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| 08.27.2007 |
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समाधान वीणा विज 'उदित' |
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पल्लवी ने
कॉलेज से आकर मेज पर किताबें पटकी तो उसकी नज़र घर की साफ सुथरी सज्जा पर
ठहर गई। उसे लगा अवश्य ही कोई विशेष बात है जो घर को सजाया गया है। माँ को
पुकारती वह रसोई की ओर चली गई। रसोई से आती महक से उसका शक यकीन में बदलने
लगा। माँ नई प्लेटों में नाश्ते का सामान परोस रही थी। पल्लवी को देखते ही
बोली,
"आ
गई। चल जल्दी से तैयार हो जा। वो नया गुलाबी सूट पहन ले। बहुत सुन्दर दिखती
है तू उसमें।"
"पर
क्यों माँ",
पल्लवी ने पूछा।
"तेरी
नीरजा मौसी के रिश्तेदार हैं। उनका बेटा पी.डब्ल्यू.डी.में एस.डी.ओ. के पद
पर लगा है। वह किसी काम से यहाँ आया है। तेरी मौसी ने उसे हमसे मिलने को
कहा। सो वह आ रहा है। क्या पता ...",
और
बात अधूरी छोड़ माँ काम में लग गई।
यह सुनकर
पल्लवी की आँखों के सामने तुषार का चेहरा घूम गया। एकदम सामने वाली कोठी
में तुषार डा. वर्मा का बेटा मेडिकल का विद्यार्थी है। पल्लवी और तुषार
दोनों ही एक दूसरे को किसी न किसी बहाने देखते रहते थे। रात में भी दोनों
देर तक पढ़ते। पढ़ते हुए खिड़की तक आते और नज़रों से एक दूसरे को पढ़ने लग
जाते। फिर दोना ही झेंप जाते। पल्लवी मुस्कुराकर,
शरमाकर ओट में हो जाती व तुषार वहीं खड़ा मुस्कुराता रहता। दोनों एक दूसरे
को पसंद करते थे। तुषार किसी न किसी बहाने पल्लवी के पापा के पास आता रहता,
तो
पापा भी उसकी तारीफ़ करते थकते नहीं थे। दोनों सुनहरे सपनों के जाल बुनने लग
गए थे। पल्लवी बी.ए. फाईनल में तो तुषार एम
बी. बी.एस.फाईनल में था।
आज पल्लवी
के प्यार की बेल परवान चढ़ने से पूर्व ही मुर्झाने चली थी। अपने माँ बाबा के
ऊपर तीन तीन बेटियों का बोझ ...वो अच्छी तरह समझती थी। अनमने मन से उसने
माँ का कहना माना कि तभी एक सरकारी गाड़ी उनके दरवाजे पर आकर रुकी। उसमें
से एक सज़ीला,
ऊँचे कद वाला,
आकर्षक व्यक्तित्व का नौजवान बाहर उतरा। उसे देखते ही सबके चेहरे खिल उठे।
माँ के तो खुशी व उत्साह से कदम ही धरती पर नहीं पड़ रहे थे। पल्लवी को चाय
की ट्रे देकर भीतर भेजा गया। गेहुँए रंग की पतली,
लम्बी और मृगनयनों वाली पल्लवी ने जैसे ही पलकें उठाकर धीरे से मुस्कुराकर,
नमस्ते कहा,
तो
अरुण सब कुछ भूल उसे अपलक देखता ही रह गया। उसे लगा,
वो
उन नैनों के अथाह सागर में डूबता चला जा रहा है। अब उसका बाहर निकलना
मुश्किल है। सबने उसके भाव पढ़ लिए। पापा गर्वित थे अपनी बेटी पर। उसी पल
रिश्ता पक्का हो गया। आती सर्दियों में पल्लवी और अरुण का विवाह सम्पन्न हो
गया। पल्लवी भी तुषार के आर्कषण से हट अरुण के प्यार में खो गई और अपने घर
चली गई। तुषार मूकदर्शी बना अपने प्यार को लुटता देखता रहा।
अरुण की
नौकरी इन्दौर में होने से पल्लवी कुछ दिन सास ससुर के पास रुककर अपना नीड़
बसाने इन्दौर ही आ गई। अरुण तो पल्लवी की नशीली आँखों का दीवाना था। वह उसे
भरपूर प्यार देता। तुषार ने प्यार की जो चिंगारी लगाई थी.उसमें प्यार की
लपटें अरुण ने जलाईं। पल्लवी भी सब कुछ भूलकर अरुण के प्यार के रंग में
पूरी तरह रंग गई थी। अरुण बहुत ही हँसमुख व साथ ही बुद्धिमान था। उसके साथी
व अफ़सर उसे बहुत चाहते थे। पल्लवी को अरुण को पाने का गर्व था।
पापा
लिवाने आए तो वह मायके आई। पता चला कि तुषार भी एम.बी.बी.एस.में पास हो गया
है। आगे पढ़ने विलायत जा रहा है। उसके पिता ने बताया कि अभी शादी के लिए वह
नहीं मानता। पल्लवी ने उड़ती नज़रों से उसे देखा,
ख़ास ध्यान नहीं दिया। अरुण तीसरे दिन आकर उसे वापिस लिवा ले गया।
पता ही नहीं चला कब पल्लवी और
अरुण की शादी का एक साल बीत गया। सुख के दिनों के पर होते हैं,
वे
हवा में उड़ जाते हैं। उन दोनों को लगता जैसे वे जन्म-जन्म से साथ रहते
हैं। तभी सासु माँ ने बुला भेजा। दोनों के पहुँचने से वहाँ आनन्द छा गया।
दबे शब्दों में सासु माँ ने बताया कि साथ वाली शान्ति की बहू के ब्याहते ही
पाँव भारी हो गए थे। साल हुआ है शादी को,
गोद में बेटा है। पल्लवी ने कनखियों से अरुण की ओर देखा। अरुण झट बोला,
"माँ,
देश की आबादी पहले से ही ज्यादा है,
थोड़ा सब्र करो तो।"
"अरे
ना,"
माँ झट बोली "हम ही बचे हैं क्या देश की चिंता करने को,
ना
लला हमें तो पोता चाहिए।" अरुण हँस के बोला,
"अगली
बार ला दूँगा भई।" यह सुन पल्लवी मुँह में पल्ला दबा लाज के मारे वहाँ से
भाग गई। इस प्रकार सास की उम्मीदों को हवा दे वे वापिस लौट गए। जब भी वहाँ
से फोन आता,
उन्हें ख़्ाबर का इंतज़ार रहता। पल्लवी और अरुण के चाहने पर भी जब पल्लवी के
पाँव भारी नहीं हुए,
तो
हारकर पल्लवी ने अपना डॉक्टरी मुआइना करवाने की अरुण से ज़िद की। डॉक्टर ने
बताया कि सब कुछ नॉर्मल है। यूँ ही ताकत की गोलियाँ दे दीं। इसी ऊहापोह में
दूसरा साल भी बीत गया।
पल्लवी की हिम्मत ही नहीं होती थी,
ससुराल जाने की। पर...जाना तो था ही आख़िर....
अब की बार
सासु माँ ने देसी टोटके कराए। गरम तासीर की चीजें बनाकर खिलाईं। पंडित से
धागा भी लाकर उसको बाँधा। पर फिर भी बात नहीं बनी। पल्लवी खोई खोई सी रहने
लगी। माँ पिता जी ने बुला भेजा,
सो
मायके जाना हुआ। धीरे से माँ ने कहा कि अरुण को भी अपना टेस्ट करवाना
चाहिए। लेकिन अरुण से यह बात कहे कौन। पल्लवी को अचानक तुषार की याद आई। दो
साल में विदेश से एम.डी. कर के आने के बाद तुषार ने यहीं प्रैक्टिस शुरू कर
दी थी। अरुण जब पल्लवी को वापिस लिवाने आया तो पल्लवी ने प्यार से उसे अपना
टेस्ट करवाने को कहा,
तो
अरुण एकदम मान गया। वह बात को समझता था।
डॉ तुषार ने जब पल्लवी और अरुण को अपने क्लीनिक पर देखा तो बहुत
प्यार से मिला। तुषार अपने सपनों की देवी को सामने देख भीतर ही भीतर दर्द
से छटपटा उठा था। वह पल्लवी को भूल नहीं पाया था। पल्लवी ने भी तुषार की
आँखों के दर्द को पढ़ लिया था,
पर
वो ऊपर से मस्त बनी रही। अरुण ने टेस्ट करवाया।
तुषार ने कहा वह शाम को घर आते हुए रिपोर्ट लेता आएगा। एक बार और
पल्लवी को देखने का लालच वह छोड़ नहीं पाया। शाम को आकर उसने बताया कि सब
नॉर्मल है। अरुण व पल्लवी अगले दिन वापिस चले गए। .सब कुछ ईश्वरेच्छा पर
छोड़ दिया गया।
इसी बीच
पल्लवी की छोटी बहन वैष्णवी का विवाह तय होने पर,
तकरीबन छै: महीने बाद ही पल्लवी का पुन: मायके आना हो गया। माँ अकेले शादी
की तैयारी नहीं कर सकती थी,
इसलिए पल्लवी एक महीने के लिए रहने आ गई थी। खैर,
एक
दिन किसी सहेली के जाते जाते उसने रिक्शा तुषार के क्लीनिक की तरफ मुड़वा
लिया। तुषार अचानक उसे सामने देखकर अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाया।
कुशल क्षेम के पश्चात् उसने पूछा कि कैसे आना हुआ। पल्लवी ने बताया कि छै:
महीने बीत गए हैं,
पर
कोई बात नहीं बनी। इस पर तुषार ने जो भेद खोला,
उसे जानकर तो पल्लवी के पैरों के तले से ज़मीन ही खिसक गई। "अरुण कभी बाप
नहीं बन सकता।" इतना सुनते ही वह रोने लगी। वह नाराज़ हुई कि तुषार ने
उन्हें धोखे में क्यों रखा। तुषार ने कहा कि वो अरुण को ठेस नहीं पहुँचाना
चाहता था,
पर
उसे अवश्य बताना चाहता था। लेकिन मौका ही नहीं मिला,
और
वह चली गई थी। बहुत अच्छा हुआ जो आज वह उसे मिलने आ गई है।
घर वापिस
आकर पल्लवी चुपचाप कमरे में गई व बिस्तर पर औंधी पड़ी देर तक रोती रही। उसे
लगा,
अब
माँजी अवश्य अरुण की दूसरी शादी करवा देंगी। पीर बाबा की तावीज बाँध कर भी
कुछ फल नहीं मिला। माँ भी ज्योतिषियों के चक्कर लगाकर दान पुण्य करवा चुकी
है। सभी चिन्तित थे उसके लिए। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे,
कहाँ जाए। पल्लवी का जीवन तो अरुण के बिना खतम ही है। फिर भी अरुण की बात
को उसने अपने तक ही सीमित रखा। किसी से कोई बात नहीं की।
अगले दिन
टी.वी.पर सभी महाभारत देख रहे थे। राजा शान्तनु के पुर्नविवाह पर जब भीष्म
ने प्रतिज्ञा की कि वे आजीवन विवाह नहीं करेगें,
और
दूसरी रानी के दोनों पुत्रों की मृत्यु हो जाने पर उनकी पत्नियों को
महारानी अपने विवाह पूर्व के ऋषि पुत्र से सम्भोग करवाकर क्रमश: पांडु,
धृतराष्ट्र और दासीपुत्र विदुर को प्राप्त करती है....तो यह देखकर पल्लवी
अन्दर कमरे में जा विचार में डूब गई। सारा दिन सर दर्द का बहाना कर वो किसी
से नहीं मिली।
सोमवार को
वह माँ से अरुण के किसी काम से किसी से मिलने का बहाना कर दो तीन घंटे में
आने का कह तुषार के क्लीनिक पहुँच गई। तुषार पुन: उसे वहाँ देख प्रसन्न व
साथ ही चकित भी हुआ। भीतर ले जाकर उसने इत्मीनान से पूछा कि कहीं कोई
गड़बड़ तो नहीं हो गई। पल्लवी ... कुछ देर तक मुँह से कुछ नहीं बोली। अपलक
उसकी आँखों में देखती रही। उस नज़र को नज़रन्दाज़ करते हुए वह उसे पानी पूछ
रहा था। पर वह...कुछ नहीं सुन रही थी। अचानक उसने कस कर तुषार के दोनों हाथ
पकड़ लिए। वह फफक फफक कर रोने लगी..... "तुषार,
मुझे बचा लो,
मेरी गृहस्थी को बचा लो। मैं अरुण के बिना नहीं रह सकती। मुझे इस घनघोर
अंधेरे में केवल एक ही प्रकाश की किरण दिख रही है। वो ......तुम हो।"
तुषार
अचानक उसे भावुक देखकर घबरा उठा। उसने बहुत ही दुलार से पल्लवी के हाथों को
अपने हाथों में ले लिया। मानो वे बेशकीमती हों,
कहीं हल्का सा धक्का लगने से चूर चूर न हो जाएँ। स्नेह से बोला कि उसकी तो
जान भी हाजिर है पल्लवी के लिए।
वह बात तो बताए। पल्लवी ने जो कुछ कहा उसे सुनकर तुषार झटके से खड़ा
हो गया। मानो बिच्छु ने डस लिया हो। नैतिकता को ताक पर रखकर पल्लवी ने अपनी
डूबती जीवन नैय्या के लिए एक तिनके का सहारा
’ढा
था। उसने तुषार से एक बच्चे की माँग की.........। एक सम्भोग की
माँग.........।
इसी से वो अपने पति की प्रेयसी व अर्द्धांगिनी बनी रह सकती है। उसे
बुल्लेशाह की क़ाफ़ी याद आई....जिसमें यार की ख़ातिर वो कंजरी बनने को तैयार
थी,
"नी
मैं यार मनाना नी,
चाहे लोग बोलियाँ बोले"....कितना दीवानापन है न...। पल्लवी भी आज अपने अरुण
को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहती। तुषार पल्लवी का अरुण के प्रति प्रेम
व आसक्ति देखकर दंग रह गया। और....इसके बाद वे दोनों जीवन में कभी..भी नहीं
मिलेंगे ... व यह राज़ दोनों के सीने में दफ़न हो जाएगा। यह वादा हो गया।
वैष्णवी
के विवाह पर अरुण व उसके परिवार के सभी लोग आए। पल्लवी भी खुशी खुशी काम
में लगी रही। वापिस जाकर कुछ
दिनो बाद सुबह उठते ही पल्लवी का जी मचलाया और उल्टी आई। अरुण उसे डॉ. के
पास ले गया। डॉ. ने अरुण को बधाई दी। अरुण ने पल्लवी पर चुम्बनों की बारिश
कर दी। माँ को झटपट फोन लगाया। माँ तो फोन पर खुशी से रोने ही लग गई। अरुण
ने माली से ढेरों लाल गुलाब मँगवाए। पल्लवी को पलंग पर बैठा उस पर फूलों की
वर्षा करता वह थकता न था। और....और पल्लवी अपने अरुण को इस कदर प्यार करते
व खुशी से पागल होते देख मुस्कुरा रही थी। उसकी आँखों में भी संतोष के दो
आँसू ढुलके और फूलों की पंखुड़ियों में समा गए। |
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