तुम डॉ० यू० एस० आनन्द
दूर पलाश के फूलों के बीच सूरज की एक किरण फूटी, लगा- अलसाई हुई सी तुम जागीं। झरनों की कल-कल और चिड़ियों की ‘चिक -चिक सुन लगा- तुमने कोई मधुर गीत गाया। धीरे-धीरे जो चली पुरवाई पेड़ों के पत्ते यूँ सरसराए लगा- तुमने शरमा के मुखड़ा छिपाया।