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ISSN 2292-9754

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06.01.2016


भरोसा न कीजे

नफ़रत की बातें वो घर-घर करेगा,
उलफ़त हमारी वो जर्जर करेगा।

इधर की उधर हो गई उसकी यारी,
किसी रोज़ हमला वो हम पर करेगा।

ये आदत पुरानी नहीं छूटने की,
दगाबाज़ी यारो वो फिर-फिर करेगा।

इन्सान उसको तनिक न सुहाते,
अपना हमेशा वो पत्थर करेगा।

मतलब रहेगा तो बोलेगा मीठा,
फिर अपने तीखे वो तेवर करेगा।

मिले उसको मौक़ा अगर लूटने का,
देरी न यारो वो पल भर करेगा।

उसे उसकी दे-दे अगर कोई क़ीमत,
भीतर की बातें वो बाहर करेगा।

उसके गुनाहों पे डाली नज़र गर,
आर-पार तेरे वो ख़ंजर करेगा।

अरे 'सिद्ध' उसका भरोसा न कीजे,
यारी वो मतलब की ख़ातिर करेगा।


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