अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.14.2015


आई बासंती बयार सखी

सखियो ऋतु बसंत की है आई
बादलों के नरम बिस्तर
कोहरे की रजाई से झाँक कर
सूरज ने ली अँगड़ाई
सखि बसंती बहार है आई...

गुनगुनी धूप पाकर
धरती देखो कैसे इठलाई
धरती देखो कैसे मुसकाई
हरा लहंगा पीली चूनर
सरसों ने धरती को उढ़ाई
देखो सखी बसंत की सुषमा छाई...

टेसू चटका, फूला पलाश,
अमलताश में कलियाँ आईं
गेंहू, जौ में बालियाँ लहर लहर लहराईं
कनक कनक की सवर्णिम आभा
वसुंधरा का शृगांर बनी
दुल्हिन अवनी को देख देख,
पंचम सवर में गाया गान
होरी, चैती लगे गुदगुदाने
फागुन के गीत भी हवा में लहराये,
सखि बसंत का ऐसा जादू चला कि-
बयार भी फाग खेलने लगी
सखि ऋतु बसंत की आई...

फागुनी गुनगुनी धूप में
मधुमास ने मौसम संग रास रचाया
कैसे देखो अंग अंग अलसाया.
सखि बसंत की खुमारी में
बिरहन को पी की याद आई
तन मन में बसंत ने अगन लगाई
देखो सखि बसंत कैसे कैसे तरसाने आया...

बसंत ने कैसे कैसे चित्र बनाये
निराली छटा बसंत की सखी छाई!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें