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| 08.27.2007 |
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धूल भरी परत वीणा विज 'उदित' |
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चाँदी के रुपहले तार सी सामने थीं अनगिनत दीवारें दीवारें दर दीवारें लम्बे गलियारे यादों की दीवारों में दरारें पड़ी
थीं ठहर जाती है कश्मोकशे ज़िंदगी |
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