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| 01.16.2009 |
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लाली
चिड़िया और मुनमुन |
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आम के एक
पेड़ में लाली चिड़िया रहती थी। वह बड़ी दयालु और परिश्रमी थी। दिन-रात वह
अपने काम में मगन रहती थी। उसका एक छोटा-सा प्यार-सा बच्चा था। उसने उसका
प्यारा-सा नाम रखा था- मुनमुन।
मुनमुन
अभी बहुत छोटा था। उसके पंख भी छोटे-छोटे थे,
इसलिए वह उड़ नहीं पाता था। सिर्फ इधर-उधर फुदक कर अपना मन बहलाया करता था।
वह साफ-साफ बोल भी नहीं पाता था,
केवल
’चींचीं‘
कर
अपनी माँ से बातें किया करता था।
लाली
चिड़िया मुनमुन को बहुत प्यार करती थी। वह उसके लिए दूर-दूर से दाने चुग कर
लाती थी।
रोज़ सुबह
होते ही लाली चिड़िया दाने की खोज में निकल पड़ती थी और शाम होने के पहले ही
घोंसले में वापस लौट आती थी। चिड़िया को आया देखकर मुनमुन
’’चींचीं‘
कर
अपनी खुशी प्रकट किया करता था। धीरे-धीरे मुनमुन बड़ा होने लगा। उसके पंख भी
धीरे-धीरे बड़े होने लगे। अब वह इधर-उधर उड़ सकता था। कुछ ही दिनों बाद
साफ-साफ बोलने भी लगा। अब वह बड़े मजे से बातें किया करता था।
एक दिन जब
लाली चिड़िया दाने की खोज में बाहर जाने को निकली ही थी कि आसमान में
काले-काले बादलों को देख कर ठिठक गयी।
उसने
मुनमुन को बुलाकर समझाते हुए कहा,
“मुनमुन
बेटे मेरे घर आने तक तुम घर पर ही रहना,
इधर-उधर कहीं मत जाना। आज तूफान के लक्षण नज़र आ रहे हैं। मैं जल्दी ही लौट
आऊँगी।”
’’ठीक
है माँ,
मैं घर में ही रहूँगा”,
मुनमुन ने
सिर हिलाते हुए माँ से कहा।
दूसरे ही
क्षण लाली चिड़िया फुर्र से उड़ कर चली गई। माँ के जाने के बाद मुनमुन बड़ी
देर तक इधर-उधर घोंसले में चक्कर काटता रहा,
फिर वह घोंसले से बाहर निकल आया और एक डाली पर बैठ कर आसमान में उठते
काले-काले बादलों को देखने लगा। बादलों का उठना उसे बड़ा भला लग रहा था।
उसने सोचा,
क्यों न थोड़ी दूर तक घूम आया जाय,
माँ को थोड़े ही पता चलेगा। माँ के आने से पहले ही वह घर लौट आएगा।
फिर क्या
था,
उसने हवा में अपने पंख फैलाए और फुर्र से उड़कर नज़दीक के एक पेड़ पर जा
बैठा।
अब हवा भी
थोड़ी तेज़ चलने लगी थी। मुनमुन गुनगुनाता हुआ एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर
फुर्र-फुर्र कर उड़ता हुआ आगे की ओर बढ़ा जा रहा था। आज उसे उड़ने में काफी
आनन्द आ रहा था। वह एक पेड़ से होकर दूसरे पेड़ होता जंगल से बाहर निकल
आया।
तभी एकाएक
’सों
सों‘
करती हुई हवा तेज़ हो गई और आसमान बादलों से पूरी तरह ढँक गया। अचानक हुए
इस परिवर्तन से मुनमुन काफी घबरा उठा। वह पीछे मुड कर तेज़ी से घर की ओर
भागने लगा। किन्तु चारों ओर अन्धेरा छा जाने के कारण उसे रास्ता साफ नहीं
सूझ रहा था। साथ ही तेज़ी से उड़ने के कारण वह थक भी चला था। उसने सोचा,
अगर माँ की बात मान कर वह घर से बाहर नहीं निकलता तो कितना अच्छा होता। इस
आकस्मिक विपत्ति में तो नहीं फँसता। उसका मन रुआँसा हो गया। वह ज़ोर-ज़ोर से
माँ को पुकारने लगा-
’’माँ......
माँ.......।”
तभी एक ओर
से पंख फड़फड़ाती हुई लाली चिड़िया आ पहुँची। वह घोंसले में मुनमुन को न पाकर
उसे खोजने निकली थी। मुनमुन की आवाज़ पहचानकर वह उसके नज़दीक गई और उसके बाँह
पकड़ कर तेजी से घोंसले की ओर लौट पड़ी। किसी तरह गिरती पड़ती वह मुनमुन को
लिए घोंसले में पहुँच गई। दूसरे क्षण आँधी और भी तेज़ हो गई।
घोंसले
में पहुँच कर मुनमुन ने रोते हुए माँ से कहा,
“मुझे
माफ कर दो माँ। तुम्हारे मना करने पर भी मैं घर से बाहर निकल गया था। आज
अगर तुम समय पर नहीं पहुँचती तो पता नहीं तूफान में मेरी क्या दुर्गर्त
होती।”
उस दिन के
बाद मुनमुन फिर कभी-भी अपनी माँ की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। |
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