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ISSN 2292-9754

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06.04.2016


हर मरहले का सामने नक़्शा अगर होता

हर मरहले का सामने नक़्शा अगर होता।
इस ज़िन्दगी का बेमज़ा सारा सफ़र होता॥

रुख़ से हटा देता अगर चिलमन अचानक तू।
तो एक दीवाना पतंगा आग पर होता॥

मेरी तरफ़ तू देख तो लेता नज़र भर के।
तेरी क़सम फिर क्या नहीं तेरी नज़र होता॥

ये बाख़बर होने की तुझको क्यों शिकायत है।
क्यों चाहता है तू ज़माना बेख़बर होता॥

तू रंग पल-पल यूँ बदलता है कि क्या बोलूँ।
ज़ालिम कभी क़ायम नहीं इक बात पर होता॥

तुझसे मिला जब भी, मिला है दर्द ही तुझसे।
तुझसे नहीं मिलना, नहीं क्या बेहतर होता॥

ये बात है कोई कि आते ही चलूँ बोला।
गर साथ होता 'सिद्ध' तो फिर उम्र भर होता॥


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