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| 08.27.2007 |
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रेखाओं की करवट वीणा विज 'उदित' |
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दिसम्बर
की छुट्टियों में कनु होस्टल से घर आई थी। जी तो चाहता था कि लम्बी तान कर
सोई रहे। होस्टल की घंटी से बंधी दिनचर्या से कुछ दिनों के लिए छुटकारा तो
मिला। पर कहाँ....?
मम्मी है कि अपनी अपेक्षाओं को संजोए बैठी थीं। कनु आएगी तो यह करूँगी. वह
करूँगी। कनु के साथ फलां-फलां के घर जाऊँगी। सो घर आकर भी मन की करना कiठन
हो गया था।
आज शाम को
डैडी के एक करीबी मित्र के घर बेटी की शादी की बधाई देने उसे साथ ले जाना
चाहती थीं। शादी तो उन्होंने अपने पुश्तैनी गाँव में जाकर की थी। अब शहर
में उनकी बेटी
’दम्मी’
पहली बार मायके आई थी। हमउम्र कनु से मिलकर उसे अच्छा लगेगा... ऐसा मम्मी
का विचार था। सो.. बलि का बकरा कटने को तैयार..... कनु चल पड़ी मम्मी के
साथ उनके घर।
आंटी ने
कनु को साथ देखते ही बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। बोलीं,
’आज
तो बिटिया रानी भी आई है कैसी हो।’
मम्मी इस पर गर्व से मुस्कुरा दीं। कनु को कनखियों से देखा। मानो कनु को
साथ लाना सार्थक हो गया। दम्मी भी झट आकर मिली। काफ़ी सजी धजी थी वो। कनिका
व दमयंती हमउम्र ही थीं,
लेकिन औपचारिकता के सिवाय वहाँ कुछ भी नहीं था। सो,
बनावटी मुस्कुराहट से दोनों मिलीं। कुछ था. .जो कनु को वहाँ भा नहीं रहा
था। खैर....मम्मी ने दामाद के विषय में पूछा कि वे नहीं आए क्या। कि आंटी
तपाक से बोलीं,
’लो
पहली बार अकेले थोड़े ही भेजा है,
साथ आए हैं। कहते हैं साथ ही ले भी जाएँगे।’
बोलने में गर्व का पुट था। कनु ने सोचा कि ठीक ही है। आजकल के माँ बाप
दामाद को अपनी बेटी के आसपास मंडराते देखते हैं तो सोचते हैं.. बाजी मार
ली। फिर भी अपना अपना ढंग है जीने का। कनु को बोरियत लगने लगी थी। उसका
उठने का मन हो रहा था कि तभी आंटी ने कुछ भाँपते हुए कहा कि वे लोग एलबम
देखेंगे कि वीडियो कैसेट लगाएँ?
मम्मी ने
छूटते ही जवाब दिया कि वीडियो कैसेट घर मँगवा कर देख लेगें। अभी एलबम
ही.....मम्मी का वाक्य अधूरा ही रह गया,
क्योंकि तब तक आंटी ने दम्मी व उसके पति की फोटो दिखा दी। बोलीं,
’कैसे
लगे?’
दम्मी ने भी गर्व से कनु की ओर देखा। कनु ने मजबूरन उचटती नज़र फोटो पर
डाली। उसकी नज़र वहीं अटक गई। शरीर में बिजली का करंट दौड़ गया। वह हैरानी
से भर उठी। ये...
ये.... ये तो निपुण--
उसका निपुण है। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। पलकें झपकना ही भूल
गईं। क्या.. क्या. .
निपुण ही दम्मी का...। हे भगवान् कनु अभी सकते की हालत से सम्भल भी नहीं
पाई थी कि बाहर किसी कार के रुकने व हॉर्न की आवाज़ आई। अंकल के साथ
निपुण......। आज उसका निपुण उसके सामने था परन्तु उसका नहीं था। निपुण भी
अचानक अपनी कनु को सामने देख. . दोनों ही क्षण भर को ठगे से खड़े रह गए।
दोनों ही सोच रहे थे कि. ....क्या कभी सोचा था कि कभी मिलना होगा और वो भी
इन हालात में। कनु मम्मी की ज़िद पर यदि आज यहाँ न आती तो....तो इसके आगे
सोचना भी उसे सह्य नहीं हुआ।
मम्मी भी
तपाक से बोलीं अरे यह तो अपना निपुण है। निपुण ने भी मम्मी के पैर छुए।
ढेरों सवालों से भरी नज़रें कनु से चोरी से मिलीं। कनु व निपुण दोनों ही चुप
थे। मानो दोनों को साँप सूँघ गया हो। निपुण वहाँ से हट कर खिड़की के पास
खड़ा हो बाहर देखने लगा,
बीच बीच में कनु को भी देखता रहा। मानो पूछ रहा हो,
कहाँ गुम हो गई थीं तुम?
और
अब मिली हो जब....जब सब कुछ ख़्ात्म हो गया है। उधर अंकल ने मम्मी से शादी
पर न पहुँचने का गिला किया। दम्मी के पापा सतना में रहते थे। दम्मी की शादी
से कुछ पहले ही भोपाल आए थे। सो,
निपुण को कुछ ज्ञात नहीं था। निपुण ने मम्मी से मनु और साहिल का हाल पूछा।
उन्होंने वादा किया कि वे कल निपुण से आकर अवश्य मिलेंगे। वे लोग चलने के
लिए उठने लगे,
पर
कनु के पाँव पत्थर हो रहे थे। वो वहाँ से हटना ही नहीं चाहती थी। काश,
वक्त वहीं थम जाता। क्या करे... क्या न करे। बेबसी थी। उधर निपुण भी जैसे
भीतर ही भीतर टूटता जा रहा था। यह कैसा मोड़ आया है उनके जीवन में। यह कैसी
मजबूरी थी कि तभी फोन पर बात पूरी करके दम्मी भीतर से आई। छूटते ही बोली,
’निपुण,
यह
कनिका। याद है डिंकी भैया की शादी में कोटा आई थी।’
काश,
निपुण कह सकता कि पिछले दो साल उसने एक उम्र की तरह इसी याद में ही तो काटे
हैं। कितना तड़पा था वह हर पल। पर अब शिष्टता के नाते मुस्कुराकर उसने सिर
हिला दिया। उसके भीतर झंझावत चल रहा था। कनु के चेहरे को पथराया देखकर वह
अनुमान लगा पा रहा था कि आग दोनों ओर बराबर थी। पर भाग्य से चूक हो गई थी।
सभ्यता व शिष्टता में कनु व दम्मी कहीं मेल नहीं खाती थीं। कनु हर लिहाज़
से ऊपर थी। कनु और निपुण ने अचानक ही एक ही समय एक दूसरे की ओर देखा
और एक दूसरे के दिल में दूर
तक उतरते चले गए। गिले शिकवे धोते व हालात के समक्ष घुटने टेकते से हुए।
मम्मी ने
उन सबको दो दिन बाद अपने घर खाने पर आने का निमंत्रण दिया। तब तक डैडी भी
दौरे से वापिस आ जाएँगे। कनु तो कल ही होस्टल वापिस चली जाएगी। अब पुन:
निपुण को वो कहाँ मिल पाएगी,
यह
सोचकर कनु परेशान हो उठी। कि तभी.....वैसे मिलकर करना भी क्या है अब। निपुण
तो अब पराया है....उसका नहीं है। अपने पागल मन को समझाती,
निपुण को फिर भी जी भर कर आँखों में समेटती वह मन कड़ा कर घर की ओर चल
पड़ी।
घर
पहुँचकर वह अपने कमरे में जा कर पलंग पर गिर पड़ी। खूब फफक फफक कर रोई।
अविरल आँसू बहाती धुँधली आँखों से वह छत निहारने लगी। चलचित्र की भाँति
वहाँ करीब दो वर्ष पूर्व की परछाईयाँ उभरने लगीं....वह दसवीं कक्षा का
आखिरी पेपर देकर घर आई,
तो
देखा पैकिंग हो रही है। बिशन अंकल के बेटे की शादी उनके पुश्तैनी गाँव में
हो रही है.... राजस्थान में कोटा के पास। वहीं जाना है। गर्मियों में
राजस्थान....सुनकर अटपटा सा लगा। पर नई जगह देखने की इच्छा सब पर हावी हो
गई। मम्मी व बच्चे जा रहे थे,
जबकि दादी व पापा पीछे घर पर रहेंगे।
दूसरे दिन
दोपहर को ट्रेन जैसे ही बिना प्लेटफॉर्म के स्टेशन पर रुकी,
गाँव का खुला उन्मुक्त वातावरण कनु को बहुत भाया। बिशन अंकल का बेटा डिंकी
अपने दोस्त निपुण के साथ खुली जीप में उन्हें लेने आया था। हाँ,
पहली नज़र में एक दूसरे को छुप छुप कर देखना स्टेशन से ही शुरु हो गया था।
मम्मी पाँच साल के साहिल को गोद में लिए सामने की सीट पर डिंकी के साथ
बैठीं। जबकि दस वर्ष की मनु लगी निपुण से बतियाने,
और
झट दोस्ती करली उससे। कनु को भी निपुण भा रहा था। असल में वो था ही कुछ
आकर्षक व्यक्तित्व वाला। निपुण मुँह से कम बोलता था। उसकी,
आँखें अधिक बातें करती थीं। वह कनु को घूरता रहा। कनु परेशान हो कभी इधर,
कभी उधर देखती। कच्ची सड़क पर हिचकोले लगने से ज्यूँ ही कनु सँभलने लगती,
तो
एकटक घूरती आँखों से कनु की नज़रें टकरा जातीं। उसके सारे बदन में एक सिहरन
सी दौड़ जाती। इससे पहले उसने ऐसा कभी महसूस नहीं किया था। कभी वो बालों की
झूलती लट को चेहरे पर से हटाती,
तो
कभी यूँ ही घबराकर दुपट्टा ठीक करने लग जाती। उसके भीतर कुछ हलचल मच गई थी।
अपलक तकना,
.....
ऐसे में
तो कोई भी घबरा जाए ना। सोलहवें वर्ष में पाँव रखा था कनु ने. ..क्या ऐसा
होता है इस उम्र में। छि: क्या सोचने लगी वह,
उसने अपने आप को समझाया।
गाँव का
बड़ा सा खुला घर। सीधे साधे लोग। आवभगत शुरु हो गई। कनु के दिलो दिमाग पर
तो निपुण छाया हुआ था। मनु की गहरी छनने लगी थी उससे। कुल आठ दिनों का
कार्यक्रम था। शादी की गहमा गहमी में कनु को हर पल यही लगता जैसे दो आँखें
उसे घूर रही हैं। वह ज्यूँ ही इधर इधर देखती तो सामने निपुण बैठा उसे ही
ताक रहा होता। मनु यानि कि मनीषा निपुण की उँगली पकड़े हर कहीं घूमती
दिखती। दोनों कुछ न कुछ बातें करते रहते। एकाध बार कनु ने मनु को डाँटा भी,
पर
मनु कहाँ मानी। कनु भी निपुण के विषय में कुछ पूछना चाहती थी उससे,
पर
हिम्मत नहीं जुटा पाई। तभी कनु को एक प्यारी सी गाँव की भोली भाली सखी मिली
’कृष्णा’।
वह तो पास आकर उसके बदन की सुगंध को भी सूँघती,
जो
उसे सबसे भिन्न लगती। कृष्णा तो साये की तरह कनु के आसपास मंडराने लगी।
उसीसे पता चला कि निपुण इंजीनियरिंग कर रहा है,
डिंकी का दोस्त है। वह भी उनकी तरह शादी पर गाँव आया है। रात को गाने बजाने
का दौर चला। कनु अपने स्कूल की बेहतरीन कलाकार थी। उसने भी ढोलकी की थाप पर
लोक गीत सुनाए। आवाज़ में लोच थी। सामने लड़कों की टोली बैठी थी। खूब
सीटियाँ व तालियाँ बजीं। कि तभी लड़कियों ने सिर पर दुपट्टा बाँधकर बोलियाँ
डालीं....
’मैनूँ
इक बराण्डी चढ़दी जाए’....अचानक
कनु व निपुण सब कुछ भूलकर एक दूसरे की आँखों में समाने लग गए। कितना गहरा
नशा छा रहा था उफ्फ़ दोनों पर.। अगली सुबह दोनों के जीवन में इन्द्रधनुषी
रंग भर कर लाई। अब तो पल भर को भी आँखों से ओझल होना उन दोनों को गंवारा न
था। कनु का मन उसके बस में नहीं था। वह तैयार भी होती तो चाहती,
निपुण उसे जी भर के देखे। आईने के सामने बैठती,
तो
स्वयं से ही शरमा जाती। इन तीन दिनों में ही कनु का चेहरा एक नई चमक से भर
उठा। पानी का गिलास माँग कर निपुण ने पूछ ही लिया.. कितने दिन ठहरने का
प्रोग्राम है। एक हफ़्ते का... बताया कनु ने।
बारात
मथुरा जानी थी। रेल की दो बोगी बुक थीं। निपुण दूल्हे के पास होगा या बोगी
के अन्दर.जानते हुए भी कनु हर पल निपुण
की राह तकने लगी। कृष्णा कनु की हालत देख देख कर मुस्कुरा रही थी।
उसके साथ रहने से वह सब कुछ समझ गई थी। खिसियाकर कनु खिड़की की ओर करवट
लेकर नींद को पलकों के घेरे में बंद करने का असफल प्रयास करने लगी। उस बोगी
में सब सो रहे थे। हल्की नीली रोशनी का प्रकाश था बस। तभ ख्यालों के भँवर
में डूबती उतराती उसने ज्योंही करवट ली,
कि
सामने ऊपर वाली बर्थ पर निपुण को लेटे हुए अपनी ओर टकटकी लगाए देखा। वो तो
मारे खुशी के अरे..रे..रे कहते हुए उठ बैठी। दोनों ही मुस्कुरा दिए। मानो
कोई छिपा हुआ खजाना मिल गया हो। एक दूसरे को आँखों ही आँखों में न जाने
क्या क्या अफ़साने सुनाते रहे। उन्हें पता ही नहीं चला कब प्रभात की पहली
किरण फूटी और चार बज गए। नींद का तो कहीं नामो निशान तक न था वहाँ। साढ़े
चार बजे गाड़ी मथुरा पहुँचती थी.. सो सभी उठ रहे थे। इन दोनों ने आँखें
मूँदकर झट सोने का बहाना किया। जो कुछ आँखों ने इस बीच पाया था,
मानो उसे अपने भीतर संजो रखने के लिए। कृष्णा ने उठकर कनु को झकझोरा,
’उठ
न। कनु..जल्दी कर।’
कनु आँखें मलती झूठ मूठ उठी। तभी ट्रेन रुकी। सब उतरने लगे। जैसे ही नीचे
उतरने व ऊपर चढ़ने की भीड़ उमड़ी...निपुण ने अचानक ही कनु को अपनी बाहों के
घेरे में कस लिया। कनु को भी सारी रात की बेचैनी का सिला मिल गया। काश,
पल
वहीं थम जाता।वे दोनों यूँ ही एक दूसरे से लिपटे रहते।
कनु और
निपुण इस नवीन अनुभव के अजीबो ग़रीब सुख से सिहर उठे। पहली बार का आलिगंन.
.. .... .उफ्फ़ यह कैसा नशा छा रहा था दोनों पर?
गर्मियों में भी ठंडी हुई जा रही थी कनु तो। उसे लगा उसकी धमनियों में रक्त
जमता जा रहा था। ख़्ामोशी का दामन ओढ़े गुमसुम सी वह कब सबके साथ बारात घर
पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला।
सब की
चुहलबाजियों में कनु हिस्सा नहीं ले पा रही थी। पर फिर भी आज वो खुश थी।
दोपहर को निपुण ने मम्मी के पास आकर बातें की। कनु आगे क्या पढ़ने का सोच
रही है। वह इंजीनियरिंग करके अपना काम देखेगा..वगैरह..वगैरह। रात को बारात
में कनु खूब नाची। वह खिली कली सी महक रही थी। उसकी खुशी उसके हर अंग से
टपक रही थी। निपुण उसके इर्द गिर्द ही मँडराता रहा। उसने कई बार उसे अपनी
बाँहों में सँभाला शादी की भीड़ भाड़ में दोनों खिलखिलाते रहे। सारी रात
फेरों के समय वे साथ साथ बैठे रहे। अंजाने भविष्य के सपने बुनते हुए। और
भोर होते ही विदाई का समय हो गया.। अब सब के बिछुड़ने की घड़ी करीब आ गई
थी। मनु ने निपुण भाई से उनका पता लिया। चिट्ठी लिखने के वादे हुए। कनु
इशारा समझ रही थी। बस यहीं...यहीं तो भाग्य ने करवट ले ली और कनु व निपुण
ने आख़िर उसके समक्ष
घुटने टेक दिए।
आँसुओं से
नम आँखें लिए कनु प्लेटफॉर्म पर खड़े हाथ हिलाते निपुण को देखती रही जैसे
कभी अर्जुन ने तीरन्दाज़ी के लिए मछली की आँख को देखा था। उसे आसपास और कुछ
भी दिखाई नहीं दे रहा था निपुण के सिवाय। फिर हाथ में पकड़े नॉवल में झूठ
मूठ को आँखें गड़ा दीं। मनु का बचपना एक बहाना बन गया,
एक
कहानी को शुरू होते ही खत्म करने के लिए। मनु ने निपुण के
पते वाला कागज़ न जाने कहाँ रख दिया था या फिर वो कहीं गिर गया था।
भोपाल पहुँचने पर निपुण की चिट्ठी आई,
लेकिन उसमें उसका पता नहीं था। कनिका उसे जवाब दे भी तो कहाँ....। दोबारा
उसकी चिट्ठी मनु के नाम से आई,
लेकिन पता फिर नदारद। तड़प कर रह गई कनु। इसी बीच नई एडमिशन्स चालू हो गई।
वह आगे पढ़ने होस्टल चली गई। वहाँ भी वह सारी सारी रात जागती,
पर
किसी से कुछ कह न पाती। डिंकी से पता माँगे भी तो कैसे। उससे तो कभी बात ही
नहीं की थी। वह लाज में डूबी रह गई। उन मीठी यादों की सुलगती भट्टी पर राख
झड़ी भी तो शोले ही शोले थे अब जलने के लिए। दिल के किसी कोने में जो एक
इंतज़ार था समय की ओट में....वह आज खत्म हो गया था। यादों के झरोखे से अतीत
में झाँकते हुए गालों पर आँसू अविरल बहे जा रहे थे। कनु झटके से उठी,
भरे मन से अपना सामान पैक करने लगी। उसे होस्टल जाना है,
आगे जीने के लिए। भाग्य ने हाथ की रेखाओं की जो करवट ली उसके समक्ष वह हार
गई थी। |
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