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ISSN 2292-9754

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02.02.2017


तुम मेरी कविता

जब मन का तालाब
दर्द की बारिश में सराबोर हो कर
रिसता रहता है आँसू बन कर,
हर बूँद में ढल कर
नमकीन अहसास लिए तुम आती हो।

और जब कंकर फेंक फेंक कर
बार बार पानी में शून्य बनाता हूँ
और उन शून्य के घेरों में
खोजता रहता हूँ अपनी छवि।
उस काँपती तस्वीर में उभर कर फिर
नया विश्वास लिए तुम आती हो।

या जब नदी के बाँध
लगातार समय के थपेड़ों से
लड़ लड़ कर, थक कर
जवाब देने लगते हैं;
उस उफान में उबल कर
या बवण्डर के मंथन में मथ कर
मिट्टी का आभास लिए तुम आती हो।

आती हो तुम उस चाँदनी रात को
जब चाँद का प्यार
बिखर रहा था अंतरिक्ष के पार,
और जब छोटे घने बादल
टूट पड़ते हैं उस चाँद पर
उस मासूम खरगोश पर जैसे
झपट पड़े थे गिद्धों के झुंड।

या जब कोई ख़्वाहिश की मौत पर
चुल्लू भर पानी में
ख़ुदकुशी को आतुर ज़िन्दगी
साहस के चप्पू तेज़ी से चलाती है
और एक किनारा बन कर
मसीहा की तरह तुम आती हो।

और जब विरह के समंदर के किनारे
यादों की लहरों से कबड्डी खेल कर
गीली रेत में सपनों का घर बना
इंतज़ार करता रहता है मन,
नये शृंगार लिए फिर तुम आती हो।

और तुम आती हो जब,
सजता सँवरता हूँ मैं ख़ूब:
भावों में नहा कर,
अलंकारों से शृंगार कर,
रेशम के छंद पहन,
समर्पन से तिलक करता हूँ,
तुम्हारा, तुम मेरी कविता।


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