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01.28.2009
 

दोहे आनन्द के
डॉ० यू० एस० आनन्द


बदल गया अब आदमी, बदले उसके काम।
दिन में सौ-सौ बार वह, बदले अपना नाम ।।

बची नह सद्भा-वना, बचा नहीं अब प्यार ।
नैतिकता कुंठित हुई, मानवता बीमार ।।

आज चतुर्दिक हो रही, मानवता की हार ।
दानवता की जय कहे, गाँव, शहर, अखबार ।।

युग ऐसा अब आ गया, बिगड़ गया माहौल ।
सड़कों पर जन घूमते, हाथ लिए पिस्तौल ।।

दानवता के सामने, मानवता लाचार ।
कैसी है यह बेबसी, कैसा यह व्यापार ।।

बड़बोलों की भीड़ में, खड़ा संत चुपचाप ।
सहमत है हर बात पर, कह कर माई-बाप ।।

चलना दूभर हो गया, सड़कों पर है आज ।
मनमानी होने लगी, आया जंगल-राज ।।

दहशत कुछ ऐसी बढ़ी, घटे हास परिहास ।
अर्थहीन-सी जिन्दगी, आए कुछ ना रास ।।

भ्रष्टाचारी घूमते, यहाँ-वहाँ निःशंक ।
सज्जन दुबके फिर रहे, ऐसा है आतंक ।।

वनफूलों की आजकल,फीकी पड़ी सुगन्ध ।
साँसों में घुलने लगी, अब बारूदी गंध ।।


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