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ISSN 2292-9754

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07.14.2016


वह

उनके घर हम बहुत बार गये,
हर बार उन्हें सहमे, सबकी अपेक्षाओं पर –
ख़रा उतरने की जद्दोजेहद करते देखा।
अपने मान-सम्मान को ताक़ पर रख,
उनके अहं, शान-ओ-शौकत, परम्पराओं के दर्प को,
सम्हालते देखा।
डर-डर कर तिल-तिल जीते मरते देखा,
भव्य जंगल में सहमी हिरनी सी थीं वह।

कल तो कल था, बीत गया,
बीते कल की छाया ने पीछा न छोड़ा,
अबकी बार उन्हें- अपने कहीं बेगाने न हो जायें,
की त्रासदी झेलते देखा।

ज़िंदगी के इस पड़ाव पर –
निश्चिन्तता से कोसों दूर, अपनों को ख़ुश रखने,
अपनेपन की चाह में मन ही मन घुटते हुए जीते देखा,
अपनों के ममत्व की आशा में,
स्वयं को तोला -माशा –रत्ती करते पाया।

समाज की मर्मस्पर्शी निगाहों से बचने की कोशिश में,
अपनों के बीच अकेलेपन का दर्द सहते देखा,
अबकी बार पिंजड़े में फड़फड़ाती सोन-चिरैया ही लगी वह।


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