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ISSN 2292-9754

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06.01.2016


फ़साद से

फ़साद से फ़सादों का निकलना देखा,
बंदूक को बच्चे का मचलना देखा।

टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन है शायद ,
चाँद का रह-रह के पिघलना देखा।

देखा शैतान ने अपना जो नशेमन ,
उसकी आँखों से आग निकलना देखा।

बैठा कि बैठता चला गया दिल मेरा,
जो उसकी चाल, उसका चलना देखा।

हाल कुछ ऐसा था तमाम बस्ती का,
आँख मल-मल के हाथ मलना देखा।

टूट पड़ता है जो हरे दरख़्तों पर ,
हमने उसका ही फूलना-फलना देखा।

एक ही वक़्त एक ही सूरज था लेकिन,
कहीं निकलना और कहीं ढलना देखा।

दिन में इन्सान बना फिरता इक अजगर,
स्याह रातों ने उसका निगलना देखा।

अभी कुछ और था अभी कुछ और है वो,
रंग हैरत से उसका बदलना देखा।

हाल चोटों का पूछा न गया ज़ालिम से,
हँसे जाता है,अपना जो फिसलना देखा।

कैसा अपना है,कैसा अपनापन 'सिद्ध',
अपनी मुस्कान पे उसका जलना देखा।


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