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| 01.16.2009 |
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ब्रेक |
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पिता को
पत्र लिखे पंद्रह से भी अधिक दिन हो गए थे,
किंतु अब तक उनका मनीऑर्डर नहीं आने से राजन पिता की इस सुस्ती पर मन-ही-मन
कुढ़ रहा था। “हुँह,
कहते थे,
बेटे तुम तनिक भी चिंता मत करना। चाहे जैसे भी हो,
मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा अवश्य ज़मीन-जायदाद बेचकर भी तुम्हारी पढ़ाई के लिए खर्च
जुटाऊँगा। और हालत यह है कि,
जेब खर्च के लिए भी पैसे भेजने में सिरदर्द कर रहे हैं।”
अन्यमनस्क-भाव से कमरे में ताला लगाकर जैसे ही वह मुड़ा सामने पोस्टमैन को
देख उसकी बाँछें खिल गई। उसने झटपट मनीऑर्डर के रुपये लिये और प्रसन्नता से
सीटी बजाता हुआ सड़क पर निकल आया।
मन-ही-मन
उसने कार्यक्रम भी तय कर लिये। सबसे पहले तो
‘अनामिका‘
में भोजन करेगा। फिर शाम को दोस्तों के साथ रीजेन्ट चलेगा। संयोग से आज ही
अमिताभ की फिल्म लगी है। ब्लैक में टिकट लेकर ही सही,
लेकिन फिल्म वह आज ही देखेगा।
अचानक
फुटपाथ पर एक कृशकाय मानव-आकृति को देखकर वह ठिठक गया। उसका पूरा शरीर
हड्डियों का ढाँचा नजर आ रहा था। फुटपाथ पर बैठा वह बड़े जतन से ऊँगलियों पर
हिसाब करता हुआ पैसे गिनने में व्यस्त था। किंतु राजन के पैरों के आहट
मिलते ही वह सचेत हो गया और टकटकी लगाकर उसे ही देखने लगा। उससे आँखें
मिलते ही राजन सिहर उठा। उसके पूरे शरीर में झुरझुरी-सी फैल गई।
उस दुर्बल
आकृति से नजर फेरकर झटके से वह आगे बढ़ ही जाना चाहता था कि तभी उस व्यक्ति
ने क्षीण स्वर में उसे आवाज़ लगायी-
“बाबूजी.....
बाबूजी.....।”
राजन
प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए पूछ बैठा-
“क्या
है ?‘‘ “बाबूजी,’उसने
दीनता से अपने मैले चिकट अंगोछे से मुड़ा-तुड़ा मनीऑर्डर फॉर्म निकाला और
उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- “बाबूजी,
मेरा बेटा श्रीरामपुर में पढ़ता है,
पिछले दिनों उसका पत्र आया है..... उसे पैसे की आवश्यकता है.... ये पैसे
मैंने उसे भेजने के लिये जुगाड़ किये हैं.... जरा इस फारम को.....।” आगे के शब्द को वह साफ-साफ नहीं सुन पाया। उसकी आँखों के आगे अपने बूढ़े पिता का निश्तेज चेहरा टंग गया था। |
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