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ISSN 2292-9754

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02.08.2017


तमाशबीन

गत वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष के विश्व पुस्तक मेले में, नये-नये स्टाल चमक-दमक के साथ सजे-सँवरे दिखलाई दे रहे थे। कुछ स्टाल्स पर महिला लाल रिबन में अपना परिचयपत्र गले में डाले हुए थीं, ताज़ी ब्यूटीपार्लर से आई हुई सी। स्टालों पर भीड़ भी ज़्यादा थी। किसी के लंबे बाल-खादी कुर्ता-पायजामा, किसी के चेन में झूलता चश्मा, किसी के काला चश्मा और फ्रेंचकट दाढ़ी, लेपटॉप बैग और सेल्फ़ी लेते लोग।अधिकतर स्टाल्स की यही हालत थी।

एक शोधार्थी को कुछ पुस्तकें लेनी थीं उन्हीं की तलाश में, बुक स्टाल पर गया। लेकिन वहाँ तो पुस्तकों का विमोचन चल रहा था। जाने माने सम्मान प्राप्त लेखक/कवि फोटो खिचवाने, ऑटोग्राफ़ देने में व्यस्त थे। कैटलॉग माँगा तो उसमें वह पुस्तकें नहीं थी, जिनकी शोधार्थी को ज़रूरत थी। कई स्टालों पर ख़ाक छान मारी लेकिन पुस्तक नहीं मिली। हाँ, सभी पर एक दूसरे प्रकाशन की पुस्तकें सजी थी- ग़ज़ल संग्रह, कविता संग्रह, व्यंग्य संग्रह, लघुकथा संग्रह, बाल गीत-कविता संग्रह, अभिनन्दन ग्रन्थ आदि-आदि। दो-तीन बुक स्टाल सूने पड़े थे, पूछने पर पता चला कि "मह्त्वपूर्ण किताबें जो आउट ऑफ़ प्रिंट हो गई हैं उनके खरीददार आयेंगे तो पाठकों की माँग पर नया संस्करण छाप देंगे, लेकिन उनके पाठकों का तो अकाल दिखाई पड़ रहा है…"।

शोधार्थी भीड़ वाले स्टाल की ओर आगे बढ़ा, पूछा, "..साये में धूप," …"मित्रो मरजानी",…"झूठा सच", "रागदरबारी", "आग का दरिया", मिलेगा…"।

प्रकाशक व्यंग्य कसते हुए बोला, "जिनकी रॉयल्टी देनी पड़े… बाबू आप उन पुस्तकों को माँग रहे हो… देख नहीं रहे हो… लेखकों/कवियों की भीड़ को …पैसा देकर अपनी किताब प्रकाशित कराते हैं… विमोचन कराते हैं …बुढ़ा गये लाइमलाइट साहित्यकारों के साथ फोटो खिचवाते हैं …उन्हीं के द्वारा सम्मानित होते हैं… हमें भी पैसे से ही मतलब है.. चाहे किताब में कुछ हो या न हो… प्रेमचंद्र, निराला, हरिशंकर परसाई, दुष्यंत कुमार बनने से तो रहे ये लोग….!"

शोधर्थी पुस्तक-मेले से बिना पुस्तक लिये लौटते हुए, गुनगुनाने में मस्त हो गया….

"दुकानदार तो मेले में लुट गये यारों!
तमाशबीन दुकानें लगाके बैठ गए…"।


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