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03.27.2012
 

आलोचकों की निगाह में....... तेजेन्द्र शर्मा


(स्वर्गीय डा. धर्मवीर भारती)

कहानियों में दम है, यद्यपि ख़ामियाँ भी कहीं कहीं हैं। लेकिन तेजेन्द्र के पास समस्याओं को उठाने का साहस है, पात्र निर्माण करने की शक्ति है, कथानक का निर्वाह है...।

डा. चन्द्रकांत बांदिवडेकर

कुल मिला कर कहानियाँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का प्रतिबिंब खड़ा करती हैं। मनुष्य किता आत्म केन्द्रित और करुणा से वंचित होता जा रहा है, इसका बोध यह कहानियाँ करवाती हैं।

जगदम्बा प्रसाद दीक्षित

तेजेन्द्र के लेखन के संबन्ध में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात है - जीवन के कटु और भयावह सत्यों का सामना करने की लेखक की प्रवृत्ति और क्षमता। निश्चय ही तेजेन्द्र के पास ऐसा अनुभव संसार है जो दूसरे लेखकों को सहज उपलब्ध नहीं है। अपने अनुभव संसार से उन्होंने ऐसे प्रसंगों को चुना है जो कहीं न कहीं पाठक को झकझोर जाते हैं। ढिबरी टाईट एवं देह की कीमत का कथ्य इसका अच्छा उदाहरण है।

ओमा शर्मा

तेजेन्द्र शर्मा का संग्रह यह क्या हो गया! किसी भी प्रकार की प्रतीति से परे है। देस और परदेस के जीवनसंसार में अपनी व्यापकता ढूँढती संग्रह की अधिसंख्य कहानियाँ कई स्तर पर प्रभावित करती हैं। कथ्य और सरोकारों के स्तर पर आमजन के करीबी यथार्थ में बुनी हुई भाषा के स्तर पर एक खाद देशी मुहावरे में गढ़ी हुई हैं। उनमें शिल्प अथवा प्रयोगशीलता की किसी चकाचौंध का अभाव अलबत्ता हो सकता है मगर संप्रेषण की शिकार वे नहीं हैं। और हिन्दी कहानी के लिए यह एक स्वागत योग्य सूचना है। मृत्यु तेजेन्द्र शर्मा की कई कहानियों में प्रवेश करती है। तेजेन्द्र के लिए मृत्यु निजी समस्या पर अपघात भर नहीं है, बल्कि सामाजिक जड़ों और उसकी विरूपताओं पर प्रहार करने का ज़रिया है। यह कहानियाँ अनुभव के स्तरों पर हमें पर्याप्त विविधता पेश करती हैं तो भाषा के स्तर पर देसी (पंजाबी)-परदेसी मुहावरा भी।

सुभाष पंत

तेजेन्द्र की कहानियों की सहजता और ताज़गी और साथ ही साथ भाषा की सादगी और प्रभाव  इन्हें आप कहानियों से अलग खड़ा करती हैं।..मानवीय रिश्तों की तलाश बहुत व्यवहारिक स्तर पर की गई है। जैसे कोई कलाकार अपनर ब्रश से नाज़ुक कलाकृति को, एक एक रेशे को बहुत कोमलता से छू रहा हो।

धीरेन्द्र अस्थाना

परकाया प्रवेश में तेजेन्द्र को दक्षता हासिल हे। यानि स्त्रियों की यातना, दु:ख और हर्ष को तेजेन्द्र ने ठीक उसी तरह जिया है जैसे कोई स्त्री ही जी सकती है।

डा. गौतम सचदेव

तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों में आधुनिक जीवन को नये पक्ष और नये नये सन्दर्भ देखने को मिलते हैं। साथ ही उनमें यथार्थ और संवेदनापूर्ण पंजाबियत की पूरी चाशनी होती है।

डा. पुष्पपाल सिंह

कहानी के लिए बिल्कुल हाल का संदर्भ पंजाब की आतंकवादी स्थितियों का है। ..इस तथ्य पर आधार बना कर बिल्कुल नये लेखक तेजेन्द्र शर्मा ने ’काला साग जैसी बेहतरीन कहानी लिखी जिसमें मूल्य स्तर पर अनेक सवाल उठाए गए हैं। अपने समय और समाज के ये ज्वलंत प्रशन कहानी में जिस रूप में उठाए गए हैं, उससे सिद्ध होता है कि कहानी के यथार्थ का फलक कितना व्यापक, विस्तृत है।

सूरज प्रकाश

तेजेन्द्र की कहानियों के पात्र अपनी कमज़ोरियों, अच्छाइयों, बुराइयों और यहाँ तक कि अपनी बेशर्मियों और बदत्तमीज़ियों के साथ ज्यों के त्यों हमारे सामने आते हैं लेकिन इन्हीं साधारण पात्रों के असाधरण कहानियों के साथ तेजेन्द्र जब हमारे सामने आते है तो चमत्कृत करने के बजाए हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि कहाँ क्या ग़लत हो रहा है।

जावेद इक़बाल

ढिबरी टाइट की कहानियों में ऐसे पात्रों का दर्द ढला है जिनकी ज़िन्दगी एक शोकगीत बन कर रह गई है। तेजेन्द्र की कहानियों की एक ख़ासियत है उनका सहज प्रवाह। वह नाटिकीय स्थितियों को ग़ैर ज़रूरी तौर पर जगह नहीं देते और कहानी को सहज गति से स्वाभाविक अंजाम तक पहुँचाते हैं। भाषा कहानियों के अनुरूप है और कहीं भी बोझिल नहीं लगती। कई कहानियों में भाषा ने शृंगार भी किया है और इसकी ख़ूबसूरती कहानी के पैरों में पायल की तरह हल्के से बज उठी है तो कई स्थलों पर भाषा से चाबुक का काम भी लिया गया है।

दिनेश कपूर

तेजेन्द्र की कहानियों में कथ्य का अभाव नहीं है। और कथ्य का निर्वाह भी सरल है। तेजेन्द्र का गद्य कथा-विषय के अनुरूप सुन्दर भी है और बदसूरत भी, उसमें प्रकृति, प्रेम और लगाव का सीधा-सादा चित्रण भी है और गालियाँ भी, पर जो कुछ भी है आम और प्रबुद्ध दोनों तरह के पाठकों के लिए ग्राह्य है। यही शायद उनकी शैली की आधुनिकता भी है।

कादम्बिनी (पत्रिका) से

कथा-संग्रह ढिबरी टाइट की लगभग सभी कहानियों की कथानक सशक्त है। रचनाकार तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी कृतियों में निष्पक्ष रूप से समस्याएँ उठाई हैं तो उनका समाधान भी तत्परता से पेश किया है। प्रस्तुत संकलन की ढिबरी टाइट शीर्षक कहानी इसका जीवंत उदाहरण है। रिश्ते कैसे बनते-बिगड़ते हैं और उनमें धार्मिक रूढ़ियाँ कितनी बाधाएँ उत्पन्न करती हैं इसका उदाहरण हमें नई दलहीज़ कहानी में मिलता है। यह पूरा संग्रह एक ही बैठक में पढ़ा जा सकता है।

देवमणि पाँडेय

ढिबरी टाइट की कहानियों में विविधता है और इनके विषय उन कहानियों के विषय से काफ़ी हटकर हैं जो प्राय: पत्र पत्रिकाओं में धड़ल्ले से छपती रहती हैं। तेजेन्द्र को पेशेगत अनिवार्यता के कारण दुनिया की तमाम नई नई जगहों पर अक्सर आना जाना पड़ता है। उनकी इसी उड़ान का लाभ कहानियों को मिला है। कुछ कहानियों के विषय पाठक को स्तब्ध कर देने की क्षमता रखते हैं। मसलन संग्रह की पहली ही कहानी ढिबरी टाइट।

रतीलाल शाहीन

तेजेन्द्र शर्मा के पास कहीं से भी किसी भी कहानी को कहने, उठा लेने और आगे बढ़ाने की कला है। कला से ज़्यादा उनके पास है अपना विशिष्ट कथ्य, उनके वायुयान पेशे से जुड़ा कथ्य जो कि हमें बराबर बाँधे रखता है।

प्रबोध कुमार गोविल

तेजेन्द्र की कहानियों को पढ़ते हुए एक और दिलचस्प तथ्य सामने आता है। जिस तरह हिन्दी में महिला लेखन पर बात करते हुए कुछ महिला कथाकारों के बारे में समय समय पर कहा जाता रहा है कि वे पुरुष मनोभावों को चित्रीकरण में भी सिद्धहस्त हैं, ठीक उसी तरह तेजेन्द्र की कहानियों को पढ़ते समय लगता है कि तेजेन्द्र महिला पात्रों के भीतर से भी बड़ी स्वाभाविकता से बोलते हैं। निश्चय ही यह एक उपलब्धि है।

डा. अरविंद

कुल मिला कर तेजेन्द्र की कहानियाँ कुशल प्रस्तुतिकरण और चित्रांकन की कहानियाँ हैं। हिन्दी पाठक को उन्होंने आकाश की ऊँचाइयों के भी दर्शन कराये हैं। कहानी विधा पर उनकी मज़बूत पकड़ है। काला सागर की कहानियाँ अधूरे रह गये सपनों की कहानियाँ हैं।

हरि मृदुल

तेजेन्द्र की कहानिायों की सबसे बड़ी विशेषता यहा है कि हमारे रोज़मर्रा के जनजीवन से जुड़ी अपनी सी लगने वाली कहानियाँ हैं। उन कहानियों की कथात्मकता और भाषा का स्वाभाविक प्रभाव भी एक प्लस प्वाइंट है। कथा तत्व, संवेदना, शिल्प और भाषा के स्तर पर आए परिवर्तनों की कसौटी पर, तेजेन्द्र न केवल प्रभावित करते हैं, बल्कि एक निश्चित छाप भी छोड़ते दिखाई देते हैं।

भावसिंह हिरवानी

तेजेन्द्र शर्मा की कहानियाँ शहरी जीवन की उस बदसूरत तस्वीर की बड़ी सफ़ाई के साथ हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं, जहाँ हर पहलू को आर्थिक दृष्टि से देखना लोगों की आदत बन गई है। रिश्ते नाते सब कुछ दायरे में सिमट कर अर्थहीन हो गये हैं। इन कहानियों को पढ़ते वक्त हमारे अंतस में जमी काई उसी तरह साफ़ साफ़ दिखाई देने लगती है, जैसे किसी नदी या तालाब के स्थिर जल में उसके तल में फैली गंदगी दिखाई देती है।

प्रेम शशांक

काला सागर तेजेन्द्र शर्मा की दस काहानियों का पहला संग्रह है। गाँव, कस्बे और महानगरों में ज़िन्दगी से जूझते निम्न मध्यवर्गीय कहानियों के कथ्य हैं। आर्थिक दबावों से घिरे और आत्मीय सम्बन्धों से क्षरित होते ये परिवार हर कहानी में अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत हैं। अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं में डूबे, कथनी और करनी में स्पष्ट भेद करने वाले मुखौटे इस वर्ग के सही चेहरे हैं। काला सागर संग्रह की सबसे अच्छी कहानी कही जा सकती है।

 

डॉ. प्रेम जनमेजय  

तेजेन्द्र की कहानियों को पढ़ना मुझे अच्छा लगता है क्योंकि तेजेन्द्र मुझे अच्छा लगता है। मेरा यह वाक्य पढ़ते ही आपको मुझसे ईर्ष्या होने लगेगी,  यदि आप तेजेंद्र के आत्मीय हैं, कि यह कौन आ गया तेजेंद्र का अच्छा। क्योंकि यह मानवीय कमजोरी है कि हम अपने आत्मीय को अपने लिए ज़्यादा चाहते है और दूसरे के साथ बाँटने को बिल्कुल तैयार नहीं होते है। मैं जानता हूँ कि तेजेंद्र की कहानियों पर मेरी यह समीक्षा या तो तेजेंद्र पढ़ेगा या फिर तेजेंद्र के वे परिचित जिन्हें तेजेंद्र पढ़वाएगा। उनमें से कुछ उड़ती निगाह डालेंगें, अच्छी है जैसा सतही वाक्य उछालेंगें तथा और क्या लिखा जा रहा है जैसी औपचारिकता निभाएँगे। आधुनिक आलोचना या तो सम्प्रदाय सापेक्ष होती है या फिर व्यक्ति सापेक्ष। मेरे विचार से अधिकांश समीक्षों इसी दृष्टिकोण के साथ लिखी पढ़ी जाती हैं। मैंने जब तेजेंद्र का पहला संग्रह पढ़ा तब न तो तेजेंद्र किसी सम्प्रदाय का सदस्य था ( सम्भवत: अब भी नहीं है ) और न ही व्यक्ति रूप में उसे जानता था।काला सागर की कहानियाँ पढ़ते ही मुझे लगा कि एक भिन्न अनुभव क्षेत्र से गुजर रहा हूँ। सागर पार हवा में घूमते हुए विभिन्न चरित्रों एवं घटनाओं से जो साक्षात्कार लेखक ने किया वह उसका अपना अनुभव संसार था जिससे बहुत कम पाठकों का साक्षात्कार होता है। तेजेंद्र की शैली इतनी जीवन्त है कि पाठक स्वयं को उस संसार का हिस्सा समझने लगता है। पहले संग्रह को पढ़कर लगा था कि कथा साहित्य को नए अनुभव देने वाला एक नया रचनाकार साहित्य जगत में उभरा है।

आज मेरे सामने तेजेंद्र का तीसरा कहानी संग्रह देह की कीमत है। इस बीच मैं तेजेंद्र की कहानियों को हंस जैसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका के साथ साथ अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़ता रहा। मैं उसका दूसरा कहानी संग्रह ढिबरी टाईट पुस्तकाकार नहीं पढ़ पाया पर इसकी अनेक कहानियों को मैंनें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अवश्य पढ़ा है। तेजेंद्र की लेखन इतर गतिविधियों से भी मैं परिचित रहा हूँ। अपनी दिवंगत पत्नी इंदु के सम्मान में पुरस्कार की स्थापना उसकी रचनाओं में आई आपसी सम्बन्धों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को सही सिद्ध करती है। उसकी रचनाओं में ही नहीं उसके व्यक्तिगत जीवन में भी मानवीय मूल्यों के प्रति जो प्रतिबद्धत्ता है,  मेरे विचार से वही उसकी ताकत भी है। वह सम्बन्धों को रचना और व्यक्ति दोनों आधारों पर जीता है।

अनेक बार रचनाकार को व्यक्तिगत रूप से जानना आपको सीमा में बाँधता है परन्तु उसकी रचनाओं को एक नए कोण से देखने की दृष्टि भी देता है। आप उसके अतीत और वर्तमान को जानते हैं और उसकी रचनाओं में उसे ढूंढ ही लेते हैं। वैसे भी रचना रचनाकार के व्यक्तिगत अनुभवों की निर्वेयक्तिक अभिव्यक्ति ही तो है। मैं दावा नहीं कर सकता कि मैं तेजेंद्र के व्यक्तित्व से पूर्णत: परिचित हूँ, ऐसा दावा कोई भी नहीं कर सकता है, पर जितना परिचित हूँ उस आधार पर रचनाकार को उसकी रचना में न चाहते हुए भी ढूँढूँगा।

जो तेजेंद्र के व्यक्तिगत जीवन को जानते हैं वे जानते हैं कि उसकी पत्नी की मृत्यु कैंसर से हुई थी। इस संग्रह की अधिकांश कहानियों के केंद्र में यही थीम है। शरीर और मन से लड़ता हुआ रचनाकार अपने पाठकों के सामने अनेक सवाल रखता है। सम्बन्धों की इन कहानियों में अनेक ऐसे सवाल हैं जो हमारे अपने सवाल लगते हैं। इन कहानियों में अधिकांशत: औरत कर दर्द है। उसके देह की कीमत ही नहीं लगती है अपितु एक मानसिक तनाव में जी रही वह समाज में अपनी कीमत,  अपनी भूमिका के लिए जूझ रही है। तेजेंद्र ने अपनी कहानी की औरत को याँत्रिक नहीं बनाया है। हर जोर जुल्म की टक्कर में वह फार्मूलाबद्ध औरत से अलग है और यही कारण कि उससे आत्मीयता होती है, उसका दर्द अपना दर्द लगता है तथा उसके लिए कुछ करने का मन करता है। देह की कीमत अलग अलग रूपों में सामने आती है। कहीं यह देह की कीमत की म्मी के रूप में, पैसा कमाने अवैध रूप से विदेश गए अपने मृत पति के साथ बिता़ पाँच महीनों की बख़्शीश के रूप में सामने आती है। यह कहानी मुझे बहुत कुछ प्रेमचंद की कहानी कफन की याद दिलाती है जो हमारे समाज के यथार्थ से हमारा साक्षात्कार कराती है। एक ओर भावनात्मकता है तथा दूसरी ओर स्वार्थ में लिपटी तथाकथित सांसारिकता है। एक ओर विदेश में मृत हरदीप के अवैध रूप से विदेश गए वो साथी हैं जो मानवीय भावना में बंधे उसकी लाश को भारत पहुँचाने के लिए चंदा कर तीन लाख रुपया इकट्ठा करते हैं और दूसरी ओर भारत में हरदीप के पिता को छोड़कर परिवार के सदस्य हैं,  जो इस लाख का मूल्य लेना चाहते हैं। हरदीप के भाई लाख लेने के बहाने से टोकियो जाना चाहते हैं और वहाँ बसना चाहते हैं। दूसरी ओर हरदीप की माँ को बेटे की लाख में तीन लाख का लाभ दिखाई देता है। यही कारण है कि दारजी---” -----अपने परिवार को देखक ैरान थे, क्षुब्ध थे --- अपने ही पुत्र या भाई के कफ़न के पैसों की चाह इस परिवार को कहाँ तक गिरायेगी, उन्हें समझ नही आ रहा था। मन किया सब कुछ छोड़-छाड़कर संन्यास ले लें। और इस सबको दखते हुए पम्मी अपने आपसे सवाल करती है-- अस्थियाँ और बैंक ड्राफ़्ट आ पहुँचे हैं। बाहर बीजी का प्रलाप जारी है, दारजी दुखी हैं। और अंदर कमरे में पम्मी अपनी सूजी आँखों से कलश को देख रही है। ---- उसने तीन लाख रुपए का ड्राफ़्ट उठाया।---- उसे समझ नहीं रहा था कि यह उसके पति के देह की कीमत है या उसके साथ बिताये पाँच महीनों की कीमत। देह की एक ऐसी ही कीमत का पता, और इस बार यह देह उसकी ही है,  उसकी यानि श्वेत श्याम कहानी की संगीता की। संगीता का पति हेमन्त कंपकंपाती शीत ऋतु में भी सीमा पर पहरेदारी कर रहा है और पाँच सितारा होटलों की यह प्रेम-दीवानी देह व्यापार के धंधे में स्वयं को फंसाती है। उसकी और कोई विवशता नहीं है केवल इसके कि उसे ऐशो आराम के लिए ढेर सारा पैसा चहिए जो जीन सितारों को कंधें पर लगाने वाला और उसी कंधे पर देश का भार ढोने वाला नहीं उठा सकता। अंतत: वह अपने देवर को ही ग्राहक के रूप में पाती है और पश्चाताप की आग में जलने लगती है। तेजेंद्र के मन में इस पात्र के लिए पर्याप्त सहानुभूति दिखाई देती है,  शायद यह उसका नारी के प्रति अति भावुक दृष्टिकोण है पर मैं ऐसे पात्र के साथ कोई सहानुभूति नहीं रख पाता हूँ। इनका पश्चातप मुझे ओढ़ा हुआ लगता है। केवल अपने भौतिक सुख के लिए अपने शरीर को बेच देना कहाँ की आधुनिकता या क्रांतिकारिकता है।

तेजेंद्र की उन कहानियों को जो कैंसर पीड़ित नायिका पर लिख गई हैं पढ़कर मुझे लगा कि मैं किसी उपन्यास के अध्याय पढ़ रहा हूँ। कैंसर, रेत का घरौंदा, किराये का नरक, अपराध बोध का प्रेत। इन कहानियों का थीम एक है ट्रीटमेंट अलग है। इन कहानियों की रचना में तेजेंद्र का मन विशष रूप से रमा है। लगता है तेजेंद्र किसी अदालत के सामने कसम खा रहे है---- मैं सच कहूँगा,  सच के इलावा कुछ नहीं कहूँगा। इन कहानियों के नायक नरेन है, इन कहानियों का ही नहीं,  एक दूसरे थीम की कहानियों का नायक भी नरेन है। यह नरेन कोष्ठक की कामिनी की दृष्टि में बहुत जीवन्त व्यक्ति है--- बड़ा जीवन्त आदमी है नरेन। कठिन से कठिन समस्या के साथ जूझते समय भी नरेन के चेहरे पर मुस्कान ही दिखाई देती है। शिकन का तो उसके चेहरे से दूर का सम्बन्ध भी नहीं। बात बात पर मजाक करना,  ठाहका लगाना और जीवन के एक एक क्षण को जी लेना उसका स्वभाव है। तो रेत का घरौंदा की दीपा का नरेन, “जीवन के हर पहलू के लिए तर्क खोज लेता है।  नरेन का मानना है कि भावना और तर्क दिमाग के ही दो रूप हैं। हर व्यक्ति दिमाग से ही सोचता और जीता है।--- किसी के दिमाग में भावनाओं तर्कशक्ति पर हावी हो जाती हैं,  तो वह इंसान भावुक बन जाता है,  तर्कशक्ति को तिलांजलि देता है।---  जबकि किसी के दिमाग में तर्कशक्ति भावनाओं से अधिक बलशाली हो जाती हैं तो भावुकता उस व्यक्ति का साथ छोड़ देती है। कहीं नरेन लेखक है और कहीं वह जीवन से पलायन करता दिखाई देता है। तेजेंद्र का यह पात्र अनेक स्थलों पर हीरो हाते हुए भी एक स्वाभाविक चरित्र है। तेजेंद्र ने उसको अपनी ज़िंदगी स्वयं जीने का अवसर दिया है।

कैसर बीमारी के माध्यम से तेजेंद्र ने आपसी सम्बन्धों में फैल रहे कैंसर का जिक्र किया है। यही कारण है कि पूनम सवाल करती है -- मेरा पति मेरे कैंसर का इलाज दवा से करने की कोशिश कर सकता है ---- मगर जिस कैंसर ने उसे चारों ओर से जकड़ रखा है--- क्या उस कैंसर का कोई इलाज है।  इस कथ्य की कहानियाँ जहाँ अपने ट्रीटमेंट में कुछ नवीनता लिए हुए हैं वहीं कई बार यह भी लगता है कि कहानी जैसे रचनाकार के बने बनाए निष्कर्ष पर चल रही है। एक सोची सुचाई पूर्व निश्चित जमीन है जिस पर तेजेंद्र अपने पात्रों को चलाना चाहते हैं। ऐसे में मुझे उनकी चाल में अस्वाभाविकता सी दिखाई देने लगती है। पर इसका कारण यह भी हो सकता है कि तेजेंद्र अपने जीवन को उस अनुभव को अनेक कोणों से मारे सामने प्रस्तुत कर रहा है और इस प्रस्तुति से संतुष्ट न होने के कारण एक दोहराव के कारण कृत्रिमता आ रही है। यह मेरा अपना सीमित दृष्टिकोण भी हो सकता है और हर व्यक्ति इसका शिकार होता है पर वह इसे स्वीकार नहीं करता है। जैसे अगर मैं कहूँ कि तुम क्यों मुस्कराए में सूरी सर के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण इसी का परिणाम है तो वह स्वीकार नहीं करेगा।

कुल मिलाकर यह कहानियाँ आपको सोचने तथा कहने के लिए बाध्य करती है। एक नए अनुभव जगत में ले जाती है तथा एक उपलब्धि का बोध कराती हैं अपराध का बोध नहीं।



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