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| 01.28.2009 |
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दोहे आनन्द के |
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बदल गया अब आदमी, बदले उसके काम। बची नह सद्भा-वना, बचा नहीं अब प्यार । आज चतुर्दिक हो रही, मानवता की हार । युग ऐसा अब आ गया, बिगड़ गया माहौल । दानवता के सामने, मानवता लाचार । बड़बोलों की भीड़ में, खड़ा संत चुपचाप । चलना दूभर हो गया, सड़कों पर है आज । दहशत कुछ ऐसी बढ़ी, घटे हास परिहास । भ्रष्टाचारी घूमते, यहाँ-वहाँ निःशंक । वनफूलों की आजकल,फीकी पड़ी सुगन्ध । |
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