अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.04.2014


प्रिय के प्रति

ये मिले तो लगा
अमावस की गहरी निशा को,
चाँदनी की किरण मिल गई,
इक आशा, नया विश्वास,
कुछ करने का हौसला मिला।
मेरी रुचियों को यूँ सँवारा,
मेरे लेखन को सजाया,
हर लिखी पंक्ति को सहेजा
हर उकेरे चित्र को सराहा,
पर....
उनके जाने के बाद,
मैं तो वही हूँ,
अब रुचियाँ कहीं खो सी गईं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें