ने उत्तर दिया, "पहले तो मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा था पर बात दरअसल कुछ और है।" कहते हुए श्यामा कुछ हिचकिचाई।

"कोई और बात क्या मतलब है तुम्हारा? साफ साफ क्यों नहीं कहती तुम।"

श्यामा ने उसके आगे जो कहा सुनकर मनोज के पाँव तले की धरती खिसक गई उसे लगा सैंकड़ों वज्रपात उसके सीने को छलनी कर गए। उसका अiस्तत्व तिनके तिनके होकर बिखर गया...... जो आगे उसने सुना।

"श्यामा यह क्या कह रही हो तुम...... तुमसे किसने ऐसी वाहियात बात कही...?"

श्यामा बोली, "सुनी सुनाई नहीं हकीकत है...... रूपा ने अपनी एक सहेली को यह बात बताई थी और उड़ते उड़ते यह बात मुझ तक पहुँच गई सब लोग रूपा की किस्मत पर आंसू बहा रहे हैं कि सब कुछ पता होकर भी हमने उसे और उसके मामा मामी को धोखे में रखा।" इससे आगे मनोज सुन न पाया और भाग कर छत पर गा और पागलों की तरह चिल्लाने लगा............ "तुम सब नंगे हो वहशी हो" उसने अपने कपड़े फाड़ डाले और छत पर लगी तमाम मसहरीयों को नोचने खसोटने लगा। शोर सुन कर लोग छत पर आ गए। मनोज जब उनकी तरफ बढ़ा तो लोगों ने उसे दबोच लिया। वह जोर जोर से चिल्लाने लगा...... "हटो तुम नंगे लोगों मुझ में अभी कुछ शर्म हया है...... दूर हो जाओ मेरी नजरों से हा... हा... हा।" और फिर वह दहाड़े मार मार कर रोने लगा श्याम व उसकी बीवी यह हृदय विदारक दृश्य देख सकते में आ गए। इतने मे कोई पागल खाने फोन कर चुका था और वे लोग उसे घसीटते हुए ले गए। मनोज चिल्ला रहा था...... "भैया मैं पागल नहीं हूँ...... इन लोगों की नग्नता ने मुझे पागल कर दिया...... भाभी मैं पागल नहीं ...... मैं नंगा हूँ हा... हा... हा... हा... हा... हा... मैं नंगा हूँ।"


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