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ISSN 2292-9754

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06.01.2016


बुरे दिन हों तो

बुरे दिन हों तो अपनों से भी रिश्ता छूट जाता है
कि जैसे डाल से पतझर में पत्ता टूट जाता है

जब आँसू देखता है माँ की आँखों में कोई बच्चा
तो उसके हाथ से गिरकर खिलौना टूट जाता है

जो अपने बंद कमरे में बुना करती है शहज़ादी
सहर होने से पहले ही वो सपना टूट जाता है

कोई आसां नहीं है दिल से दिल को जोड़ कर रखना
जरा सी बदगुमानी से ये धागा टूट जाता है

अगर चेहरे को पढ़ना सीख ले कोई तो फिर देखे
ज़रा से दुःख में भी इन्सान कितना टूट जाता है


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