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ISSN 2292-9754

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06.23.2014


मर्द अभी ज़िन्दा है

कल शुक्रवार है...

उसे नींद नहीं आ रही है। बार बार करवटें बदलता है... परेशान है। उसे कल मैटिनी शो में एक फ़िल्म देखनी है – दबंग-2...। उसे एक दुःस्वप्‍न का सा अहसास हो रहा है। कल के तीन घण्टे बेकार हो जाएँगे... भला ऐसी फ़िल्मों की समीक्षा करने का औचित्य क्या है?

उसकी छठी इंद्रिय उसे बता रही है कि यह फ़िल्म भी सौ करोड़ से अधिक का बिज़नेस करने वाली है। पहली दबंग तो सुपर हिट फ़िल्म थी ही... मुन्नी बदनाम हो गई थी...बाद में अन्य बड़े सितारों की फ़िल्में उनका इंस्पेक्टर रूप ले कर बनाई गईं और सबकी सब सुपर-हिट हो गईं। भला यह क्यों पीछे रहेगी? उसकी समस्या दूसरी है... उसे यह फ़िल्म न केवल देखनी है बल्कि उसकी समीक्षा भी करनी है। …वह एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में फ़िल्मों की समीक्षा लिखता है।

उसके मित्र हमेशा उससे ईर्ष्या करते हैं। आलोक तो कह भी देता है, ‘गुरू, तुम्हारे मज़े हैं। हर फ़िल्म पहला दिन और पहला शो देखने को मिलता है। हम साले ब्लैक में टिकट लेने के लिए झक मारते फिरते हैं, और तुम हो कि सप्ताह में दो दो फ़िल्में देखते हो और उस पर तुर्रा यह कि जब चाहो जिसकी चाहो पैण्ट उतार दो। मियां ऐश है तुम्हारी।‘

वह आज तक अपनी बात अपने मित्रों को समझा नहीं पाया। भला मित्रों को यह बात समझ में आती भी तो कैसे कि जब वह फ़िल्म देखता है तो वह अपना मनोरंजन नहीं कर रहा होता। उसके लिये फ़िल्म देखना भी एक काम है... जैसे कि रेल का इंजिन चलाना या फिर वकालत करना। जब कोई भी व्यवसाय रोज़ी रोटी का धन्धा बन जाता है तो उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है।

वह चाहता है कि केवल बेहतरीन फ़िल्में ही देखे। मगर उसके बॉस की सोच एकदम साफ़ है, - बंधुवर, फ़िल्म समीक्षक को ना काहू से दोस्ती और ना काहू से बैर वाली नीति अपनानी होती है। उसे पूर्वाग्रहों से बचना होता है। बिना फ़िल्म देखे आप कैसे तय कर लेंगे कि कौन सी फ़िल्म अच्छी है और कौन सी बुरी।

वह अपने बॉस की बात समझता है। मगर वही बॉस जब कहता है, ‘सुनिये मालिक, आज जो फ़िल्म देखने जा रहे हैं, उसकी हीरोइन मेरी ख़ास दोस्त है। ज़रा दो लाइनें उसकी भूमिका के बारे में ज़रूर लिख दीजिएगा। वह हैरान भी होता है और परेशान भी।‘

फ़िल्मों को लेकर उसकी सोच बहुत साफ़ है। उसे वे फ़िल्में अच्छी लगती हैं जिनमें मज़बूत कहानी, अच्छी पटकथा और संवाद, बढ़िया अभिनय और संवेदनशील प्रस्तुति हो। उसकी समीक्षा में पहला सवाल यही होता है कि आख़िर यह फ़िल्म बनाई क्यों गई।

उसने अपने एक लेख में अपने पसन्दीदा फ़िल्मों एवं फ़िल्मकारों का ज़िक्र किया था, - ब्लैक एण्ड व्हाइट फ़िल्मों के राजकपूर, गुरूदत्त, बिमल रॉय, महबूब ख़ान, बी. आर. चोपड़ा, हृषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी वगैरह उसके प्रिय फ़िल्म निर्माता थे।

वैसे उसकी पसन्दीदा फ़िल्मों में मुग़ले आज़म भी शामिल है। उसे सहज अदाकारी अधिक प्रभावित करती है। अभिनय में नाटकीयता का वह क़ायल नहीं है। हाल ही में उसने आमिर ख़ान के अभिनय की अपनी समीक्षाओं में बहुत प्रशंसा की है। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है फ़िल्म का उद्देश्य।
उसे न तो मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा-नुमा फ़िल्में पसन्द आती हैं और न ही तथाकथित आर्ट फ़िल्में। उसका तर्क एक ही होता है कि सिनेमा एक पब्लिक मीडिया है। यदि हम श्रोताओं तक नहीं पहुँच सकते तो हमें पैसे जलाने का कोई हक़ नहीं। 27 डाउन, उसकी रोटी जैसी फ़िल्मों की वह जम कर खिंचाई करता। हमेशा से ही उसका प्रिय वाक्य रहा है - राजकपूर जब चाहे सत्यजीत राय जैसी फ़िल्म बना सकता है... उसमें बूट पॉलिश और जागते रहो जैसी फ़िल्में बनाने की कूवत है। मगर सत्यजीत राय तीन जन्म लेकर भी संगम जैसी फ़िल्म नहीं बना सकता। उसे मुख्यधारा का सिनेमा अच्छा लगता है और वह जम कर उस पर लिखता भी है। किन्तु मुख्यधारा का भी वही सिनेमा उसे भाता है जिसे समझदारी से बनाया गया हो।

उसका चेहरा देख कर पत्नी को भी पता चल गया था कि कल देखी जाने वाली फ़िल्म राज के मन-मुताबिक नहीं है। आमतौर पर उसकी पीने की आदत से परेशान पत्नी ने स्वयं ही अण्डे उबलने के लिये चढ़ा दिये और सोडे की दो बोतलें फ़्रिज में ठण्डी होने के लिये रख दीं। सलाद की प्लेट सजाने लगी है। उसका पति व्हिस्की के अलावा कोई और मादक पेय नहीं लेता। और व्हिस्की भी केवल रॉयल चैलेंज.... बहुत प्यार से बस एक ही वाक्य बोलता है, “आर.टी. गैट मी सम आर.सी.” और आरती नक़ली ग़ुस्सा नाक पर बिठा कर आर.सी. का पैग बनाने लगती।

राज का दोस्त रूबीन भी आर.सी. का ही शौक़ीन है। मज़ेदार बात यह है कि काम भी वही करता है जो कि राज, मगर दोनों में बहुत अन्तर है। रूबीन एक अंग्रेज़ी समाचार पत्र के लिए फ़िल्म समीक्षक है तो राज वही काम हिन्दी में करता है। मगर क्या यह बस थोड़ा सा ही अन्तर है... दरअसल यही तो उनके पूरे व्यक्तित्व, पूरी सोच और सपूर्ण जीवन की परिभाषा थी। रूबीन अपनी पत्नी, और दो बच्चों को अपनी मारुति स्विफ़्ट कार में शान से बिठाता था तो राज अपनी पुरानी आल्टो की तरह चिड़चिड़ा सा रहता था।

रूबीन का रुतबा था, शान थी और उसकी लिखी समीक्षाओं की बड़े पैमाने पर चर्चा भी होती। एन.डी.टी.वी., टाइम्स चैनल, ए.बी.एन. सभी फ़िल्मों पर बातचीत करने के लिये उसे ही आमंत्रित करते। उसमें एक अलग सी अदा भी थी। मगर रूबीन स्वयं राज की फ़िल्मी जानकारी और समझ का कायल था। दोनों अधिकतर शाम साथ ही बिताते – या तो किसी पार्टी में वर्ना घर पर इकट्ठे आर.सी. के जाम के साथ। मज़ेदार बात यह कि बाहर पार्टी में स्कॉच पीने वाले ये फ़िल्मी पत्रकार एक दूसरे के घर में ज़मीन पर गद्दे लगा कर बेतक्कलुफ़ी से आर.सी. के साथ न्याय करते।

कई बार रूबीन राज से पंगे भी लेता रहता, “यार जो बात साहिर, और शकील में है, वह किसी और फ़िल्मी शायर में नहीं।”

“देखो रूबीन, फ़िल्मों में शायरी के लिये कोई स्थान नहीं है। फ़िल्मों को चाहिये लिरिक्स यानी कि गीत। और शैलेन्द्र से बड़ा गीतकार आज तक न तो कभी हुआ है और न ही होगा।”

“अरे छोड़ो यार, शैलेन्द्र को सुनकर लगता है कि बस पूरी ज़िन्दगी एक फ़लसफ़ा है। शकील में रोमान्स है और साहिर की गहराई का तो मुक़ाबला ही नहीं है।”

“अरे शैलेन्द्र जैसा रोमान्टिक तो कोई हो ही नहीं सकता, राजहठ फ़िल्म का गीत कभी सुना है?...”

“यार देखो अब तुम गाने मत लगना।...” और साथ ही शुरू भी हो गया, “एक यूँ ही सी नज़र दिल को जो छू लेती है, कितने अरमान जगाती है तुम्हें क्या मालूम...”

“यार रूबीन, इतना बेसुरा मत गाओ कि साहिर की आत्मा ही आत्म-हत्या कर ले। मैं शैलेन्द्र के गीत गाता हूँ मगर कम से कम सुर में तो रहता हूँ।... तुम जब कहते हो कि अरमान जगाती हैं... लगता है कि कह रहे हो कि माँ जगाती हैं.... ”

हँसी उछल कर पूर कमरे को भर देती है। एक मज़ेदार बात यह है कि राज और रूबीन रोज़ शराब पीते हैं मगर दोनों को कभी किसी ने नशे की हालत में नहीं देखा। रूबीन पीने के बाद मज़ेदार चुटकुले सुनाता है तो राज एकदम चुप हो जाता है। कभी कभी तो जैसे ही दोनों में से एक को कोई नया चुटकुला सुनने को मिलता है तो एक पल की भी प्रतीक्षा नहीं कर पाते। बस जल्दी से दूसरे को फ़ोन करते हैं और जब तक चुटकुला सुना नहीं लेते... चैन की साँस नहीं लेते।

“राज, राऊडी राठौर पर तुम्हारी समीक्षा की ख़ासी चर्चा हो रही है। भला तुमने फ़िल्म को निकृष्ट क्यों लिखा?.. ऐसे भला कोई किसी फ़िल्म को माइनस रेटिंग देता है कभी?”

“अबे यार यह भी साली कोई फ़िल्म थी। अब देखो, दबंग जैसी वाहियात फ़िल्म चल गई तो अजय के अन्‍दर कीड़ा कुलबुलाया और सिंघम बनवा ली, फिर भला अक्षय क्यों पीछे रह जाता उसने सोचा होगा भाई मैं गंगा में हाथ धोने से क्यों पीछे रह जाऊँ। इतना भी कोई नहीं सोचता कि श्रोताओं की बेहूदगी सहने की भी कोई सीमा होगी। उधर वो सिंह इज़ किंग क्या चल निकली कि अक्षय को लगता है कि वो कैसी भी बेहूदा फ़िल्म में काम कर ले फ़िल्म तो चल ही जाएगी।... मैंने तो सुना है कि आमिर ख़ान भी पुलिसवाला बन कर एक फ़िल्म में आ रहा है... शायद तलाश ! अब पता नहीं उसे किस बात की तलाश है.... ”

“देखो राज, एक बात याद रखो। फ़िल्मों को बेकार कहने के बहुत से तरीके होते हैं। जैसे कि साहित्य में। तुम्हें किसी की कहानी की भाषा बहुत साधारण लगी तो यूँ भी कह सकते हो कि ‘इन कहानियों की भाषा बहुत साधारण है।’ और यह भी कह सकते हो कि ‘फ़लां फ़लां लेखक को अपनी कहानियों के लिये किसी विशेष भाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती। साधारण शब्दों से ही अपनी बात पहुँचा देते हैं।’ मेरे भाई, सिनेमा भी तो साहित्य का एक्सटेंशन ही है न।”

“अपनी अपनी सोच होती है रूबीन। मुझे लगता है कि हमारे प्रोफ़ेशन में साफ़गोई की बहुत ज़रूरत है। हमारा काम है जनता को सही दिशा दिखाना। अच्छे और बुरे सिनेमा का अन्तर समझाना।”

“गुरू, तुम अपने काम को इतना सीरियसली मत लो मेरे यार।... नौकरी है तुम्हारी। फिर तुम्हारा परिवार है, बीवी बच्चे हैं। हर वक़्त तनाव में रहोगे तो ब्लड प्रेशर बढ़ा लोगे... अरे जब लोगों को प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की फ़िल्में पसन्द हैं तो तुम क्यों उन्हें सत्यजीत राय या श्याम बेनेगल परोसने के चक्कर में हो।”

“मैं ऐसा नहीं करता रूबीन। मुझे ख़ुद वो सिनेमा अच्छा नहीं लगता जिसे देखने के बाद किसी पाठ्य पुस्‍तक को पढ़ कर उसकी व्याख्या करनी पड़े। मुझे भी वही सिनेमा पसन्द है जो कम्यूनिकेट करता हो। मैं आर्ट फ़ॉर आर्ट्स सेक को नहीं मानता। मगर कुछ तो स्तर होना ही चाहिये ना...!”

कहने को तो राज कह जाता है मगर फिर अभय की तरफ़ देखता है। अभय भी तो उसी की तरह हिन्दी में फ़िल्मों की समीक्षा करता है। मगर उसे टीवी चैनल वाले भी बातचीत के लिये बुलाते हैं। बस उसने बेतरतीब से बाल रखे हैं, सफ़ेद दाढ़ी बढ़ा रखी है। एक इंटेलेक्चुअल सा लुक बना रखा है। गैंग्स ऑफ़ वसेपुर जैसी फ़िल्म बनाने वालों के साथ मंच साझा कर लेता है और अक्षय कुमार का इंटरव्यू भी उसी आसानी से कर लेता है। फिर उसने देखा है कि अभय किसी की आलोचना नहीं करता।... कैसे कर पाता है यह सब। क्या उसके भीतर का सच्चा कलाकार कहीं दम तोड़ चुका है?... कैसे चवन्नी छाप फ़िल्मों के बारे में भी आसानी से तारीफ़ें लिख देता है। उसकी समीक्षाएँ आलोचना नहीं होतीं... केवल सूचनाएँ होती हैं।

वैसे राज कभी कभी सोचता है कि क्यों उसका बॉस उसे कभी किसी बड़े स्टार का इंटरव्यू करने के लिये नहीं कहता। जानना तो चाहता है कि क्यों हर ऐसा कार्य गीता के पल्ले पड़ जाता है। पहले पहले सोचता था कि गीता लड़की है शायद अख़बार की इमेज बनती होगी... मगर पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता... वैसे तो कड़वा आदमी बहुत हिम्मती होता है... पंजाबी बन्दा है; शायद सोचता ‘सान्नूं की जी... असी की लैणा है... करण दयो ऐश।’

उसकी दशा भी कभी कभी ठेठ हिन्दी के साहित्यिक लेखक जैसी हो जाती है। वह चाहता है कि उसे बड़े बड़े स्टार पहचानें मगर इसके लिये कोई मेहनत करने को तैयार नहीं। कुछ दोगला सा भी हो जाता है। मानना नहीं चाहता कि उसे बड़े स्टारों से मिलने की चाह है। उसका पुत्र और पुत्री उससे कह भी चुके हैं कि उन्हें शाहरुख़ ख़ान से मिलना है। ‘पापा आप भी तो फ़िल्मों में काम करते हैं। मिलवाइये न कभी।... स्टारडस्ट में आपकी फ़ोटो भी छपी थी शाहरुख़ के साथ। फिर आप मिलवाते क्यों नहीं?’

पत्नी अपने पति की मनोदशा से वाक़िफ़ है। कभी व्यंग्य नहीं करती। बस स्थिति को समझ लेती है। उससे जब कभी कोई पूछता है कि पति क्या करते हैं, तो शालीनता से कह देती है कि पत्रकार हैं।

शुरू शुरू में तो वह भी बहुत उत्साहित हो कर पूछ लेती थी, “क्यों जी प्रीमियर देखने के पास हमें नहीं मिल सकते क्या? अभय और उसकी पत्नी तो हर फ़िल्म का प्रीमियर देखते हैं।... फिर आपको पास क्यों नहीं मिलता... ”

मगर पति को जैसे जैसे जानती गई, ऐसे प्रश्न पृष्ठभूमि में जाते गये। बैंक में नौकरी करती है पत्नी, बस उसी में ख़ुश है। राज न तो उसके बैंक के बारे में कोई बातचीत करता है और न ही अपने दुःख उससे बाँटता है। यह सच है कि एक कुंठा उसके भीतर घर करती जा रही है।

पत्नी ने कई बार सलाह भी दी है कि अपना डिपार्टमेण्ट बदलवा लें। मगर राज का एक ही जवाब होता है... हार कर शेर घास नहीं खाने लगता... मैं जानता हूँ कि मैं सच्चा हूँ... अपना संघर्ष जारी रखूँगा... अग र इस जंगल में अकेला हूँ तो भी घबराऊँगा नहीं...

मैं जब गाँव से इस शहर में आया था तो बस एक सूटकेस था और एक हज़ार रुपये... आज इस शहर में एक छोटा सा घर अपना है... पत्नी है, पुत्र है, पुत्री है... कार छोटी ही सही काम तो चला रही है... मुझे क्या फ़र्क पड़ता है कि अभय और रूबीन किस तरह बड़े फ़िल्म समीक्षक बने हैं। मैं सच लिखना बन्द नहीं करूँगा। दुनियां को मानना पड़ेगा कि ऐसी घटिया फ़िल्में घटिया ही कहलाएँगी चाहे दो सौ करोड़ से ऊपर का बिज़नेस कर लें। इस हिजड़ों की जमात में एक मर्द अभी बाक़ी है... मैं डरूँगा नहीं... मुझे नहीं चाहिये बड़े सितारों की पार्टियों का निमन्त्रण पत्र... मैं वही लिखूँगा जो महसूस करता हूँ...

राज ने गहरी साँस ली और गिलास में बची रॉयल चैलेंज का एक लम्बा सा घूँट भर गिलास ख़ाली कर दिया।....


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