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ISSN 2292-9754

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06.04.2016


शहर है भीड़ है बस

शहर है भीड़ है बस एक आदमी ही नहीं
वादे है ख़्वाब है नीचे कोई ज़मीं ही नहीं॥

मुझे था हौसला अँधेरे को चीर डालूँगा
हाथ सूरज है मगर इसमें तो रौशनी ही नहीं॥

रोज़ बद्शक़ल होती जा रही है दुनियाँ अब
फिर भी सुनता हूँ की कोई कहीं कमी ही नहीं॥

फ़ासले बढ़ रहे हैं अब तो अमन के बाग़ों से
सुकूँ मिलेगा कहाँ जब कि रात-रानी ही नहीं॥

निगलती जा रही कुर्सी समूचे जंगल को
कौन सहेजे इन्हें जब आँख सभी पानी ही नहीं॥

अब तो लालच ने नपुंसको की भीड़ रच डाली
वतन पर मिटने वाली वो जोशों भरी जवानी ही नहीं॥


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